लगातार सूखे की मार झेल रहे महाराष्ट्र के मराठाबाड़ा इलाके के उस्मानाबाद जिले के इस गांव में मानसून का अब भी नामो निशां नहीं है।

लेकिन उज्जवल और नीले आसमां के मध्य इस निराशाजनक वातावरण में जमीन के विशाल हिस्सों में कहीं कहीं उग आए कांटेदार झाड़ियां जो कि बकरियों और भेड़ों के लिए चारे का काम करती हैं, के बीच बैठे कुछ किसानों ने अब भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है। इन किसानों ने मिलकर अफ्रीकन डेज़ी के नाम से मशहूर जरबेरा के फूल की खेती शुरू की है। सिंचाई के लिए बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत वाली गन्ने की खेती, वर्तमान परिस्थितियों में जिसकी पानी की जरूरत पूरी करना लगभग असंभव है, के विकल्प के तौर पर इन किसानों के लिए ये एक नई शुरूआत है।

पढोली में जरबेरा की खेती पॉलीहाउस के नीचे नियंत्रित वातावरण में की जा रही है। 2,321 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले तकरीबन पांच हजार की आबादी वाले इस गांव में अब तक 20 पॉलीहाउस खड़े हो चुके हैं। आम तौर पर सुखाग्रस्त और वीरान पड़े इस गांव में खिले ये गुलाबी, लाल और पीले रंग के फूल आंखों को राहत देते हैं।

महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में जरबेरा की खेती को प्रोत्साहन देने और किसानों को प्रशिक्षण देने के मकसद से पुर्तगाल की पुष्प प्रजनक मोंटीप्लांटा के साथ समझौता किया है। गांव में जरबेरा के फलते फुलते खेती को देखकर मोंटीप्लांटा भी बेहद प्रभावित है। एक किसान दावा करते हैं, “कंपनी जरबेरा के अगली उन्नत प्रजाति तक को अब लाने का फैसला किया है”।

पढोली के इन बारह किसानों के समुह में बालाजी पंवार भी शामिल हैं जिन्होंने फसल विकल्प के तौर पर पानी की अत्यधिक मांग वाले गन्ने से आगे बढ़ कर जरबेरा की खेती को अपनाया है ताकि न केवल उन्हें बेहतर आय हासिल हो सके बल्कि पानी की कमी वाले इस इलाके में फसल विकल्प के तौर पर एक स्थायी विकल्प भी उपलब्ध हो सके। बालाजी पंवार अपने इस सफर के बारे में कहते हैं, “प्रत्येक फूल पर हमारा लागत मूल्य अभी 1.75 रुपये लेकर 2 रुपये तक है। दूसरी तरफ हम इसे औसतन दस रुपये तक तो बेचते ही हैं बल्कि कई बार तो ये प्रति फूल 50 रुपये से 150 रुपये तक चला जाता है”।

किसानों का ये समुह अपने फूलों को किसान उत्पादक रजिस्टर्ड संस्था लोक कल्याण समुह के बैनर तले बेचते हैं। पिछले साल किसानों के इस समुह ने डेढ़ लाख जरबेरा के फूलों की बिक्री की जिससे इन बारह किसानों को पचास लाख रूपये की आमदनी हुई।

किसानों के इस समूह के एक अन्य सदस्य प्रभुसिंह शिराले कहते हैं, “दिल्ली, बेंगलुरू, हैदराबाद और तमिलनाडु में इन फूलों का अच्छा बाजार है। हालांकि मुंबई और नागपुर में अच्छी मांग है लेकिन दक्षिण भारत की तुलना में ये मांग कम है”।

दुनिया भर के बाजार में गुलाब, गुलनार, गुलदाउदी और ट्युलिप के बाद फूलों में जरबेरा की मांग सबसे ज्यादा है। जरबेरा को सावधानीपूर्वक टहनियों से तोड़ने के बाद कार्डबोर्ड के बक्सों में बंद किया जाता है। इन बक्सों में बंद होने के बाद ये फूल आसानी से आठ से पंद्रह दिनों तक इस्तेमाल किये जाने लायक रहते हैं।

शिराले कहते हैं, “पॉलिहाउस का ढांचा खड़ा करने में ही अधिकतम निवेश की जरूरत होती है। कृषि और वित्त विभाग इसके निवेश के लिए कम दर पर ऋण उपलब्ध कराता है। इस मद में एक लाख रुपये तक के निवेश पर दस लाख रुपये तक की आमदनी संभव है”।

सबसे बड़ी बात कि जरबेरा की खेती में ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है। इसकी खेती के लिए बस निरंतर नमी के साथ स्वस्थ्य मृदा की जरूरत होती है। गांव में लगाए गए सबसे बड़े पॉलीहाउस के बगल में स्थित तालाब से किसानों के इस समुह द्वारा उपजाए जाने वाले फूलों की पानी की जरूरत पूरी की जाती है।

 

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