भारत में बीते कुछ सालों में कृषि कार्यों के लिए मजदूरों की कमी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रही है। इससे फसलों की बुआई और कटाई के दौरान खेतिहरों को बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में जीवाश्म ईंधन से चलने वाले उपकरणों ट्रैक्टर, सीडर, लेवलेर आदि मशीनी उपकरणों पर निर्भरता बढ़ी है। इससे भले ही मजदूरों की कमी के संकट से फौरी तौर पर राहत तो मिलती है लेकिन ये उपकरण पर्यावरण अनुकूल नहीं हैं। कार्बन फुट प्रिंट्स से पारिस्थितीकीय को खासा नुकसान पहुंचाते हैं। आमतौर पर खेती के लिए मजदूरों की मांग बुआई के समय और फसल की कटाई के दिनों में ज्यादा होती है। सीमांत किसानों या छोटे रकबे या जोत वाले किसानों को फसलों की कटाई के दौरान ज्यादा समस्या आती है। एक तो मजदूरों की कमी की समस्या और दूसरी आज भी वो फसलों की कटाई के लिए परंपरागत तरीके ही इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। गांव घर से जुड़े लोग फसलों की कटाई के दौरान खेतों में झुंड के झुंड किसानों और मजदूरों को हाथ में हंसिया लिए श्रमसाध्य फसल की कटाई करने का दृश्य याद तो होगा ही।

परंपरागत रूप से फसल की कटाई करने में एक तो वक्त बहुत लगता है दूसरा बेहद मेहनत करनी होती है। आस पड़ोस के मजदूरों के नखरे सो अलग। ऐसे में यूरोपीय देशों में परंपरागत तौर पर फसल की कटाई के लिए उपयोग किए जाने वाले आला जिसे अंग्रेजी में साइथ कहते हैं, भारतीय कृषकों के लिए भी बेहद उपयोगी हो सकता है। भारत में हाल के दिनों में साइथ के प्रचलन को हाथों हाथ लिया भी जा रहा है। अंग्रेजी के एल अक्षर के आकार का ये साइथ न केवल कटाई जैसे महत्वपूर्ण कृषि कार्य में खेतिहर को मजदूरों की कमी का एक बेहतरीन विकल्प उपलब्ध कराता है बल्कि परंपरागत कटाई उपकरणों की तुलना में बेहद कम समय में खेत के खेत में लगी फसल को काट कर जमीन पर करीने से बिछा भी देता है। हाल ही में सोशल साइट फेसबुक पर कानुपर के एक कृषक द्वारा साइथ के इस्तेमाल से अपनी फसल काटने के विडियो को करीब तेरह लाख लोगों ने देखा।


दरअसल पश्चिमी देशों में घास या खेत में लगी फसल को काटने का ये परंपरागत औजार है। अन्य परंपरागत उपकरणों की तुलना में ये बहुत जल्दी और बड़ी सफाई से फसल या घास की कटाई करता है। कटाई के लिए पहाड़ी इलाकों में इस्तेमाल किए जाने वाले असी या मैदानी इलाकों में इस्तेमाल किए जाने वाले हंसिया की तुलना में इससे फसलों की कटाई की रफ्तार कई गुना ज्यादा है और इसकी मदद से अकेला किसान भी घंटे भर में पूरे खेत में लगे फसल की कटाई कर सकता है।
बनावट : तकरीबन 170 सेंटीमीटर लंबे लकड़ी के एक डंडे (हाल फिलहाल लकड़ी की जगह धातु या प्लास्टिक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है) को साइथ कहते हैं जिसकी आकृति या तो सीधी हो सकती है या अंग्रेजी के एस आकार की होती है जिसके ठीक नीचे एल आकार में एक दरांती लगी होती है जिससे फसल या घास की कटाई को अंजाम दिया जाता है। साइथ में पकड़ने के लिए एक या दो हैंडल लगे होते हैं। पहला हैंडल सबसे उपर और दूसरा डंडे के बीच में होता है। डंडे के सबसे नीचले हिस्से पर लंबबत रुप में तकरीबन साठ से नब्बे सेंटीमिटर लंबी सी ब्लेड या दरांती लगी होती है जो फसल के काटने के काम आती है। साइथ में ये ब्लेड काम करने के दौरान हमेशा बायीं तरफ होती है। फसल या घास की कटाई के लिए इसके इस्तेमाल के पहले इससे कटाई करने का प्रशिक्षण लेना जरूरी होता है। अनाड़ी व्यक्ति इसकी मदद से कटाई नहीं कर सकता।
हाल के दिनों में कनाडा वासी एलेक्जेंडर विडो पश्चिमी देशों से इतर दुनिया के अन्य देशों में साइथ की प्रयोग को लोकप्रिय बनाने के मकसद से घूम रहे हैं। दक्षिण एशिया में नेपाल सहित भारत के कई इलाकों का दौरा कर उन्होंने किसानों को साइथ के प्रयोग से वाकिफ कराया और जीवाश्म ईंधन के उपकरणों की बजाए साइथ जैसे परंपरागत उपयोगी उपकरण की मदद से फसल की कटाई को बढ़ावा देने के प्रचार प्रसार में लगे हैं। आप अगर विडो से साइथ के उपयोग से संबंधित कोई सवाल करना चाहते हैं तो आप भी उनकी वेबसाइट http://scytheworks.ca/ पर जाकर उनसे सीधे बात कर उनकी मदद ले सकते हैं।
हाल ही में विडो ने भारत का दौरा  किया और देश भर में घूम घूम कर साइथ के प्रयोग से किसानों को अवगत कराया। दिल्ली से कोच्ची तक के सफर में तकरीबन हर जगहों पर किसान उनके इस परंपरागत उपकरण से खासे प्रभावित नजर आए। खास बात ये है कि थोड़े से ध्यान से देखने पर एक आम व्यक्ति भी साइथ को अपने घर में ही बना सकता है और थोड़े से प्रैक्टीस के बाद बड़ी आसानी से खेत के खेत कटाई भी कर सकता है। साइथ की मदद से कैसे फसल की कटाई की जा सकती है इसके लिए हम आपके सामने इस लेख के साथ एक विडियो भी जोड़ रहे हैं ताकि आप भी इसके प्रयोग से वाकिफ हो सकें।

केरल में पल्लकड के इंजीनियर किसान नंदकुमार भी साइथ के प्रयोग से खासे प्रभावित हुए और उन्होंने कनाडा से एक साइथ मंगा कर उसका इस्तेमाल भी किया। अपने 9.25 एकड़ के खेत में साइथ का इस्तेमाल करने में उनको शुरू शुरू में तो परेशानी हुई लेकिन एक बार हाथ जम गया तो उन्होंने सही से साइथ के इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। चुंकि नंदकुमार पुरी तरह से प्राकृतिक खेती करते हैं लिहाज़ा खेतों में उगने वाले खर पतवार को हाथ से हटाना उनके लिए बड़ी चुनौती थी इसलिए उन्होंने थोड़ा रिसर्च करने के बाद कनाडा में विडो से साइथ मंगवाया। लेकिन भारतीय खेती और परिस्थितियों के मुताबिक उनको कुछ परेशानियां भी आई। इन परेशानियों को लेकर नंदकुमार कहते हैं, “इसकी धार बहुत तेज थी, वजन में बेहद हल्की थी लेकिन खर पतवार को हटाने के क्रम में खेतों में मौजुद पत्थरों या मोटे तनों से टकराने के बाद इसकी धार मुड़ जाती थी। मुझे लगातार कई बार इसकी धार को ठीक करना होता था। फिर मैंने ये सोचा कि खर पतवार को हटाने के लिए झाड़ियों को साफ करने वाले साइथ को मंगाना ज्यादा ठीक रहेगा”। नंदकुमार कनाडा से मंगाने पर इसके मंहगे होने की शिकायत भी करते हैं। उनके एक जानने वाले ने उन्हें भारत में ही हैदराबाद में साइथ बनाने वाली एक कंपनी सेंटर फॉर इनवारेनमेंटल कंसर्न सीईसी का पता दिया जहां मात्र 1200 रुपये में उन्हें ये उपयोगी उपकरण मिल गया। हैदराबाद में बनने वाले साइथ की खासियत ये है कि इन्हें भारतीय परिस्थितियों के अनुरुप तैयार किया गया है।

विडो के साइथ से प्रभावित होकर भारत में भी हैदराबाद स्थित सीईसी में विभिन्न प्रकार के साइथ का निर्माण किया जा रहा है जिसकी कीमत तकरीबन 1200 रुपये है।

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