बदल रहे भारत के गांवों में भी बहुत कुछ बदल रहा है। गुजरात के राजकोट निवासी मनसुख भाई प्रजापति ने भी अपने कूल स्टाइल से “मिट्टीकूल” को जन्म दिया जिसने बहुत हद तक उनके जीवन को एक नई दिशा प्रदान की है।

पेशे से कुम्हार मनसुखभाई ने अपने हुनर और कुछ अलग और नया करने की चाहत से न सिर्फ कुम्हार के परंपरागत पेश को नई उंचाइयां दिलाईं बल्कि ढेरों राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान भी हासिल किए। राष्ट्रीय अवार्ड और राष्ट्रपति अब्दुल कलाम और प्रतिभा पाटिल के प्रशंसा पा चुके मनसुख भाई को हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मैग्जीन फोर्ब्स ने ग्रामीण भारत के शक्तिशाली लोगों की सूची में स्थान दिया है। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने तो उन्हें ‘ग्रामीण भारत का सच्चा वैज्ञानिक’ के विशेषण से भी नवाज़ा था। मनसुख भाई कहते हैं “लोग गांवों के परंपरागत व्यवसाय के खत्म होने की बात करते हैं, जो गलत है। अभी भी हम ग्रामीण व्यवसाय को जिंदा रख सकते हैं बस उसमें थोड़ी सी तब्दीली करने की जरूरत है।”

आखिर कुम्हार के परंपरागत पेशे में क्या बदलाव किए मनसुखभाई ने कि उन्हें इस स्तर पर तारीफ मिली? बचपन से ही मिट्टी के बर्तन देखते और खेलते आए मनसुख भाई कहते हैं “मैं हमेशा सोचता था कि इस पुश्तैनी कारोबार को कैसे बरकरार रखा जाए। फिर हमने तय किया किया कि कारोबार को समय के साथ परिवर्तित करना होगा। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले परिवार की पहले बहुत पूछ होती थी। घर में कोई भी आयोजन हो, लोग हमारे घर की ओर दौड़े चले आते थे लेकिन बाजारवाद की वजह से अपनी साख पर बट्टा लगता नजर आ रहा था, इसलिए मैंने तय किया कि अपना पुश्तैनी कारोबार भी जिंदा रखूंगा और मिट्टी की खुशबू भी, बस उसमें थोड़ा परिवर्तन करने की सोची। यानी इस कारोबार को मार्डनाइज रंग में रंगने की कोशिश की। वैज्ञानिक तरीके से मिट्टी की नई नई चीजें विकसित की। इसके बाद तो यह कारोबार फर्राटे मारने लगा।”

गुजरात के राजकोट जिले में मोरबी के निचीमंडल में जन्में मनसुखभाई बचपन से ही कुम्हार के कार्य को सहजता से देखते आए थे। लेकिन 1979 में माछु डैम के टुटने से हुई तबाही में उनके परिवार ने सब कुछ खो दिया। वहां से पलायन करके उनका परिवार वांकानेर आ गया जहां उनके पिताजी ने एक मजदूर के तौर पर नई जिंदगी शुरू की। मनसुख भाई ने दसवीं तक पढ़ाई की लेकिन परिवारिक कठिनाइयों की वजह से आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख सके। परिवार को कठिनाइयों से बाहर निकालने के लिए वो कुछ करना चाहते थे। दरअसल उनका मन अपने परंपरागत काम काज को आगे बढ़ाने का था लेकिन बाजार में प्लास्टिक की आमद और पारिवारिक कठिनाइयों की वजह से कुछ दिनों तक वो इधर उधर कुछ न कुछ काम धंधा करते रहे। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारखाने में भी नौकरी की। इस कारखाने में नौकरी ही मनसुखभाई के जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। इसी कारखाने में काम करने के दौरान उन्होंने अपनी भविष्य के योजना की रूप रेखा बनाई। 

मनसुखभाई ने साल 1988 में ऋण लेकर मिट्टी के तवे बनाने का काम शुरू किया। एक तरफ 30 हज़ार रूपये के ऋण को चुकाने की चुनौती तो दो दूसरी तरफ फैसले को सफल बनाने की चुनौती।  मनसुखभाई बताते हैं कि उनका अनुमान था कि मिट्टी के बर्तनों को हाथों से आकार देने वाला कुम्हार एक दिन में सौ तवे बना सकता है। लेकिन पहले दिन वो सिर्फ 50 तवे ही बना सके। वह सुबह शाम तवे बनाते और दिन में उसकी बिक्री के लिए आस पास के गांवों में चक्कट काटते। अपनी पुरानी साइकिल के सहारे ही उन्होंने तवे बेचने का काम शुरू किया था। तवे की मांग बढ़ी तो ज्यादा उत्पादन की जरूरत पड़ी। अकेले थे इसलिए मांग की जरूरत के मुताबिक तवे बना नहीं पा रहे थे लिहाज़ा उन्होंने अपनी फैक्ट्री में हैंड प्रेस मशीन लगाई। यह एक दिन में सात सौ तवे बना सकता था।

पहली बार उन्होंने 50 पैसे का तवे बेचा था। बाद में 65 पैसे में बेचना शुरू किया। कई तरह की मिट्टियों का इस्तेमाल कर नए नए प्रयोग शुरू किए। कलरफुल बनाकर, तवे में कलात्मकता लाने की कोशिश की। इससे बिक्री एकाएक बढ़ी। ट्रेडर्स की नजर में भी आए मनसुखभाई। तवे की डिमांड शहरों से भी आने लगी। लिहाज़ा कारखाने में उन्होंने कुछ अन्य कारीगरों को भी रख लिया और भरपुर उत्पादन करने लगे। उनके कारखाने से तैयार माल शहरों में धूम मचाने लगा। तवे का कारोबार बढ़ा तो उसकी बिक्री के लिए माल पहुंचाने की समस्या आई। इसके लिए साल भर बाद एक मोटर रिक्शा का भी इंतजाम किया गया। 

यह वर्ष उनकी जिंदगी के लिए अहम था। वो याद करते हैं कि यह साल उनके लिए कई तरह की खुशियां लेकर आया था। इसी साल उनकी शादी भी हुई और कारोबार भी तेजी से बढ़ा। शादी के बाद उनके काम में उन्हें अपनी पत्नी का भी सहयोग मिला।

वर्ष 1990 में उन्होंने अपने कारखाने को रजिस्टर्ड कराया और नाम दिया मनसुखभाई राघवभाई प्रजापति। वर्ष 1992 में भुज के कुछ ट्रेडर्स उनके कारखाने में आए और कारखाने में बने सभी तीन हजार तवे एक साथ उनसे खरीद लिए। साथ ही भारी संख्या में तवे बनाने का आर्डर भी दिया। मनसुखभाई को इतने व्यापक स्तर पर पहली बार आर्डर मिला था, इसलिए उनका उत्साह दुगुना हो गया। इसके बाद वह फुटकर तवा बेचने के साथ ही भुज के लिए थोक में तवा सप्लाई करते रहे। मनसुखभाई अब अपने कारोबार में कुछ और नया करना चाहते थे।

वर्ष 1995 में उनकी मुलाकात राजकोट के व्यापारी चिरागभाई से वांकानेर में हुई। उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो चिकनी मिट्टी के बर्तन उन्हें थोक में उपलब्ध करा सके। चिरागभाई एक्सपोर्टर थे। वे अपना माल केन्या के नौरोबी सहित कई स्थानों पर भेजते थे। मनसुखभाई उन्हें अपने साथ अपने कारखाने लेकर आए अपने काम को दिखाया, साथ ही प्रयोग के तौर पर मिट्टी से बनाए अपने नए वाटर फिल्टर भी उनको दिखाया। इस वाटर फिल्टर को देखकर चिरागभाई काफी प्रभावित हुए और उन्होंने पांच सौ पीस का आर्डर दिया। फिल्टर का अहमदाबाद में लगी प्रदर्शनी में प्रदर्शन भी किया गया। वर्ष 2001 में उन्होंने इसका पेटेंट कराया और यहीं से शुरू हुआ ‘मिट्टीकूल’ का सफर।

मिट्टीकूल के इस सफर में सफलता ही मिलती गई ऐसा भी नहीं था। जनवरी 2001 में आए विनाशकारी भूकंप में मनसुखभाई प्रजापति को काफी नुकसान भी झेलना पड़ा। इस भुकंप में उनके कारखाने में बना सभी सामान नष्ट हो गया। हिम्मत के धनी मनसुखभाई ने तब भी हिम्मत नहीं हारी। इसी दौरान उनका संपर्क गुजरात ग्रासरूट इनोवेशन ऑगमेंटेशन नेटवर्क (जीआईएएन), अहमदाबाद से हुई। इस संपर्क के बाद उन्होंने वाटर फिल्टर को और बेहतरीन बनाने की कोशिश की। तय किया गया कि इसे फ्रिज जैसा बनाया जाए लेकिन इसमें बिजली की खपत न हो। मनसुखभाई ने इसके लिए विभिन्न वैज्ञानिकों से बातचीत भी की।

साल 2005 में उन्होंने मिट्टी के फ्रिज का निर्माण किया। एक वैज्ञानिक उनके कारखाने का निरीक्षण करने आया और मिट्टी के इस फ्रिज को देखकर इतना प्रभावित हुआ कि 100 पीस का ऑर्डर दिया और एडवांस में दो लाख रूपये भी पकड़ा दिए। इस ऑर्डर से मनसुखभाई और भी उत्साहित हुए और अपने काम में जोर शोर से लग गए। उनके मिट्टीकूल फ्रीज की तारीफ भी देश भर से होने लगी। उनके मिट्टी का वाटर फिल्टर पानी को एक माइक्रोन तक प्यूरिफाई कर सकता है। फिर उन्होंने एक रेफ्रिजरेटर बनाया जिसमें तीन दिनों तक दूध और सप्ताहभर तक सब्जियों को सुरक्षित रखा जा सकता था। इस रेफ्रेजरेटर को भी खूब वाहवाही मिली। मनसुखभाई बताते हैं कि जब लोगों को रेफ्रिजरेटर पसंद आया तो मुझे लगा कि मेरा जीवन सफल हो गया। 

वर्ष 2008 में सात्विक ट्रेडिभान फूड फेस्टिवल में वो अपने उत्पाद चिकनी मिट्टी के बने तवे, हांडी, गिलास, कटोरी आदि लेकर पहुंचे। कुछ ग्राहकों ने उनसे प्रेशर कुकर की  मांग की। अगले वर्ष इस आयोजन में वो मिट्टी के बने प्रेशर कुकर भी लेकर पहुंचे।

मिट्टी का रेफ्रिजरेटर बनाने के बाद ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने उनके हुनर को सम्मानित भी किया। प्रदर्शनी में उनके काम को देखकर पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी उनकी तारीफ करते हुए उन्हें ग्रामीण भारत का सच्चा वैज्ञानिक कहा था।

इन प्रशंसाओं और काम की प्रगति को देखकर मनसुखभाई प्रजापति बड़े उत्साहित रहते हैं। लगातार कुछ नया करने और अलग करने की चाह में आजकल मनसुखभाई एक और नई योजना को अमली जामा पहनाने में लगे हैं। उनका ये प्रयोग रंग लाया तो ग्रामीण भारत में ये अपने आप में एक नया और क्रांतिकारी प्रयोग होगा। वो ऐसा घर बनाने की कोशिश में हैं जो बगैर बिजली के 24 घंटा ठंडा रहे। वो सिर्फ नेचुरल लाइट का इस्तेमाल करके मकान को ठंडा रखने की कोशिश कर रहे हैं। मनसुखभाई को उम्मीद है कि आज नहीं तो कल इसमें उनको सफलता जरूर मिलेगी। अपने इस योजना की सफलता के लिए वो लगातार वैज्ञानिकों से संपर्क करके विचार विमर्श भी कर रहे हैं।mitticool8

अपने पिता की सफलता को देखकर मनसुखभाई का बेटा भी अब मृत्तिका शिल्पी तकनीक ( सेरेमिक टेक्नोलॉजी) में डिप्लोमा कर रहा है। वह पढ़ाई के दौरान जो भी सीखता है, उसके बारे में अपने पिता को जानकारी देता है। इससे मनसुखभाई को अपने कारोबार को और भी चमकदार बनाने में मदद मिल रही है। मनसुखभाई अपने ग्राहकों की प्रतिक्रिया को और भी महत्व देते हैं।

नई तकनीक को सीखने की ललक और कुछ नया समझने के उत्साह में उन्होंने अपने कार्यों के लिए एक वेबसाइट भी बनाई है मिट्टीकूल डॉट काम। इस पर वो लोगों से प्रतिक्रिया लेते हैं, अपने काम के बारे में बात करते हैं, कौन सा नया उत्पाद तैयार कर रहे हैं, इसके बारे में भी जानकारी देते हैं।

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