बैंगनी, सफेद और गुलाबी भिंडी, नीली मूंगफली, गोल खीरे और भी बहुत कुछ – बेंगलुरू में तकरीबन ढाई एकड़ में फैले डॉ. प्रभाकर राव का फार्म ऐसे ही अनगिनत वनस्पतियों के साथ ही विदेशी एवं दुर्लभ किस्म के अनेकों वनस्पतियों का खजाना समेटे हुए है। आप उनसे बात करेंगे तब आपको पता चलेगा कि इन वनस्पतियों में से आधिकांश अब भारत में उपलब्ध नहीं हैं।

वनस्पति प्रजनन और आनुवांशिकी में पीएचडी साठ वर्षीय डॉ राव ने कई वर्षों तक दुनिया भर में घुम घुम कर सब्जियों की संकटग्रस्त एवं दुर्लभ किस्म के बीजों को एकत्रित किया। पेशे से वास्तुविद् और जुनुन से किसान डॉ राव सन 2011 में अपनी सेवानिवृति के बाद दुबई से भारत लौट आए। आज इनके पास आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के सीमा पर उगाई जाने वाली सेब के आकार की और नींबू का स्वाद लिए गोल खीरा दोसाकई, जापान में पाया जाने वाला बैंगनी रंग का कामो, यूरोपीय देश मोलदीवा में पाए जाने वाली जड़ी बूटी जिस पर लैवेंडर और नींबू मिश्रित सुगंध लिए फूल खिलते हैं, अविश्वसनीय मीठी गोल मीर्च सहित लुप्तप्राय हो चुके तकरीबन 560 संकटग्रस्त सब्जियों एवं वनस्पतियों का जखीरा मौजुद है।

डॉ. राव कहते हैं, “पिछले बीस सालों में हम जो सब्जियां खाते हैं उनके प्रजातियों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। ये इसलिए है क्योंकि मूल सब्जियां देशी या स्वदेशी किस्म की होती थीं जिनका उपयोग करके किसान हर सीजन अपने स्वयं का बीज निकाल सकता था। डॉ राव आगे कहते हैं कि दरअसल बीजों की कंपनियों का आज का व्यापार मॉडल ऐसा है कि बीज खरीदने के लिए किसान को हर सीजन में उनके पास जाना ही जाना है। बीज कंपनियों के बारे वो कहते हैं, “कंपनियां ऐसे बीजों का उत्पादन करती हैं जो उनके लिए लाभप्रद है। इसलिए आज हम जो सब्जियां खाते हैं उनमें से 90 फीसदी सब्जियों संकर प्रजाति की हैं। परिणाम स्वरूप प्रत्येक साल तकरीबन देशी सब्जियों की सैकड़ों प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच जाती हैं”। 

कंपनियों के इस फर्जीवाड़े को समझने के बाद डॉ राव हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठे। उन्होंने अंतरर्राष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल सीड सेवर्स एक्सचेंज के साथ मिलकर इससे निपटने के मुहिम शुरू कर दी। इंटरनेशनल सीड सेवर्स एक्सचेंज दुनिया भर में व्यक्तियों का एक स्वैच्छिक निकाय है जो लुप्तप्राय सब्जियों के बीज इकठ्ठा करता है और आपस में साझा करता है। 
भारत लौटने के बाद उन्होंने अपने पास जमा किए गए बीजों को भारतीय परिस्थितियों में खेती कर उन बीजों का परीक्षण करना शुरू किया कि इकठ्ठा किए गए बीजों में से कितने बीज भारतीय परिस्थितियों में खेती के अनुकूल हैं। इस परीक्षण से उन्होंने जमा किए गए बीजों में से 142 प्रजातियों के बीजों को भारतीय जलवायु के अनुकूल करने में सफलता पाई। इन्हीं 142 बीजों की मदद से उन्होंने हरियाली सिड्स की शुरूआत की। इस फर्म के जरिए उनका पूरा परिवार दुनिया भर से विलुप्त प्राय प्रजातियों के बीजों को इकठ्ठा करके उन्हें किसानों को उपलब्ध कराता है।
हरियाली में उपलब्ध बीजों में से अधिकांश विदेशी नस्ल के हैं और आम तौर पर आज एक उत्पाद के तौर पर ये बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। शुरूआत के कुछ साल उन्होंने इन बीजों से स्वयं उत्पादन लेकर उनका स्टॉक इस हद तक अपने पास बढ़ाया ताकि वो इन बीजों को किसानों और माली को बेच सकें। उन्होंने कुछ किसानों को ये बीज मुफ्त भी उपलब्ध कराए। इस पूरे आयोजन के पीछे उनका तर्क ये था कि अगर इन बीजों को कीचन गार्डन में ही सही लगाया जा सके तो पूरी तरह 
विलुप्त होने के खतरे के विपरीत कम से कम दुनिया के किसी कोने में ही सही इनकी खेती होती रहेगी। 

हरियाली से किसी किसान को बीज एक बार ही खरीदना होता है क्योंकि अगली बार के लिए बीज का उत्पादन किसान स्वयं कर सकता है। डॉ. राव बताते हैं, “अगर कोई पक्षी या पशु विलुप्त प्राय होता है तो पूरी दुनिया उस पर अपना फोकस बढ़ाती है लेकिन लोग ये नहीं जानते हैं किसी भी वजह से कि सब्जियों की कितनी प्रजातियां विलुप्त प्राय हो गईं। देशी प्रजातियों की वनस्पतियां हमारे जीवन में अहम भूमिका निभा सकती हैं। ये प्रजातियां जलवायु परिवर्तन का मुकाबला कर सकती हैं,सूखे की हालात एवं रोग और कीटों से स्वयं लड़ने में सक्षम हैं। सबसे बढ़कर बीजों की ये प्रजाति जैविक खेती पद्धति के अनुकूल हैं। इनको लेकर इनसे संकरित बीज या आनुवांशिक रूप प्रसंस्कृत बीज तैयार करने की बजाए ये बुद्धिमतापूर्ण होगा कि हम इनकी ही खेती फिर से शुरू करें”।
बीज खरीदने की प्रक्रिया के बारे में डॉ राव बताते हैं कि दुनिया में कुछ जगहें ऐसी हैं जहां से आप इस तरह के पुराने बीज प्राप्त कर सकते हैं। ये स्थान मध्य एशिया, दक्षिण अमेरिका, मलेशिया, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों और चीन के कुछ दुरस्थ इलाकों में है। इन जगहों पर आपको पुरानी पीढ़ी के उन किसानों को खोजना पड़ता है जिनके पास विशिष्ट प्रकार के बीज हों। उदाहरण के लिए बंग्लादेश में कभी बैंगन की एक प्रजाति उगाई जाती थी जो पिछले पंद्रह सालों से बाजार में नजर नहीं आता है। ये बैंगन रंग और आकार में विशिष्ट था और बिरयानी में इसका इस्तेमाल होता था। डॉ राव कहते हैं, “मैं पश्चिम बंगाल की यात्रा पर था जब मैंने कुछ बुजुर्ग किसानों से इसके बारे में बात की, उनमें से एक ने मेरे हाथ में इस बैंगन के कुछ सूखे बीज रख दिए। आज मेरे पास इस प्रजाति के बैंगन की कम से कम एक हजार बीज हैं”। 

वो खुद को भारत में लाई गई हरित क्रांति का एक हिस्सा मानते हैं। हरित क्रांति में व्यापक रासायनिक खेती पर जोर था, सिंचाई के लिए बड़े – बड़े बोरवेल पर जोर था। किसानों को यूरिया, कीटनाशकों का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया जाता था। हरित क्रांति के दिनों के अपने अनुभव बताते हुए डॉ राव कहते हैं, “लेकिन जो मैं कर रहा था उसके प्रति मेरे मन कभी गहरा विश्वास नहीं था। हमने हरित क्रांति की, देश खाद्यान्न के मामले में इसकी मदद से आत्मनिर्भर भी बना लेकिन मैं हमेशा खुद से ये सवाल पूछता था कि क्या ये स्थायी और सतत है”। इस बात से इन्होंने अपनी शिक्षा की दिशा बदल ली और वो आर्किटेक्चर की पढ़ाई करने के लिए लुइसियाना चले गए। हालांकि अब भी पर्यावरण के प्रति उनका प्रेम बरकरार था। अपने पूरे कैरियर के दौरान उन्होंने पर्यावरण हितैषी आर्किटेक्चर तकनीक को बढ़ावा दिया।

आज वो अपने फार्म पर लोगों को निमंत्रित कर उन्हें बीजों के बारे में बताते हैं और इन बीजों की खेती की तकनीक से उन्हें वाकिफ कराते हैं। अमेरिका से लौट कर उनका बेटा भी उनके फार्म में हाथ बंटाने लगा। इसके साथ ही तीन अन्य लोग भी उनके फार्म पर काम करते हैं। डॉ राव कहते हैं, ” जब मैं भारत लौटा तो मेरा विचार था कि मैं अपने पेशे से मुक्त होकर वो काम करूंगा जो मैं पसंद करता हूं। देशी बीजों की खेती कर उनका ज्यादा से ज्यादा तैयार करना मेरे लिए कोई काम नहीं था बल्कि मेरा जुनून था। मेरे प्रत्येक दिन सुबह सुबह उठना पसंद करता हूं कि क्योंकि सुबह सुबह फार्म पर कुछ न कुछ होता रहता है। ये गतिविधियां मेरे जीवन के लिए बहुत उत्साहजनक हैं”।

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