rose1देश में बहुत कम किसान हैं जो अपनी परंपरागत खेती के साथ किसी तरह का प्रयोग करने का साहस कर पाते हैं और जो करते हैं उनकी जिंदगी गुलाबी हो उठती है। इस बात के गवाह हैं पंजाब के मनिंदर पाल सिंह रियार और मनजीत सिंह तूर जो आज बेहद खुश हैं। इसका राज उनके फायदेमंद गुलाब की खेती में छिपा है जो हिमाचल प्रदेश में स्थित चिंतपूर्णी और ज्वालाजी जैसे मशहूर मंदिरों में चढ़ता है। उनके पास गुलाब से रस निकालनेवाला प्लांट है जो होशियारपुर के कांगर गांव में स्थित है।

गुलाब में गुंथी हुई और फूलों की खेती के प्रति प्यार से सुवासित, शिवालिक की तलहटी का यह मनोरम दृश्य, यह सब ताजे वेलेंटाइन डे की याद दिलाता है। हिमाचल प्रदेश की सीमा से सटे पंजाब के होशियारपुर जिले के कांगर और मैलिया गांव में स्थित इस फार्म हाउस को जानेवाली उबड़-खाबड़ कच्ची सड़क का सफर किसी जन्नत से कम नहीं।

हरित क्रांति के बेल्ट पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृषि के इस बुरे वक्त के दौरान मौके को भांपने की क्षमता ने किसान मनिंदर पाल सिंह रियार और मनजीत सिंह को तूर गेहूं-चावल की खेती के चक्र से बाहर निकल लिया। उनके फार्म में उपजे गुलाब को तेल और गुलाब जल के व्यावसायिक उत्पादन के लिए भेजा जाता है साथ ही उनके खेत के गुलाब हिमाचल प्रदेश के चिंतपूर्णी और ज्वालामुखी के मंदिर में देवी-देवताओं को चढ़ाए जाते हैं।

न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलने के बावजूद, गेहूं और चावल के उत्पादन में भविष्य में आनेवाली समस्या को रियार और तूर ने90 के दशक की शुरूआत में ही महज 20 साल की उम्र में भांप लिया था। दोनों एक स्वर में बताते हैं, ‘इसलिए हमने कुछ जमीनें शिवालिक की तलहटी में खरीदी और यहां आ गए। मिट्टी में पहाड़ी कंकड़ भरा था लेकिन वो नई और ऊपजाऊ मिट्टी थी, जो फूल उत्पादन के लिए बिल्कुल सटीक था।’

प्रशिक्षित हाथ-
4तूर पटियाला जिले के भवानीगढ़ के रहनेवाले हैं तो वहीं, रियार जालंधर के रहनेवाले हैं, जहां दोनों के परिजन आज भी परंपरागत खेती कर रहे हैं। मौसमी फूल, छोटे पेड़, अंगूर की लता और फल से लदे पपीता के पेड़ के बीच उनके साफ सुथरे फार्म हाउस और आधा एकड़ में फैले लॉन इस बात की ओर इशारा करते हैं कि वो अपने काम का लुत्फ उठाते हैं। तूर बताते हैं, ‘अचार और सॉस बनाने के लिए शुरूआत हमने आंवला के उत्पादन से किया, लेकिन दो साल के भीतर ही गुलाब उत्पातन की ओर मुड़ गए’। 25 एकड़ के क्षेत्र में गुलाब की खेती शुरू करने से पहले दोनों ने हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोटेक्टनोलॉजी (आईएचबीटी) से तीन महीने का प्रशिक्षण लिया। यहां उन्होंने गुलाब की खेती,गुलाब तेल, गुलाब जल के लिए रस निकालना सीखा। रियार ने बताया, ‘आईएचबीटी की संकर किस्म बुल्गारिया रोजा डेमसेना हमारी मिट्टी और जलवायु दोनों के लिए अनुकूल थे।’  वो आगे कहते हैं, ‘हमने जो कुछ भी किया था उसे बागवानी के विशेषज्ञ पसंद करते थे।’

कनाडा में टोरंटो स्थित रोटमैन स्कूल ऑफ मैनेजमेंट से रियार ने स्नातक की परीक्षा पास की। उन्होंने जो हुनर यहां से सीखा था उसे गुलाब की खेती में लगा दिया। वो स्वीकार करते हैं कि उनका तरीका अभी शुरुआती है और बताते हैं, ‘अब हम खेती के अलावा गुलाब के रस (सत) को बेचने जैसा कठिन कार्य कर रहे हैं। हम अभी अपनी योजना का खुलासा नहीं कर सकते,लेकिन यह कृषि के क्षेत्र के लिए बिल्कुल नया होगा और खेती करने वाले समुदाय को बड़े पैमाने पर फायदा पहुंचाएगा।’

राह में कुछ कांटे भी हैं-
2दोनों भागीदार को स्वदेसी गुलाब तेल और गुलाब जल बाजार के लिए भारतीय गुलाब को विकसित करने में चार साल (1996से 2000) लग गए। रियार बताते हैं, ‘गुलाब उद्योग पहले अधिकांश गुलाब और उसका सत बुल्गारिया से ही मंगाता था।’ तूर बताते हैं, ‘हमने गुलाब उद्योग में लोगों को यह समझाने के लिए बहुत मेहनत की है कि होशियारपुर में पैदा की गई किस्म बुल्गारिया के मानक से मेल खाता है।’ करीब तीन साल में वो न्यूयॉर्क स्थित फ्रेंच कंपनी को गुलाब तेल और गुलाब जल का निर्यात करने लगे। फिर उन्होंने बताया कि,’यह काम लंबे समय तक चल नहीं पाया क्योंकि हमारे ग्राहक एक निश्चित मात्रा में माल चाहते थे, लेकिन उत्पादन में उतार-चढ़ाव की वजह से ऐसा हो नहीं हो पाता था, इसलिए हमें उसे बिना ज्यादा मुनाफा के भारतीय बाजार में ही बेचना पड़ता था।’

एक जैसे हैं दोनों पार्टनर–

दोनों की टीम ने दो तरह की किस्म के फूल का उत्पादन किया-

पहला- रेड रोजा बोरबोनियाना, जो पूरे साल फूल देती है, दूसरा- पिंक रोजा दमासेना जो मार्च-अप्रैल के महीने में छह हफ्ते के लिए खिलती है। 4 एकड़ में फैले रोजा बोरबोनियाना से प्रतिदिन फूल तोड़े जाते हैं और उसे कांगड़ा जिले में स्थित ज्वालाजी मंदिर और उना के चिंतपूर्णी मंदिर में भेजा जाता है जहां भक्त खरीद कर उसे चढ़ाते हैं। जून-जुलाई महीने में फूल की मांग बढ़ कर 80 किलोग्राम प्रतिदिन पहुंच जाती है और साल के बाकी महीने में इसकी मांग 40 से 60 किलोग्राम के बीच रहती है। इन फूलों को एक बस के जरिए पहले होशियारपुर भेजा जाता है और उसके बाद इन्हें दोनों मंदिरों में भेज दिया जाता है।

3रियार बताते हैं, ‘एक वक्त हम इस इलाके में 60 एकड़ की खेती के साथ सबसे बड़ा गुलाब उत्पादक थे(जो अब घटकर करीब25 एकड़ रह गया है।), यही वजह रही कि दोनों मंदिरों के प्रबंधन ने हमसे फूल की आपूर्ति के लिए जब संपर्क साधा तब हमने यह प्रस्ताव लपक लिया, इससे बेहतर मौका और क्या हो सकता था।’ रियार और तूर खेतों की ऊर्वरता को बनाए रखने के लिए फसलों की अदला-बदली करते रहते हैं। 12 साल के उतार-चढ़ाव के बाद अब ताजा खेत तैयार है। बीच-बीच में परिवार की जरूरत के हिसाब से बीच में गुलाब की खेती की जगह ऑर्गेनिक गेहूं और बासमती चावल ले लेती है।

रोजा दमासेना के रस या सत का इस्तेमाल सौंदर्य प्रसाधन के मकसद से गुलाब तेल और गुलाब जल बनाने में होता है। रियार बताते हैं, ‘हम इस किस्म का उत्पादन 18 एकड़ में करते हैं। हम गुलाब तेल और गुलाब जल दोनों निकालते हैं और इन उत्पादों को दिल्ली के खुले बाजार में बेच देते हैं, और आगे वो विदेशी परफ्यूम निर्माताओं को निर्यात कर देते हैं।’

वक्त को लेकर बेहद संवेदनशील- 

रियार बताते हैं कि, गुलाब को तोड़ने का सबसे अच्छा वक्त या तो सूर्योदय के वक्त है या फिर सूर्यास्त से पहले, जिस वक्त फूल सबसे ज्यादा सुगंध देता है, और जो दिन के दौरान फीका पड़ जाता है। गुलाब के रस या सत की जांच बेंगलुरु स्थित काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) के फ्रेगरेंस एंड फ्लेवर डेवलपमेंट सेंटर (एफएफडीसी) की प्रयोगशाला में की जाती है।

फार्महाउस पर ही गुलाब तेल और गुलाब जल की पेराई स्वदेशी तरीके से तैयार किए गए प्लांट में किया जाता है। यह 1990के दशक में देर से आया और इसकी क्षमता बाद में बढ़ गई। आईएचबीटी ने इसका डिजाइन तैयार करने और इसे लगाने में मदद की और इस पर 40 लाख रुपये की लागत आई।

खेती के सहयोगी यानी पार्टनर ढाई एकड़ जमीन पर करीब एक साल से फूल के ट्यूबरोज, परेनियल किस्म और परफ्यूम,सौंदर्य प्रसाधन के अहम तत्व पर ट्रायल कर रहे हैं। तूर बताते हैं, ‘हम लोग परफ्यूम कंपनियों के लिए ट्यूबरोज कॉनक्रीट तैयार करते हैं।’

गुलाब की खेती की खासियतें—

मजदूर आधारित-

गुलाब की खेती मजदूर आधारित है। रोजा बोरबोनियाना की किस्म की खास गुलाब के लिए प्रतिदिन तोड़ाई की जरूरत होती है। होशियारपुर फार्म पर इसके लिए करीब 35 मजदूर दिन-रात काम करते हैं। यहां प्रत्येक मजदूर 250 रुपये प्रतिदिन कमाता है।

बहुत अच्छी स्थिति है-

10 से 12 साल में एक बार में करीब एक एकड़ में 40 हजार रुपये का खर्च आता है। (इसमे सालाना लागत, हरी खाद, डीएपी और कटाई-छंटाई पर खर्च भी शामिल है।)

रोजा बोरबोनियाना–(गुलाब की किस्म)

– लाल गुलाब- गुलाब की सालभर की किस्म (नवंबर से जनवरी तक )

– 20 किलो प्रति एकड़ प्रतिदिन तोड़ाई

– 60 रुपये प्रति किलो बिक्री

– जो सालभर पैदा होनेवाली किस्म के लिए ज्यादा खाद और मजदूर की जरूरत पड़ती है।

रोजा डेमासेना–(गुलाब की किस्म)

– गुलाबी, गैर साल भर वाली फूलों की किस्म (मार्च-अप्रैल में खिलने वाली छह सप्ताह वाली फूल)

– प्रति साल 800 से एक हजार किलो प्रति एकड़ पैदावार

– पांच हजार किलो गुलाब से एक किलो गुलाब तेल तैयार किया जाता है(बिक्री कीमत 5 से 6 लाख रुपये)।

– प्रति साल, प्रति एकड़ 80 हजार से एक लाख एकड़ की कमाई

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