चावल के खेतों में मछली के संयुक्त पालन के पीछे की संस्कृति क्या रही है rice fish 3? यह कुछ नहीं है बल्कि चावल की खेती की गुणवत्ता और उसकी पैदावार को प्रभावित किये बिना उसी खेत में उतने ही क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए मछली पालन करना है। एकीकृत मछली की खेती हमें मुख्य फसल (चावल) के साथ अतिरिक्त कमाई का मौका देती है। हालांकि यह व्यवस्था मुनाफे वाली साबित हुई है, लेकिन इसके अपने फायदे और नुकसान भी हैं। पश्चिमी देशों के मुकाबले चावल और मछली का व्यवसाय एशियाई देशों में बड़े पैमाने पर किया जाता है।

एकीकृत चावल और मछली पालन के फायदे-

इसके फायदे निम्न हैं-

  • चावल-मछली की खेती से किसान मुख्य फसल के साथ-साथ अतिरिक्त आमदनी प्राप्त कर सकता है
  • धान(चावल) को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े को चावल-मछली की खेती नियंत्रित करता है
  • चावल-मछली की खेती फसल के फेल हो जाने के खतरे को कम करता है
  • चावल-मछली की खेती घास-फूस पर रोक लगाने में उपयोगी
  • चावल-मछली की खेती चावल की उपज को बढ़ाती है क्योंकि मछलियां मिट्टी के पोषक तत्वों को जगा देती हैं जो चावल की खेती के लिए सहायक होती है।

एकीकृत चावल और मछली पालन के नुकसान-

  • चावल और मछली की खेती में नियंत्रित तरीके से कीटनाशक के इस्तेमाल की आवश्यकता होती है
  • सिर्फ धान(चावल) की खेती के मुलाबले इस एकीकृत चावल और मछली वाली व्यवस्था में ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है
  • इस व्यवस्था में चावल की पैदावार कम होती है क्योंकि जरूरी धान की फसल से करीब 45 सेमी नीचे क्यारियां(ट्रेन्चेज) बनाने की जरूरत पड़ती है, जिसकी वजह से धान की उपज का क्षेत्र कम हो जाता है, जिससे कम पैदावार होती है। क्यारियों की खुदाई की वजह से पानी को निकालने में परेशानी होती है।
  • एकीकृत चावल और मछली फार्मिंग में पानी का बहाव बहुत जरूरी होता है और धान के खेत कभी भी सूखे नहीं रहने चाहिए क्योंकि ऐसे में मछलियां खेत में फंस जाती हैं।
  • खुले तालाब में मछली पालन के मुकाबले चावल-मछली की खेती में उत्पादन कम होता है और मछलियों का आकार भी छोटा रहता है।
  • व्यावसायिक तौर पर चावल-मछली की खेती में दिक्कतें हैं लेकिन फिर भी ऐसे में चावल की खेती के साथ मछलियों का भी उत्पादन करना पड़ेगा। ऐसे में मछलियों को बेचने में काफी दिक्कतें आ सकती हैं।
  • अधिकांश धान के खेतों की सिंचाई एक समान पानी के श्रोतों से की जाती है और ऐसे में पानी की गुणवत्ता या कीटनाशक दवाओं की जांच बेहद मुश्किल हो जाती है।
  • सिर्फ चावल की खेती के मुकाबले धान के खेतों में मछली उत्पादन के कार्य के लिए ज्यादा निवेश की जरूरत पड़ सकती है।
  • सिर्फ धान की खेती के मुकाबले चावल और मछली की खेती में ज्यादा श्रम की आवश्यकता होती है।

एकीकृत चावल और मछली की खेती के लिए उपयुक्त जगह का चुनाव-

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धान के खेत में चावल और मछली की खेती के लिए जगह का चुनाव बेहद अहम भूमिका निभाता है।

  • करीब 70 से 80 सेमी की बारिश की जरूरत होती है जो इस तरह की एकीकृत व्यवस्था के लिए आदर्श होता है।
  • चावल और मछली की खेती में उच्च पानी की वहन क्षमता और एक समान क्षेत्र वाली मिट्टी को प्रमुखता दी जाती है।
  • एकीकृत फसल व्यवस्था के लिए जगह के चुनाव में अच्छी पानी निकासी की व्यवस्था भी प्रमुख तत्वों में से एक है जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
  • जगह का चुनाव बाढ़ प्रभावित इलाके से हटकर होना चाहिए नहीं तो यहां की मछलियां निकल कर भाग सकती हैं।

एकीकृत चावल और मछली उत्पादन के लिये मछली का उपयुक्त प्रकार कौन सा है –

एकीकृत चावल और मछली उत्पादन के लिये मछली की कौन सी प्रजाति उपयुक्त है? मछली की ऐसी प्रजाति जो 14 सेमी से भी कम पानी में रह सके और38 डिग्री सेंटीग्रेड तक के तापमान को बर्दाश्त कर सके, उसका चुनाव करना चाहिए। इस तरह की मछलियों में ऑक्सीजन की कम घुली हुई मात्रा और गंदलापन को बर्दाश्त करने की क्षमता होनी चाहिए। मछली की निम्नलिखित प्रजाति धान की खेती के साथ पैदा की जा सकती है। पानी की गहराई, धान की खेती की अवधि और चावल की प्रजाति एकीकृत व्यवस्था में मछली की प्रजाति के चयन में अहम भूमिका निभाता है।

  • सामान्य कार्प या मृगल (धान के साथ कार्प(बड़ी मछली) संस्कृति)
  • कतला (धान के साथ कार्प संस्कृति)
  • तिलापिया (धान के साथ कार्प संस्कृति)
  • रोहू (धान के साथ कार्प संस्कृति)
  • कैटफिश (धान के साथ हवा में सांस लेने वाली संस्कृति)

नोट- इसके अलावा झींगा (श्रीम्प) का पालन धान के खेत में किया जा सकता है।

धान की तैयारी, चावल और मछली की खेती का प्रबंधन-

अगर आप धान की खेती के साथ मछली उत्पादन करना चाहते हैं तो पारंपरिक चावल के खेत में कुछ बदलाव करने होंगे, जैसे कि अच्छा मछली आश्रय और कटाई के क्षेत्र में बदलाव करने होंगे। इस तरह के धान के खेत के लिए गहरी खाइयां(ट्रेंचेज), नहर या हौज की जरूरत होती है। चावल के खेत में ये गहरी खाइयां अच्छी और सफल चावल-मछली खेती के लिए अच्छे मौके देती है। जब पानी का स्तर कम हो, गलियारा में भोजन की तलाश, मछली इकट्ठा करने के आसान उपाय जब चावल के खेत सूखे हैं, ऐसे में यह सब काफी मददगार साबित होता है। जब बात चावल की प्रजाति की बात आती है तो धान और मछली की खेती में गहरी पानी की किस्म (प्रकार) सबसे बेहतर होता है।

गहरी खाइयां को 0.5 मीटर गहरा और कम से कम एक मीटर चौड़ा बनाया जाना चाहिए। इस बात को सुनिश्चित किया जाना चाहिए की गहरी खाइयां धान के पौधे से 10 मीटर के दायरे में हो। चावल की अच्छी पैदावार के लिए इस बात को सुनिश्चित करें कि गहरी खाइयां धान के क्षेत्र से 10 फीसदी से ज्यादा ना हो। मछली के भंडारण के बाद 10 से 15 सेमी पानी की गहराई सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि मछली के जीवन को पक्का किया जा सके। चावल-मछली की खेती में दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि खेत का पानी विषैले तत्वों (कीटनाशक पदार्थ) से दूर रहना चाहिए।

चावल और मछली की खेती में ऊर्वरक डालने का कार्यक्रम (समय सारिणी)-

गोबर जैसे अच्छी तरह से घुला हुआ फार्म यार्ड खाद या दूसरा कोई जैविक कम्पोस्ट को प्रति हेक्टेयर 25 टन डालने की सलाह दी जाती है। एकीकृत व्यवस्था में गहरे पानी में धान को ज्यादा पोषक तत्व, अजैविक ऊर्वरक के तौर पर प्रति हेक्टेयर 50 किलो नाइट्रोजन और पोटैशियम डालने की सलाह दी जाती है। इन ऊर्वरकों (नाइट्रोजन और पोटैशियम) को अलग-अलग चरणों जैसे कि पौधारोपन, जुताई और फूल आने के वक्त इस्तेमाल करना चाहिए। कीटनाशक, कृमिनाशक या रसायन के इस्तेमाल से बचना चाहिए।

चावल और मछली की खेती में मछली का प्रबंधन-

धान के खेत में मछली पालन की संस्कृति में प्रमुख प्रबंधकीय कार्य क्या हैं इसका विवरण नीचे दिया गया है। इसमे मछली की प्रजाति, संग्रहण घनत्व और जगह पर प्रबंधन का कार्य निर्भर करता है।

 

  • मछली संग्रहण
  • चारा
  • ऊर्वरक
  • पानी की गुणवत्ता पर नियंत्रण
  • मछली की पैदावार
  • मछली का पुन: संग्रहण

मछली की खेती को दो तरीके से लागू किया जा सकता है। पहला, संयुक्त या एक साथ और दूसरी चक्रीय खेती। संयुक्त खेती में धान और मछली का उत्पादन एक साथ किया जाता है जबकि चक्रीय खेती में मछली और चावल का उत्पादन अलग-अलग तरीके से यानी एक के बाद दूसरे का उत्पादन किया जाता है। चावल की खेती के बाद चावल के खेत को अस्थाई तौर पर तालाब में बदल दिया जाता है। दोनों तरह की व्यवस्था में मछली संग्रहण का घनत्व और मछली उत्पादन अलग-अलग होता है। संयुक्त खेती की मौजूदा व्यवस्था के मुकाबले चक्रीय खेती ज्यादा फायदेमंद है।

धान के अधिकांrice-fish 2श खेतों में कॉमन कार्प (तालाब की बड़ी मछली) प्रजाति की मछली मुख्य मछली होती है जिसकी खेती की जाती है। अब यह किसान पर निर्भर करता है कि वो सिर्फ मछली की खेती करेगा या फिर मछली की मिश्रित खेती करेगा। हालांकि अधिकांश एशियाई देशों में चावल के खेतों में अलग तरीके से मछली की खेती या पालन किया जाता है। आमतौर पर धान के खेत में 30 से 45 सेमी गहरी ट्रेंचेज या खाइयां(सतह की), 25 सेमी ऊंचा तटबंध, बांस के खंबे और झरने के पानी के आने-जाने का मार्ग होता है। धान के पौधारोपन के एक सप्ताह के बाद मछली का भंडारण किया जा सकता है। मछली का स्टॉक या भंडार मछली के प्रकार, उम्र और जगह पर निर्भर करता है। एक सेमी आकार की फ्राय या फिंगरलिंग्स (मछली का बच्चा) (कार्प या तिलप्पा) को धान के खेत में स्टॉक कर सकते हैं। एक हेक्टेयर में सामान्यतौर पर फिश फ्राय का घनत्व 3000 से 4000 हजार तक हो सकता है। चावल के खेत में मछली की खेती के दौरान 7 से 18 सेमी के बीच पानी की मात्रा को बनाए रखना चाहिए। प्रतिदिन फिश बायोमास की 5 फीसदी मात्रा अनुपूरक भोजन के तौर पर दिया जा सकता है। इस भोजन में सोयाबीन आटा (10 फीसदी), गरी आटा (20 फीसदी) और चावल की भूसी (70 फीसदी) से मिलाकर बनाया जा सकता है।30 दिनों के बाद मछली के विकास को जांचने के लिए (मछली के विकास को जांचने का नमूना) चावल के खेत से पानी निकाला जा सकता है और उसके बाद फिर धान के खेत में पानी भर देना चाहिए और मछली को डाल देना चाहिए। आमतौर पर मछली के विकास करने या बढ़ने की अवधि 70 से 100 दिन के बीच होती है। धान की कटाई से एक सप्ताह पहले मछली को निकाल लेना चाहिए। जब पैदावार की बात आती है तो यह कई बात पर निर्भर करता है,जैसे कि मछली का प्रकार, चारा या भोजन, जिंदा रहने की दर और पानी की गुणवत्ता। विकास करने की 100 दिन की अवधि के दौरान सामान्य तौर पर प्रति हेक्टेयर 200 से 300 किलो मछली की पैदावार होती है। मछली का भार खेत में मौजूद पोषक तत्व और अनुपूरक भोजन तय करता है। कोई भी कॉमन कार्प फ्राई, ईयरलिंग कॉमन कार्प फ्राई और गोल्ड फिश फ्राई के साथ मिश्रित खेती कर सकता है।

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