-डांगी के किसान भगवान सिंह ने रिपर विंड्रोओर मशीन बना कर फसल की समुचित कटाई, कटाई के बाद फसल की बेहतर पैकिंग का मार्ग प्रशस्त किया।
-फसल कटाई के व्यस्त समय में मजदूरों की कमी और अन्य मशीनों से होने वाली कटाई के दौरान फसल की बर्बादी जैसी समस्याओं से ये मशीन दिलाती है निज़ात।

‘खेत में सबसे ज्यादा समस्या कटाई में आती है। बाकी सभी काम के लिए मशीन है, कटाई के हार्वेस्टर (कटाई मशीन) बड़े किसान ही खरीद सकते हैं, इसलिए मुझे छोटे किसानों के लिए रिपर यानी कटाई मशीन मार्केट में लाना है।‘

mp1यही वो सपना था जिसने मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव के किसान भगवान सिंह डांगी को इस तरह की मशीन बनाने के लिए प्रेरणा दी। उनका रिपर विंडरोअर एक ऐसी मशीन है जो फसल काटती है और कटे अनाज की लाइन को बीच में जमा कर देता है। 55 साल के भगवान सिंह का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही भगवान सिंह मशीनों के प्रति खास लगाव महूसस करते थे। वो बचपन की बातें याद करते हुए कहते हैं, ‘जब खेती के खराब मशीन को ठीक करने के लिए मिस्त्री आता था तो मैं उन्हें काम करते हुए घंटों देखा करता था।‘ जब वो थोड़े और बड़े हुए तब वो घर में पड़ी किसी भी घड़ी को उठा लेते थे और उसे खोल कर उसका गहराई से चिंतन करते थे।

जहां उनके सभी भाई ग्रेजुएट हैं, वहीं, भगवान सिंह को कृषि में ज्यादा लगाव था। साल 1973 में उन्होंने 12वीं क्लास के बाद स्कूल छोड़ दी और परिवार की मदद करने के लिए खेती करने लगे। इसके साथ ही उन्होंने मशीन के प्रति अपने लगाव को जारी रखा और कृषि उपकरणों के साथ जोड़-तोड़ का काम शुरू कर दिया।

पहली सफलता, ट्रैक्टर के आगे फलक या ब्लेड लगाना

उनके गांव में खेती करना एक चुनौती थी। कई परेशानियों में पहली परेशानी ये थी कि उन्हें गड्ढों वाली उबड़-खाबड़ खेत से सामना करना पड़ता था। इसलिए उन्होंने ट्रैक्टर के आगे फलक या ब्लेड लगाने के खास तरीके की इजाद की ताकि जमीन को समतल किया जा सके और बांध बनाया जा सके। वो गर्व के साथ बताते हैं, ‘मैंने इस फलक को साल 1982 में बनाया जिसे मैं आज भी अपने खेत में इस्तेमाल करता हूं। कई लोगों ने इसकी नकल की और मुझे इस बात की खुशी है कि हमारे क्षेत्र में कई लोगों ने इस व्यवस्था को अपनाया’ उनकी अगली नई खोज 1995 में रबर असेसरी के तौर पर सामने आई, जिसका इस्तेमाल बोरवेल की क्षमता बढ़ाने में किया गया जिससे 40 फीसदी क्षमता बढ़ी भी।

उन्होंने रिपर विंडरोअर को विकसति करने से पहले कई सालों तक छोटी मशीनों और कृषि उपकरणों को ठीक करने का काम जारी रखा।

नई खोज की उत्पत्ति

mp5उनके गांव में सोयाबीन एक बड़ी फसल है। फसल कटाई के व्यस्त समय में मजदूर की कमी एक बड़ी समस्या है। इसका समाधान निकालने के लिए भगवान सिंह ने अनाज की कम बर्बादी के साथ जल्दी कटाई वाले मशीन की तलाश में पूरा बाजार छान मारा। वो एक ऐसी मशीन चाहते थे जो जो दो मुख्य कार्य कर सके- कटाई और विंड्रोइंग यानी कटी फसलों को एक जगह जमा करना। कटाई में पूरी फसल को व्यवस्थित तरीके से काटना और जबकि विंड्रोइंग का मतलब कटी फसल को एक लाइन में जमा करना ताकि आसानी से पैक किया जा सके और कटाई के बाद की प्रक्रिया को पूरी की जा सके।

कुछ मशीन जिसे उन्होंने देखा वो खुद चलनेवाली कटाई मशीन (रिपर्स) थी जो कटी फसलों को मशीन के किनारे जमा कर देती थी, इससे होनेवाली टूट-फूट से ज्यादा नुकसान हो रहा था। और यही नहीं, डंठल की भी बड़ी मात्रा खेत में छूट जाती थी और अगली मशीन चलाने से पहले हाथ से काम करने की जरूरत पड़ती थी। इस तरह की व्यवस्था छोटे खेतों के लिए संभव नहीं थी क्योंकि मशीन के बार-बार मुड़ने से खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचता था। इसमे कटी हुई फसलें लाइन के साथ आगे तक चली जाती थी और मुड़ने पर ही फसल को निकल पाती थी। इससे इंजन पर अनावश्यक दबाव पड़ता था और जिसकी वजह से ईंधन की भी खपत बढ़ जाती थी।

अपने छोटे आकार के खेत के मुताबिक मशीन नहीं खोज पाने के बाद उन्होंने खुद इस तरह की मशीन बनाने की सोची। उन्होंने एक ऐसे हल्के और कुशल मशीन वाली गाड़ी की कल्पना की जिसके आगे घूमने वाली षटकोणीय रील लगी हो जो फसल को काटने और उसे तेजी से गिरा देता हो।

mp3इसका पहला प्रारुप या नमूना साल 2001 में तैयार हो गया। उसके बाद उन्होंने खुद का वर्कशॉप शुरू करने का फैसला किया जहां वो अपनी कल्पना और रचनात्मकता को अंजाम तक पहुंचा सकें। साल 2004 में उन्होंने अपनी संपत्ति पर लोन लिया और वर्कशॉप खोल दिया। वो लगातार अपनी योजना पर कार्य करते रहे और अपनी सोच में और सुधार लाया। संशोधित और स्वयं चलने वाली मशीन में 18 एचपी का प्राइम मूवर ईंजन लगा हुआ था। इसके पहले महज दो एचपी की मशीन और बीच में काटनेवाली विंड्रोइंग मशीन लगी होती थी। इस प्रक्रिया में मशीन का निरीक्षण करने, सुधार करने, एक-एक कलपुर्जे में बदलाव करने में उन्हें दो साल लगे और 10 लाख रुपये खर्च हुए।

उनके आवेदन पर एनआईएफ ने विचार किया। सीएसआईआर-सीएमईआरआई दुर्गापुर में एनआईएफ-सीएसआईआर के अधीन एनआईएफ ने ट्रैक्टर के संलग्नक के तौर पर इसे विकसित कर वैल्यू एडिशन में इसे आगे बढ़ाया। इस समर्थन के बाद भगवान सिंह ट्रैक्टर के आगे रिपर विंड्रोअर को विकसित करने की स्थिति में आ गए थे, जिसकी बड़ी संभावना थी।

ट्रैक्टर से संचालित रिपर विंड्रोअर

यह ट्रैक्टर के आगे लगनेवाली मशीन है। इसकी तीन अलग-अलग इकाइयां हैं, जिनके नाम हैं-

  • रील यूनिट- खड़ी फसल को कटर बार की तरफ धकेलनेवाला
  • कटिंग यूनिट- इसमे कटर बार, संग्रहण इकाई जो मशीन के मध्य तक फसल को ले जाता है, जिससे खलिहान तक फसल ले जाना आसान हो जाता है।
  • यह कठिन परिश्रम और श्रमशक्ति की आवश्यकता को कम करता है

विंड्रोअर यूनिट की डिजाइन में बदलाव से बर्बादी, अनाज का टूटना जैसी समस्याएं खत्म हो जाती हैं, क्योंकि अब कटे हुए अनाज पर टायर नहीं चढ़ पाता है।

मशीन को चलाने के लिए सिर्फ एक आदमी की जरूरत पड़ती है और मशीन के पीछे दो लोग चाहिए जो फसल को जमा करने का काम करेंगे। सोयाबीन के अलावा, गेहूं, धान और दाल की फसल को काटने में किया जा सकता है। यह छोटे से खेत में, खड़ी फसल को नुकसान पहुंचाए बिना तेज गति से मुड़ने में सक्षम है।

परंपरागत रिपर यूनिट में, प्राइमर मूवर तक पहुंचे में कटी फसल सीधे नीचे गिर जाती है जिससे अनाज का नुकसान होता है। नई खोज में विंड्रोइंग अटैचमेंट में नयापन डिजाइन और स्थानिक उपायों में मौजूद होती है, इससे अनाज नुकसान बहुत कम होता है। जमा किया गया अनाज दोनों टायर के बीच साफ-सुथरी लाइन में गिरता है जिससे जमा करने समेत दूसरे कार्य आसानी हो जाता हैं।

भोपाल के सीआईएई में सोयाबीन फसल पर हुए टेस्ट के मुताबिक मशीन ने 0.35 हेक्टेयर प्रति घंटा (1.93 से 2.10 किमी प्रति घंटा के बढ़े दर से) का प्रदर्शन किया। कटाई के दौरान कुल नुकसान 3.37 फीसदी (जिसमे कटाई पूर्व 2.33 फीसदी नुकसान) भी शामिल है। (उदाहरण के तौर पर- कटाई के दौरान इस मशीन से नुकसान 1.04 फीसदी)। हालांकि इस दौरान बिना कटाई के जीरो फीसदी नुकसान रहा।

इस नई खोज की चर्चा राष्ट्रीय मीडिया में हुई जैसे कि स्टार्ट टीवी, योजना और द हिंदू के साथ-साथ स्थानीय मीडिया में भी इसकी चर्चा हुई। इसका परिणाम ये हुआ कि अलग-अलग जिले के 150 जगहों से पूछताछ की गई। साल 2011 में अन्वेषक के नाम से एनआईएफ ने पेटेंट के लिए आवेदन किया (677/MUM/2011)।

भविष्य के सपने

mp4वो कहते हैं, ‘ मैं उस दिन के सपने देख रहा हूं जब पूरे देश के सीमांत किसान मेरी रिपर यूनिट का इस्तेमाल करने लगेंगे। इस कार्य में बहुत सारा पैसा लगा था, इसलिए मेरा परिवार मुझे लेकर चिंतिंत भी था, लेकिन उन लोगों ने मुझे कभी हतोत्साहित नहीं किया।‘ वो स्वीकार करते हैं कि उनकी पत्नी राधा उनकी सबसे बड़ी समर्थक थी। वो पूरे गर्व से बताते हैं‘ उसने कभी मुझ पर अविश्वास नहीं जताया। वो महज आठवीं तक ही पढ़ी थी और वो ठीक से यह भी नहीं जानती थी कि मैं क्या कर रहा हूं। लेकिन उसने यह कभी नहीं कहा कि मैं इस नवीन खोज के पीछे वक्त बर्बाद कर रहा हूं ‘

उनके सभी बच्चे ग्रेजुएट हैं। वो बताते हैं, ‘अब मैं अपनी नई खोज को लेकर एक उद्योग स्थापित करना चाहता हूं, ताकि मेरे बच्चे उसे और आगे बढ़ा सके।‘ इस इलाके के किसानों ने इसे व्यवहार में लागू होते हुए देखा है और अब वो इसके बारे में मुझसे पूछा करते हैं। हालांकि इसके रास्ते में पैसे की बड़ी समस्या है क्योंकि उनके पास देने के लिए रुपये नहीं हैं और ना ही बैंक से लोन लेने का ही कोई विकल्प है।

वो महसूस करते हैं कि बेहतर प्रगति के लिए खेती के तरीकों में बदलाव किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि ‘आज खेती का ढंग अच्छा नहीं है, हमें तरक्की करने के लिए खेती करने का तरीका बदलना पड़ेगा’। और वो इस बदलाव में भागीदारी निभाना चाहते हैं जैसे कि, खेती के नये तरीके विकसित करके, कृषि कार्यप्रणाली और बीज की किस्मों में बदलाव कर।

रिपर विंड्रोअर बनानेवाले किसान का विवरण-

नाम- श्री भगवान सिंह डांगी

जिला, राज्य- विदिशा, मध्य प्रदेश

वर्ग- कृषि (सामान्य)

अवॉर्ड कार्यक्रम- सातवां नेशनल ग्रासरुट इनोवेशन अवॉर्ड्स, साल 2013

मशीन की कीमत- एक लाख रुपये (एक्स फैक्ट्री+पैकेजिंग)। कीमत में परिवहन और कर शामिल नहीं है।

आपूर्ति की अवधि- ऑर्डर मिलने और पूरा पेमेंट मिलने पर 15 दिन के बाद

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