यह झारखंड राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। गया के शेरघाटी अनुमंडल मे यह गाँव नीमा पैक्स के अंतर्गत आता है। इस गाँव में मुख्य रूप से पिछड़ी जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोग रहते हैं। प्राकृतिक विडम्बना एवं आर्थिक अभाव के कारण पिछले दो दशकों से इस गाँव में कृषि उत्पादन लगभग ठप्प सा पड़ गया था। इफको के अथक प्रयासों तथा गांववासियों के सहयोग से इस गांव का लगभग कायाकल्प सा हो गया है। गाँव का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 185 एकड़ है जिसमें 165 एकड़ खेती योग्य जमीन है। गांव के 105 परिवार खेती से ही अपनी आजीविका अर्जित करते हैं।

घिरसिन्डी परियोजना का संक्षिप्त विवरण
(कुल
कृषि योग्य फसल क्षेत्र – 80 हैक्टेयर)

विवरण

परियोजना से पूर्व

परियोजना के बाद

वास्तविक शुद्ध कृषि योग्य क्षेत्र ( हैक्टे.) 18 40
सिंचित क्षेत्र (%) 10 75
उच्च उत्पादकता वाली प्रजातियों का उपयोग (%) 10 70
हरी खाद के उपयोग (%) 0 60
पी एस एन खाद ​​का उपयोग करें (%) 0 15
दालें फसल खेती क्षेत्र (%) 15 35
संतुलित उर्वरक के उपयोग (%) 10 60
फसल सघनता 100 150
सूक्ष्म पोषक तत्व के प्रयोग 9 20
सब्जियों की खेती का क्षेत्र (%) 1 10
सामाजिक भागीदारी (%) 10 70
श्री विधि खेती (%) 0 15
अनाज की औसत पैदावार (क्विं. प्रति है.) 15 32
कृषक समूह (%) 0 20
स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या (%) 10 70
विस्थापन (%) 40 10

इस गाँव में कुल कृषि योग्य भूमि 60 हेक्टेयर है। इसमें लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र में ही वर्षा आधारित खेती की जाती थी जिसमें मुख्य रूप से पारम्परिक धान की खेती ही होती थी। परियोजना के प्रथम चरण में 32 हेक्टेयर क्षेत्र में फसल का उत्पादन लिया गया। यह गाँव फल्गू नदी के किनारे स्थित होने के कारण गांव की लगभग 80 प्रतिशत भूमि नदी के तटीय क्षेत्र में है। अतः लिफ्ट सिंचाई परियोजना के प्रारंभ होने के बाद इस गाँव के साथ-साथ निकटवर्ती दो और गाँव के किसानों को इसका लाभ मिला है।

 

लिफ्ट सिंचाई परियोजना का कार्य जनवरी, 2011 को आरंभ किया गया और जून, 2011 में इस परियोजना पर सुचारू रूप से कार्य होने लगा है। इफको के मृदा जीर्णोद्धार कार्यक्रम के तहत पहले चरण में लगभग 6 हेक्टेयर भूमि में ढ़ैंचा एवं मूंग की खेती की गई और उसमें आधुनिक तरीके से धान की फसल ली गयी जिसका उत्पादन औसतन 42 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त हुआ। इस गाँव में शुरु के वर्ष में एसआरआई विधि द्वारा दो प्रदर्शन कराए गये जो किसानों में काफी लोकप्रिय हुए। इस विधि से 92 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की पैदावार ली गयी।लिफ्ट सिंचाई परियोजना शुरु होने से पूर्व एवं बाद की प्रगति को तालिका में दर्शाया गया है।

लिफ्ट सिंचाई परियोजना के साथ ही साथ गाँव में अनेक प्रकार के विकासात्मक कार्य किये गये हैं जिसमें से मुख्य रूप से कृषक गोष्ठी, मृदा परीक्षण अभियान, सामाजिक कल्याण कार्यक्रम आयोजित किये गये हैं। इन कार्यक्रमों में गरीब बच्चों को स्कूल बैग, स्लेट एवं पेंसिंल आदि का वितरण किया गया है। गाँव में पशु चिकित्सा अभियान, स्वास्थ्य परीक्षण कार्यक्रम व महिला प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गये। ग्रामीण महिलाओं द्वारा स्वयं-सहायता समूह के गठन के माध्यम से ग्रामीण स्तर पर रोजगार हेतु प्रशिक्षण, जल उपयोग समिति के माध्यम से सब्जी उत्पादन, फल उत्पादन आदि का कार्य प्रगति पर है। महिलाओं एवं बालिकाओं हेतु इफको ने छह सिलाई मशीन सुलभ करायी हैं। इससे ग्रामीण महिलाएं व बालिकाएं प्रशिक्षण लेकर अपना रोजगार चला रही हैं।

 

परियोजना क्षेत्र में आयोजित नये कार्यक्रम

कृषि विकास तथा सिंचाई परियोजना के साथ-साथ परियोजना क्षेत्र में इफको द्वारा अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। गांव में बच्चों को स्कूल बैग का वितरण किया गया। किसानों में उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मृदा परीक्षण अभियानों का आयोजन किया गया। किसानों को खेती के आधुनिक तरीकों से अवगत कराने के लिए गांव में किसान सभाएं आयोजित की गयी। कम्पोस्ट खाद तैयार करने के लिए किसानों को पी एस एन गड्ढे तैयार करने में सहायता की गयी।

 

पशुधन कृषि कार्यों में महत्वपूर्ण आदान माना जाता है। अतः पशुओं को स्वस्थ रखना किसानों के लिए बहुत आवश्यक होता है। इस बात को इफको ने पहचाना है। इसी बात को ध्यान में रखकर गांव में पशु चिकित्सा अभियान सम्पन्न कराए गये हैं। इसके साथ-साथ किसानों व ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच के लिए स्वास्थ्य शिविर लगाए गये। खेत दिवस के माध्यम से किसानों को आधुनिक खेती की व्यावहारिक जानकारी दी गयी। प्रमाणित बीज, संतुलित खाद, कीटनाशक आदि के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए किसानों को आवश्यक कृषि आदान वितरित किये गये। गांव में किसानों को कृषि उपकरण वितरित किये गये।

वर्ष 2014-15 के लिए योजना

 

बैमौसमी सब्जी (5 हैक्टेयर में), मक्का (4 हैक्टेयर में) व अन्य साग-सब्जी (7 हैक्टेयर में) जैसी नकदी फसलों, वर्मी कंपोस्ट का उत्पादन, लघु स्तर के कुटीर उद्योग के लिए नारी सशक्तिकरण, महिलाओं के लिए सिलाई परियोजना, सामुदायिक आधार पर मिश्रित खाद तैयार करने पर बल, भेड़-बकरियों को रखने के स्थान की मरम्मत, 20 हैक्टेयर भूमि में हरी खाद उत्पादन, पीएसएन खाद ​​के गड्ढ़ों तथा वर्मी कम्पोस्ट खाद तैयार करने के लिए अधिक क्षेत्र को रखना आदि।

 

अब यह गाँव जीविकोपार्जन एवं खाद्यान के क्षेत्र में आत्म निर्भर हो गया है जिससे कृषकों का आर्थिक विकास हुआ है। कृषकों के बीच नकदी फसलों, सब्जी, दलहन, संतुलित उर्वरक एवं उन्नतशील प्रभेदों के प्रति जागरूकता बढ़ी है।

 

डा. अशोक नाग

प्रबंधक (प्रचार)

विपणन मुख्यालय, नई दिल्ली

 

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