Rain-run1अन्नासाहब उद्गावी का चाल चलन अस्सी साल के आयु वाले आधिकांश वृद्ध की तरह नहीं है। हममें से अधिकांश अपने जीवन के उत्तरार्ध में सेवानिवृत होकर आराम करना पसंद करते हैं। लेकिन उनका अंदाजे बयां जुदा है। वो मोटरसाइकिल चलाते हैं, रे बैन का चश्मा कभी हाथों में लहराते हैं या कभी आंखों पर चढ़ाते हैं, साथ में सर पर गांधी टोपी । हमेशा बेदाग सफेद धोती कुर्ता पहनने वाले 82 वर्षीय अन्वेषक, किसान और चार पोते पोतियों के दादा अन्नासाहब परलोक की बातें, या अध्यात्मिक चर्चा करने की बजाए हमेशा उपकरणों, मशीनों और औजारों से घिरे रहना ज्यादा पसंद करते हैं। 82 साल के उम्र में भी बच्चों जैसी उत्सुकता, विचारों में युवापन लिए जीवनोपयोगी उपकरणों के अन्वेषण और निर्माण में लगे हैं। यही वजह है कि नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने उन्हें उनके जीवन भर की उपलब्धियों के लिए लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया।

महज़ बीस साल के आयु से ही अपने नए नए विचारों को अन्वेषण के रूप में अमली जामा पहनाने का उनका ये सफर शुरू हुआ जो आज तक बरकरार है। इस क्षेत्र में उनका योगदान बहुत व्यापक है, उन्होंने नवीनकरणीय ऊर्जा से लेकर कृषि क्षेत्र तक के लिए उपयोगी उपकरणों का निर्माण किया।

उद्गवी अपने दो बेटों, बहुओं और पोते पोतियों के साथ कर्नाटक के बेलगामम जिले के छिकोड़ी तालुके के सदलगा गांव में रहते हैं। चालीस के दशक में स्कूल के उबाऊ रूटीन से बोर हो चुके युवा और जिज्ञासु उद्गवी अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए अपने आस पास की हर चीज को बड़ी बारीकी से देखते थे। तकरीबन दस वर्ष के रहे होंगे उद्गवी जब वो अपने दोस्तों के साथ पास ही बहने वाली एक नदी के पास खेल रहे थे, तभी उनकी नज़र स्थानीय प्रजाति की छुऊ मुई पौधे पर पड़ी। उद्गवी बताते हैं, “बच्चों के हाथ से छूते ही ये गुलाबी- बैंगनी रंग का पौधा सिकुढ़ जाता था। फूल की घूर्णन गति ने मुझे सोचने को मजबूर कर दिया… जो मेरे पहले अन्वेषण के रूप में सामने आया, एक घड़ी जो कि जल की बूंदों से चलता था”। साठ के दशक के पूर्वार्द्ध में आई ये घड़ी जो कि जल डालने पर चलती थी। घडी की सेंकेंड की सूई पर निर्धारित वक्त पर डिंसपेंसर से जल की बूंदे गिराई जाती तो सेकेंड की सूई घूर्णन गति से आगे बढ़ती हैं। अपने इस अन्वेषण के लिए बाद में उद्गवी को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से प्रशंसा पत्र भी प्राप्त हुआ। और इसके बाद शुरू हुआ अन्वेषणों का सिलसिला: मोढ़ने वाला क्षैतीजिक चरखा से लेकर कुंएं में उपर नीचे किया जा सकने वाले मोटर तक जिससे उपयोगकर्ताओं को मोटर में आसानी हो सके। जब उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि बुआई की प्रक्रिया के दौरान वो बीजों को बर्बाद कर देते हैं तो उद्गवी ने बैलों के साथ जोड़ कर चल सकने वाली बुआई मशीन बनाने का निर्णय किया जिसे बैलों के साथ जोड़ देने पर एक दो बीजों के बीच एक निर्धारित दूरी रख कर एक एक कर बीजों की बुआई कर सके। सन 1962 में उन्होंने क्षैतिज चरखे का निर्माण किया जिसको आसानी से मोड़ कर एक सूटकेस में बंद किया जा सकता था। उन्होंने साबरमती आश्रम में अपने बनाए चरखे की प्रदर्शनी की जिसके बाद उनके डिजायन में कुछ और सुधार करके अधिक उत्पादन के लायक बनाया गया। उनका एक और अन्वेषण रहा ‘चंद्रप्रभा’, एक घूर्णन स्प्रींलकर जो एक विशाल भू खंड की सिंचाई बहुत कम पानी में कर सकता था। उद्गवी बताते हैं कि इस उपकरण की कीमत महज पांच हजार रुपये है, और ये महज एक घंटे में और वाटर गन के एक स्प्रे में एक एकड़ भूखंड की सिंचाई कर देता है। उद्गवी अपने प्रयासों के बारे में बताते हैं, “मैं जो करना चाहता हूं वो करता हूं क्योंकि ये मुझे प्रेरणा देता है। बांकि सब कुछ एक भरपेट भोजन के बाद एक मिठाई की तरह कार्य करता है”।

RainRun2सत्तर के दशक के मध्य में, अपने पान के बाग को पानी के तीव्र संकट से बचाने के लिए अन्नासाहब ने इलेक्ट्रिकल वायरिंग में लगने वाली पीवीसी पाइप में कील की मदद से छेद करके सिंचाई की। बाग में इसकी मदद से उन्होंने सात साल तक प्रति दिन एक घंटे की सिंचाई की। ये अन्नासाहेब की उस वक्त की अपनी ड्रीप सिंचाई की तकनीक थी, जिस वक्त दुनिया के इस हिस्से में कोई ड्रीप सिंचाई की तकनीक शब्द से भी वाकिफ नहीं हुआ था।

अस्सी के दशक में उन्होंने अपने गन्ने की फसल को एफीड और व्हाइट फ्लाई जैसे कीटों से बचाने के लिए चंद्र प्रभा नाम की घुमने वाली स्प्रींक्लर प्रणाली का निर्माण किया जो 140 फीट दूरी तक कवर कर सकती थी। कीटों को दूर रखने के साथ ही साथ चंद्रप्रभा ‘रेन गन’ डेढ़ घंटे में एक एकड़ खेत की सिंचाई कर सकती है। सामान्य तौर पर एक निश्चित इलाके में सिंचाई के लिए जितने पानी की आवश्यकता होती है उतनी ही पानी में रेन गन उससे दुगुने इलाके को सिंचित कर सकती है। इस स्प्रींक्लर का इस्तेमाल सिंचाई के साथ साथ पानी के टैंक में उर्वरकों या पौधों की रक्षा करने वालों रासायनों को मिलाकर छिड़काव के लिए भी किया जा सकता है। इससे किसानों को श्रमिकों पर होने वाली लागत की बड़ी बचत होती है। इससे भी महत्वपूर्ण, रेन गन में तीन इंच की पाइप और विस्तृत नोक होता है, इसलिए कंपोस्ट को भी घोल के रूप में मसलन बायोगैस घोल आदि का प्रयोग पौधों पर कर सकते हैं।rain-gun-1

नब्बे के दशक और उसके बाद:  नब्बे के दशक के पूर्वार्ध में अन्नासाहब ने सक्शन पंप की मदद से पैरों से चलने वाले दूध निकालने की मशीन बनाई। साथ ही गन्ने की बुआई के दौरान मजदूरों के संकट से आजिज होकर और ट्रेक्टर में होने वाली डीजल की खपत पर आने वाले खर्च से बचने के लिए अन्नासाहब ने एक उपकरण का विकास किया जो बेहतर फसल उत्पादन के लिए एक साथ तीन काम कर सकता है। इस उपकरण को 30-40 हॉर्स पॉवर के ट्रेक्टर से जोड़ कर कई काम मसलन क्यारी बनाने, बीजों की बुआई, खाद का प्रयोग और फसल की कटाई जैसे सभी काम एक साथ या अलग अलग भी किए जा सकते हैं। वो इस मशीन का इस्तेमाल का लंबे समय से कर रहे हैं और मशीन का पेटेंट भी उन्होंने हासिल किया है।

उद्गवी के पास कोई औपचारिक शिक्षा नहीं है। वो शायद ही पढ़ या लिख सकते हैं। मराठी मिश्रित कन्नड़ में वो बताते हैं, “जब मैं बच्चा था तो गांव में कोई स्कूल नहीं था। मैं कुछ दिनों के लिए पास ही स्थित एक गांव में मौजुद स्कुल गया लेकिन वो बहुत दूर था और अधिकांश दिनों में वहां कोई शिक्षक भी नहीं पहुंचते थे”।

गांधीवादी और तर्कवादी उद्गवी कहते हैं कि उनके पास अंधविश्वास और स्थानीय रीति रिवाजों के लिए समय नहीं है। अपनी धोती का पल्ला समेटते हुए बातचीत के क्रम में ही बड़े अनौपचारिक तरीके में उद्गवी बताते हैं कि उनका मकान जिस जमीन पर बना है उसे लोग पचास साल पहले एक व्यक्ति की हत्या हो जाने की वजह से अशुभ मानते थे लेकिन फिर भी उन्होंने तकरीबन तीस साल पहले सस्ते में ये जमीन खरीद कर अपना घर बनवाया। जोर का ठहाका लगाते हुए उद्गवी कहते हैं, “ये अच्छा ही हुआ क्योंकि थोड़ा सा अंधेरा होने के बाद ही बहुत से लोग उनके घर की तरफ आते ही नहीं हैं”।

अन्वेषी होने के साथ साथ उद्गवी स्वयं प्रशिक्षित शिल्पकार भी हैं। उन्होंने देश के अंदर और नेपाल एवं भूटान जैसे पड़ोसी देशों में जाकर कई मंदिरों का दौरा किया बुद्ध मूर्तिकला एवं अन्य धर्मों की मूर्तिकला की बारीकियां सिखीं। सदलगा में उनके घर के बाहर भी उन्होंने जैन तीर्थंकर महावीर का स्मारक बनवाया है। स्मारक में एक तरफ उनके माता पिता की और दूसरी तरफ महात्मा गांधी की भी प्रतिमा है।

बढ़ती उम्र के बाद भी उनके प्रयास की रफ्तार रुकने की बजाए और भी जिज्ञासु और दुस्साहसी हो उठा है। अपने परिजनों, खेत, दो गाय और दो भैंस से घिरे उद्गवी कहते हैं अब भी अपने हाथों से बने आधे अधूरे उपकरणों के लिए चिंतित हैं। उद्गवी अपने हाथों से बनाए हुए अधूरे उपकरण हमें दिखाते हुए बताते हैं, “मैं अपने आंखों की कम होती रौशनी के लिए चिंतित हूं। मैं छोटी चीजों को अब नहीं देख सकता हूं। यही वजह है कि मैं अपने बनाए उपकरणों का भी इस्तेमाल नहीं कर सकता। जब तक संभव होगा मैं काम करता रहुंगा लेकिन अब इसे बहुत लंबे समय तक खींच पाना संभव नहीं होगा। कुल मिलाकर मेरा जीवन अच्छा रहा”।

ज़ाहिर है भारत के गांवों को ऐसे ही कई अन्ना साहब की जरूरत तो है ही।

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