परिचयः-

भारत में पिछले कई सालों में मत्स्यपालन एक पिछड़ी गतिविधि से आगे बढ़कर प्रौद्योगिकी आधारित वाणिज्यिक और मुनाफा कमाने वाले उद्यम के रूप में खड़ा होने में सफल हुआ है। आज भारत चीन के बाद मत्स्यपालन में दूसरे नंबर पर है।

भारत में झींगा उत्पादन के लिए अनुकूल अनुमानित खारा पानी करीब 11.91 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला है जो 10 से अधिक राज्यों और केंद्र शासित राज्यों में, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, पॉन्डिचेरी, केरल, कर्नाटक, गोआ, महाराष्ट्र और गुजरात है। इनमे से अभी मात्र 1.2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर ही झींगा की खेती की जा रही है और अभी भी इस क्षेत्र में उद्यमियों के लिए बड़ी संभावनाएं हैं। आगे तालिका में राज्यवार संभावनाओं और मौजूदा विकास के स्तर के बारे में बताया गया है। भारत में व्यावसायिक मत्स्यपालन की सफलता का श्रेय बड़े पैमाने पर अप्रयुक्त सतही जल भंडार, कई नए उत्पादन का मानकीकरण और आगत-निर्गत उपतंत्र के सहयोगी तकनीक,तकनीक के विस्तार और किसानों के व्यावहारिक ज्ञान को जाता है।

झींगा उत्पादन के लिए उपयुक्त मिट्टीः-hqdefault (1)

  1. जैसा कि साफ है झींगा उत्पादन के दौरान झींगा अपना अधिकांश वक्त तालाब की तलहटी में बिताता है, ऐसे में जगह के चयन के दौरान मिट्टी का प्रकार बेहद अहम होता है। आमतौर पर मिट्टी औरचिकनी बलुई मिट्टी जिसमे 90 फीसदी चिकनी मिट्टी या कीचड़ होनी चाहिए और पीएच 6.5 से 8.5 के बीच बेहतर होता है। ऐसी जगह जो बलुई या गाद भरा हुआ हो उससे बचना चाहिए क्योंकि उनमेंछिद्रयुक्त विशेषता की वजह से भू-क्षरण या अपरदन, पानी का रिसाव और मिट्टी में आसानी से कचरे मिल सकता है। तालाब के निर्माण से पहले निर्माण स्थल से एक मीटर की गहराई से 5 से 10 जगहों से मिट्टी के नमूने लेकर लेबोरेटरी में जांच के लिए भेज देना चाहिए ताकि मिट्टी की बनावट और पीएच का पता चल सके। इस तरह का आंकड़ा तालाब के निर्माण और तैयारी के दौरान काफी फायदेमंद रहेगा।
  1. उच्च जैविक तत्व और अम्लीय स्वभाव की वजह से (जिसमे उच्च स्तर पर पानी के विनिमय और निम्न संग्रहण घनत्व की जरूरत) मैंग्रोव या अम्लीय सल्फेट मिट्टी झींगा उत्पादन के लिए अनुकूल नहीं होता है। मेंग्रोव मिट्टी पर निर्मित तालाब को तलहटी में हाइड्रोजन सल्फाइड और अमोनिया का संग्रहण होने की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। अम्लीय सल्फेट मिट्टी वाले क्षेत्र में अगर सूखा है तो मिट्टी में उच्च अम्लीयता पैदा हो जाती है और उसके बाद जलप्लावन हो जाता है जिससे तालाब का पीएच स्थिर करने में समस्या पैदा हो जाती है। साथ ही प्लवक के निर्माण के प्रोत्साहन मेंभी समस्या आती है।

झींगा उत्पादन में तालाब निर्माण और डिजाइनः-

img8झींगा उत्पादन में, झींगा के लिए तालाब चयनित जगह और खेती के तौर-तरीके के मुताबिक योजना बनाया जाना चाहिए। इसके लिए कोई खास योजना नहीं है लेकिन इलाके की भौतिक स्थिति और आर्थिक स्थिति के आधार पर सबसे अच्छा और कार्यात्मक (व्यावहारिक) खेती की योजना तैयार करना चाहिए।

तालाब का प्रबंधनः-

तालाब में नई फसल यानी झींगा पालन की शुरुआत करने से पहले, तालाब में स्थित अधिक पानी जो कि पिछली पैदावार के दौरान जमा हो जाता है, उसे जरूर निकालना चाहिए और मिट्टी और पानी को अनुकूलित कर देना चाहिए। अच्छी तरह से नहीं तैयार किए गए तालाब में झींगा उत्पादन से तालाब प्रबंधन में परेशानियां आ सकती हैं, जिससे तालाब की उत्पादन की क्षमता में गिरावट आ सकती है।

झींगा संग्रहणः-

भारत में इस तरह की खेती के लिए सबसे ज्यादा अनुकूल प्रजाति भारतीय सफेद झींगा पेनाएअस इंडिकस और टाइगर झींगा पी. मोनोडोन है। खेती करने के तरीके और व्यवस्था के तरीके के हिसाब से संग्रहण का घनत्व बदल जाता है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के मुताबिक,केवल पारंपरिक और कृषि योग्य पारंपरिक झींगा की खेती तटीय नियमन जोन (सीआरजेड) के भीतर एक से डेढ़ टन प्रति हेक्टेयर प्रति फसल होना चाहिए जिसमे संग्रहण का घनत्व 40,000 से 60,000 प्रति हेक्टेयर प्रति पैदावार (फसल) होनी चाहिए। सीआरजेड के बाहर विस्तृत झींगा की खेती जिसमे उत्पादन का दायरा ढाई से तीन टन प्रति हेक्टेयर प्रति फसल हो और जिसमे संग्रहण घनत्व एक लाख प्रति हेक्टेयर प्रति फसल हो की अनुमति दी जा सकती है।

बीज का चयनः-

तालाब में संग्रहण के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली बीज का चयन झींगा को बढ़ाने के प्रबंधन के लिए पहला महत्वपूर्ण कदम है। किसान को यह जरूर सुनिश्चित करना चाहिए कि वो एक भरोसेमंद हेचरी से यानी मछली पालने के जहाज़ से अच्छी गुणवत्ता वाली बीज खरीद रहा है। ऐसा हमेशा संभव नहीं हो सकता है कि आपको मनमाफिक झींगा का बीज मिल जाए, क्योंकि हमेशा यह उपलब्ध नहीं होता है। झींगा के बीज के भंडारण के लिए खरीदी के लिए निम्नलिखित मापदंड को अपनाना चाहिएः-

(क) आकार

पीएल 15-20 का बीज जो कि मंच पर 4-6 रीढ़ या मेरुदंड की तरह संकेत देता है, को तालाब में संग्रहण करने के लिए अनुसंशा की जाती है। स्वस्थ या अच्छा पीएल पेट के अनुपात में पेशी होनी चाहिए जो छठे पेट संबंधी खंड में करीब 4:1 या पेट की मोटाई मांसपेशी के जितनी मोटी होनी चाहिेए। व्यवहार में, पहली और दूसरी बार में ब्रूडस्टॉक (मत्स्य पालन में मछली पालन के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है।) से निकाला हुआ एक समान आकार का बीज इस्तेमाल करना चाहिए।

(ख) आकारिकी या आकृति विज्ञानः-

पोस्ट लार्वा का सूंड़, उपांग और चोंच का आकार सामान्य होना चाहिए। पेट की मांसपेशी साफ होनी चाहिए, शरीर पर कोई धब्बा या क्षरण नहीं होना चाहिए, पेट में भोजन पूरा भरा होना चाहिए, और पृष्ठवर्म (कछुवे की पीठ की हड्डी) को मांसपेशी से भर देना चाहिए।

(ग) रंगः-

यूरोपोड्स के पोस्ट लार्वा में उपस्थित रंगद्रव्य कोशिका का इस्तेमाल तब करना शुरू कर देना चाहिए जब विकास का स्तर दिखना शुरू हो जाए। पीएल जिसमें उच्च उत्तरजीविता और विकास दर होगी उसका हल्का भूरा, बादामी से गहरा बादामी और काला रंग होगा। लाल और गुलाबी रंग के संकेत सामान्यतौर पर दबाब से संबंधित होता है।

(घ) व्यवहारः-

स्वस्थ बीज सीधा तैरता है, बाहरी उत्तेजना और उकसावे पर तेजी से प्रतिक्रिया करता है जैसे कि बेसिन के बगल में लगा हुआ नल, सक्रियता से धारा के खिलाफ तैरता है जब पानी को हिलाया जाता है और जमा होने की जगह किनारे से चिपक जाता है या जब धारा शांत हो जाती है तब यह कंटेनर के बीच में बैठ जाता है।

(ड़) बाहरी अशुद्धिः-

बीज को बाहरी परजीवी, बैक्टीरिया और दूसरी दूषित जीवधारी से मुक्त होना चाहिए। इस तरह के जीवधारियों की मौजूदगी अस्वस्थ स्थिति का संकेत है, जो पीएल के विकास और उत्तरजीविता को प्रभावित करेगा। किसान को यह सलाह दी जाती है कि वो बीज खरीदने से पहले मछली पालने के जहाज़ पर एकदम सुबह या देर शाम में एक या दो बार जाएं और बीज का निरीक्षण करें, खासकर संग्रहण से एक दिन पहले। हालांकि, कुछ खराबी के साथ स्वस्थ बीज का इस्तेमाल तब कर सकते हैं जब पशु यानी झींगा मछली इलाज के बाद अच्छी स्थिति में हों।

(च) रोगाणु मुक्तः-

बीज की जांच होनी चाहिए ताकि विषाणु अवरोधक तत्वों की उपस्थिति का पता चल सके। बीज में बड़ी संख्या में अवरोधक तनाव की स्थिति का संकेतक है जिससे पता चलता है कि तालाब में मौजूद बीज बलवान या ओजपूर्ण नहीं होगा।

संग्रहण का घनत्वः-rice-fish-3-300x169

जब एक खेत कार्य के लिए तैयार होता है, तब पीएल के सर्वोत्कृष्ट संग्रहण घनत्व का निर्धारण खेत की उत्पादन क्षमता और खेती के तरीके,जिसमे मिट्टी और पानी की गुणवत्ता, भोजन की उपलब्धता, मौसमी विविधताएं, लक्षित उत्पादन, और किसान की अपेक्षाओं पर निर्भर करता है। किसानों को इस बात की सलाह दी जाती है कि वो निम्न संग्रहण घनत्व के साथ नई फसल की शुरुआत करें ताकि तालाब की उत्पादन क्षमता का लाभ उठा सकें। अगर उत्पादन सफल रहा, तो बाद वाली फसल के लिए संग्रहण घनत्व बढ़ाई जा सकती है। अधिसंग्रहण से बचा जाना चाहिए क्योंकि इससे प्रबंधन संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती है और सारी फसल चौपट हो सकती है।

सामान्यतौर पर अर्ध सघन खेती में संग्रहण घनत्व 10 से 20 पीएल प्रति वर्ग मीटर का प्रयोग होता है। सघन खेती में, एक अच्छी तरह से संचालित तालाब में जिसमें लगातार अच्छी गुणवत्ता युक्त पानी का बहाव होना चाहिए जिसका भंडार 1.2 मीटर की गहराई में 25 से 30पीएल प्रति वर्ग मीटर होना चाहिए और 1.5 मीटर की गहराई या और गहराई में 40 से 50 पीएल प्रति वर्ग मीटर होना चाहिए। हालांकि, इस बात पर जरूर जोर दिया जाना चाहिए कि सघन खेती में उच्च घनत्व शामिल होता है और यह अच्छी तरह से प्रबंधित खेतों में अनुभवी किसानों की देखरेख में ही जारी रह सकता है।

पशु चारा और चरवाहा- 

चारे का खर्च उत्पादन खर्च का बड़ा हिस्सा होता है जो कि कुल परिवर्तनशील खर्च के 50 से 70 फीसदी तक होता है। चारे का प्रयोग झींगा उत्पादन को उन्नत बनाएगा और मुनाफा को बढ़ा देगा। चारे में से पोषक तत्वों की उपलब्धता कच्चे माल के किस्म और गुणवत्ता, सूत्रीकरण,चारे का संसाधन, चारे के भंडारण की स्थिति और चारे के प्रबंधन पर निर्भर करता है। इसलिए, अर्ध-सघन या सघन झींगा की खेती के लिए चारा और चारे को खिलाने की प्रक्रिया, पोषक तत्वों और चारे की जरूरत के लिए आधारभूत समझ की जरूरत पड़ती है।

झींगा का आहार पूरक या संपूर्ण हो सकता है। एक विस्तृत व्यवस्था में झींगा को एक संपूर्ण आहार की जरूरत होती है। तथापि प्राकृतिक भोजन सामग्री में अच्छा रुपांतरण मूल्य होता है लेकिन उन्हें बड़ी मात्रा में हासिल करना और उनकी निरंतर आपूर्ति करना बहुत कठिन है। आज के समय में अधिकांश अक्वाकल्चर फार्म आयातित चारे जिसका एफसीआर यानी भोजन रुपांतरण अनुपात 1:1.5- 1.8 पर निर्भर करता है। भोजन खिलाने की प्रक्रिया स्वत: चालित चारा वितरक या पूरे तालाब में फैलाकर किया जाता है। अगर खाना खिलाने की ट्रे को तालाब के अंदर चुनिंदा खंड में लगा दिया जाए तो खाने की बर्बादी को कम किया जा सकता है।

आवश्यक पोषक तत्वः-

झींगा को लगभग 40 आवश्यक पोषक तत्वों की जरूरत होती है। ये पोषक तत्व अलग-अलग मात्राओं में प्राकृतिक भोजन और पूरक चारे के तौर पर दिया जाता है। हालांकि सभी पशुओं के लिए पोषक तत्वों का नियम या सिद्धांत एक समान होता है, लेकिन पोषक तत्वों की गुणवत्ता और मात्रा की जरूरत एक नस्ल से दूसरे नस्ल में बदल जाती है। ब्लैक टाइगर झींगा के लिए पोषक तत्वों और आहार संबंधी तत्वों का विवरण नीचे दिया गया है।

पानी की गुणवत्ता का प्रबंधनः-

तालाब के निचले हिस्से में पानी की स्थिति उत्पादन चक्र के दौरान, जैसे कि, नहीं खाये गए भोजन, पशुओं के मल आदि की वजह से खराब होने लग जाती है। साधारण तौर पर झींगा उत्पादक किसान घुलनशील ऑक्सीजन (डीओ), पीएच, अमोनिया, जलवर्ण और जलगंध का इस्तेमाल करते हैं ताकि वो तालाब के पानी की गुणवत्ता की जांच कर सकें।

इन मापदंडों का इस्तेमाल नियमित तौर पर निरीक्षण के लिए किया जाता है, जिसमे या तो वैज्ञानिक सामान के जरिये या फिर किसान के अनुभव के माध्यम से सर्वोत्कृष्ट दायरे में उन पर नियंत्रण रखा जाता है।

फसल उत्पादन और प्रबंधनः-

  1. सफल उत्पादन को हासिल किया जा सकता है अगर झींगा को निकालने का काम छोटे से वक्त में अच्छे हालात में किया जाए। उत्पादन की तकनीक की गंदगी से झींगा को नुकसान या अत्यधिकगंदा नहीं करना चाहिए। तेजी से तैयार झींगा को निकालने से जीवाणु से दूषित होने का खतरा कम कर देगा और संसाधक के पास पहुंचने तक झींगा बिल्कुल ताजा रहेगा।
  2. पूरी तरह से झींगा को निकालने का काम तालाब को सूखा कर किया जा सकता है, इसके लिए इसमे डोल जाल (बैग नेट) और हाथ से पकड़ने का काम शामिल होता है। झींगा उत्पादन में लगने वालाऔसत वक्त करीब 120 से 150 दिनों का होता है, जिसके दौरान झींगा का वजन 20 से 30 ग्राम बढ़ जाता है (कौन सा नस्ल है इस बात पर भी निर्भर करेगा)। एक साल में दो उत्पाद या फसलहासिल किया जा सकता है। बाजार में झींगा को भेजने से पहले निकाले गए झींगा को तोड़े गए बर्फ की परतों के बीच रखा जा सकता है।

rice-fish-culture-2झींगा उत्पादन या फसल कटाई या हासिल करने की पद्धतिः-

आमतौर पर झींगा की खेती में झींगा को हासिल करने के दो तरीके होते हैं। इसमे या तो तालाब को सूखा दिया जाता है या फिर डोल जाल की मदद से झींगा को पकड़ा जाता है या फिर तालाब में ही जाल डाल कर पकड़ा जाता है।

– झींगा को पकड़ने के पहले वाले तरीके में, तालाब और निकास द्वार को अच्छी तरह से तैयार किया जाता है ताकि तालाब को 4 से 6 घंटे के भीतर अच्छी तरह से सूखाया जा सके। निकास द्वार पर डोल जाल को इस तरह से लगाया जाना चाहिए ताकि पानी को निकालने के दौरान झींगा को अच्छी तरह से जमा किया जा सके। तैयार झींगा को हासिल करने का सबसे अच्छा वक्त काफी सुबह करना होगा और अच्छी तरह से सुबह होते-होते इस काम को पूरा कर लेना होगा। तालाब से झींगा को निकालने का काम तब करना चाहिए जब लहर की गति कम हो और इसके अलावा जब संभव हो तभी झींगा को निकालना चाहिए। नुकसान को रोकने के लिए कम मात्रा में झींगा को हार्वेस्टिंग बैग से नियमित अंतराल पर निकालना चाहिए।

– जब तालाब से झींगा निकालने के लिए जाल लगाते हैं, तब या तो छोटा इलेक्ट्रिक जाल या बड़ा जाल का इस्तेमाल कर सकते हैं। तालाब में पानी का स्तर घटा कर 0.5 से 0.75 मीटर कर देना चाहिए और उसके बाद मछली पकड़ने के लिए मजदूरों को तालाब के अंदर जाना चाहिए। यह तरीका कम फायदेमंद होता है क्योंकि इससे तालाब की तलहटी अशांत हो जाती है, साथ ही इससे झींगा दूषित हो जाता है। यह सब कुछ धीरे-धीरे होता है और इसके पूरा होने में लंबा समय लग सकता है।

किसी भी पद्धति में, जब तालाब में कुछ झींगा बच जाता है तब उसे हाथ से निकालने की जरूरत होती है, उसके बाद तालाब सूख जाता है। भंडारण की क्षमता को बढ़ाने और नुकसान से बचाने के लिए तालाब से निकाले गए झींगा को तापमान का झटका (ठंडे बर्फीले पानी में डूबाकर) देकर आसानी से और तुरंत मारा जा सकता है।

तैयार झींगा निकालने और बेचने का वक्तः-

– तालाब से तैयार झींगा को निकालने का वक्त तालाब में स्थित झींगा की स्थिति और बाजार में मिल रही कीमत पर निर्भर करता है। झींगा का नमूना तालाब के अलग-अलग हिस्से से कास्ट नेट के जरिए किया जाता है ताकि उनके भार और सामान्य स्थिति का पता चल सके। झींगा उत्पादन के वक्त (कटाई) मुलायम घोंघा झींगा का अनुपात पांच फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। यह अनुपात दो केंचुली निकलने के बीच के दौरान तय करके हासिल की जा सकती है।

– तालाब में केंचुली निकलने के वक्त का संकेत केंचुली की मौजूदगी से चल जाता है। उदाहरण के तौर पर अगर झींगा के शरीर का औसत वजन 30 ग्राम होता है तो तालाब से झींगा निकालने का काम केंचुली दिखने के 7 से 8 दिन के बाद करना चाहिए। उसके बाद अगला केंचुली निकलने का चक्र 14 से 16 दिन के बाद शुरू हो जाएगा जिसे देखा जा सकता है। तैयार हुए झींगा को निकालने के बाद

दस घंटे के अंदर बर्फ में रख कर उसे कोल्ड स्टोरेज या संसाधन प्लांट भेज देना चाहिए।

बीमारी, रोकथाम और उपचारः-

संक्रामक और गैर संक्रामक वजहों से संवर्धित झींगा कई तरह की बीमारियों का शिकार हो जाती है। संक्रामक बीमारियां विषाणु, जीवाणु,कवक और विशेष परजीवी की वजह से हो जाता है। अगर तालाब में झींगा को होनेवाली बीमारियां पैदा हो जाए तो इलाज सफलतापूर्वक नहीं किया जा सकता है। बीमारियों से मुक्त होने का सबसे अच्छा तरीका अच्छी खेती प्रबंधन का अभ्यास या रोकथाम है। इस बंध में, कई तरह की बीमारियां और उसकी रोकथाम के तरीकों की जानकारी फायदेमंद होता है।

गुणवत्ता नियंत्रण और बाजारः-

मुनाफा और बाजार में अच्छी कीमत के निर्धारण में गुणवत्ता नियंत्रण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि जो उत्पाद भेजा जा रहा है वह स्वस्थ है और इस बात को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

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