आमतौर पर देश में ये धारणा रही है कि खेती बाड़ी का काम अशिक्षितों और उनके लिए है जो जीवन में कुछ और नहीं कर पाते हैं। लेकिन इस लोकप्रिय मिथ के विपरीत यदि आप शिक्षित हैं तो खेती बाड़ी का काम आप सामान्य कृषक से ज्यादा बेहतर और लाभप्रद तरीके से कर सकते हैं। इस बात का सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं पंजाब के फगवाड़ा स्थित विर्क गांव के 57 वर्षीय किसान अवतार सिंह। अवतार सिंह ने रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर किया है। वे कृषि को लाभप्रद बनाने के लिए जैविक खेती और अभिनव उपायों को अपनाने में ‘ट्रेंडसेटर’ के रूप में उभरे हैं।

वो कहते हैं “कृषि संकट का समाधान ‘वन जैव विविधता’ की अवधारणा में निहित है जिसे हम  विविधता भी कह सकते हैं। निश्चय ही हमें खेती के लिए ऐसी परिस्थितियां अपनाना चाहिए जो क्षेत्रीय वनस्पतियों और जीवों के अनुकूल हो”।

यदि आप अवतार सिंह की खेती करने के अभिनव प्रयोग को देखना चाहते हैं तो आपको दिल्ली-अमृतसर के हाई-वे के पास स्थित गांव विर्क की ओर चलना होगा, जहां उनके खेत में चारों और गन्नों से घिरे कपास के पौधे अपनी सफलता की कहानी बयां कर रही हैं।

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल,  विश्व खाद्य पुरस्कार विजेता कृषक डॉ. गुरुदेव सिंह खुश और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के वाइस-चांसलर बलदेव सिंह ढिल्लों, सहित कई अन्य से प्रशंसा पा चुके अवतार सिंह अपनी खेती के प्रगतिशील तरीकों के बारे में कहते हैं, “खेती की हमारी अवधारणा प्राकृतिक तत्वों (हवा, पानी, पृथ्वी और आकाश) के विवेकपूर्ण प्रबंधन पर आधारित है।cotton-production-market-times-tv

राज्य के दोआबा इलाके के मानचित्र से लगभग तिरोहित हो चुकी कपास की खेती के बीच अवतार सिंह के लहलहाते कपास की फसल को देखकर लगभग इलाके के हर किसान की आंखें चमक उठती हैं। पिछले 2 सालों से अपने 5 हेक्टेयर खेत में वो कपास की खेती कर रहे हैं और उनके इन खेतों में आमतौर पर कपास की खेती को नुकसान पहुंचाने वाले खतरनाक कीट व्हाइटफ्लाई का नामोनिशान भी नहीं है। उनका दावा है कि उन्होंने पिछले साल सफलतापूर्वक आधिकारिक अनुमान से कहीं ज्यादा प्रति एकड़ खेत में 15 क्विंटल से अधिक कपास का उत्पादन किया था।

इसके बावजुद कि प्रति हेक्टेयर में उन्होंने परंपरागत खेती के विपरीत बहुत कम ही बीजों की रोपाई की थी, उन्होंने ये सफलता हासिल की। अवतार अगले साल 20 हेक्टेयर तक कपास की खेती को बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। वो एक हेक्टेयर में 1,250 गन्ने की कली भी बोते रहे हैं जिनसे उन्हें 700 क्विंटल गन्ने का उत्पादन मिलता रहा है। इस तकनीक के माध्यम से उन्हें प्रतिदिन सिंचाई के लिए एक घंटे तक ही पानी की आवश्यकता होती है जिससे उन्हें पानी और बिजली दोनों की बचत होती है।

एक हेक्टेयर के खेत में बहु-फसल पैटर्न का पालन करते हुए, वह 70 एकड़ जमीन में एक साथ मक्का, गन्ना, दाल, बैंगन और सब्जियों को उगाकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उन्होंने अपनी इस शैली को तकरीबन सभी फसलों पर आजमाया है। अवतार ने एक एकड़ में 50 मिट्टी के बेड को तैयार किया है जिससे पौधों को धूप की रोशनी में पर्याप्त एक्सपोजर उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त दूरी रखी गई है।

अवतार सिंह कहते हैं, ” केवल एक बार मिट्टी को समतल कर देने के बाद डेढ़ साल बाद ही इसकी आवश्यकता होगी।”

COTTON_16_05इसके अलावा, अवतार ने सिंचाई के लिए पानी की बचत करने के तरीके को सफलतापूर्वक अपनाया है क्योंकि उनका तर्क है कि पौधों को केवल नमी की आवश्यकता होती है, न कि अतिरिक्त तरलता की, क्योंकि ये नमी अमृत के रूप में कार्य करती है। उन्होंने अपने इन तरीकों से मनमाफिक परिणाम प्राप्त किए हैं।

कृषि अधिकारी नरेश गुलाटी इस अभिनव प्रयोग के बारे में कहते हैं कि अवतार का दृष्टिकोण ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को पुनर्जीवित करने में मदद कर सकता है क्योंकि इससे बीज, श्रम, पानी और समय की बचत होगी।

इस अभिनव जैविक खेती की बारे में किसान अवतार सिंह कहते हैं कि हमारे यहां उत्तर भारत के किसान अक्सर  इस अभिनव तकनीक को देखने आते हैं और कई ने सफलतापूर्वक ये तकनीक अपनाई भी है। उन्होंने राज्य के किसानों को इस तकनीक का एक डेमो लेने के लिए आमंत्रित किया है और इस तकनीक का वीडियो प्रस्तुति भी तैयार की है और जिसे किसानों को मुफ्त में वितरित किया गया है।

 

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