कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकताएक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों..और सचमुच तबियत से उछाले गए इस किसान के हर पत्थर ने सूक्ष्म जीव और कृमि की सहायता से प्रकृति के विस्तृत आसमान को छेद कर अपना लक्ष्य पा लिया है। यह पत्थर था दृढ़ आत्मविश्वास काकड़े परिश्रम का और सतत लगन का। विश्वास न हो तो बेंगलुरू के कोलेगल ताल्लुका आकर देखें कि कैसे एक किसान को प्रकृति के सबसे छोटे से जीव की मदद से प्रकृति की रक्षा में गर्व हो रहा है और इस फोकस के कारणउसने एक ऐसी दुनिया बनाई है जहां की प्रकृति में उसकी सारी महिमा में प्रकट होती है।

 कोलेगल के किसान कैलाशे मूर्ति का फॉर्म हाउस खेती के लिए मिसाल बन गया है, जो सुखा जैसी प्राकृतिक आपदा से डट कर मुकाबला करता है। और इसके लिए उन्होंने खेती के प्राकृतिक तरीकों को ही अपना हथियार बनाया है। आस पास के इलाकों में मीलों तक फैले बंजर ज़मीन के बीच, उनका हरा भरा फार्म किसी नखलिस्तान से कम नहीं। दोडिंदुवाड़ी गांव का यह किसान अपनी सूझ बूझ से अपने 11-एकड़ के खेत को हरा-भरा और उपजाऊ रखने में कामयाब रहा है। जबकि कर्नाटक 40 वर्षों में सबसे खराब सूखे की स्थिति का सामना कर रहा है।  

 यहां की मिट्टी को जीवन देने वाला कोई और नहीं, वहीं के किसान कैलाश मूर्ति हैं, जिन्होंने सूक्ष्म जीव और कृमि की सहायता से ये करिश्मा कर दिखाया है। कैलाश अपने हाथों में एक मुठ्ठी मिट्टी लाते हैं, इसी गीली मिट्टी में कई छोटे कीड़े और अन्य सूक्ष्म जीव हैं जिसने यहां की बेजान मिट्टी में जीवन देकर प्रकृति के लिए इसे अनमोल बना दिया है। मूर्ति कहते हैं, “हम हाथियों और बाघों को बचाने के लिए संघर्ष करते हैं। मैं यह नहीं कहता कि यह गलत हैलेकिन हम कभी भी छोटे सूक्ष्म जीवों की रक्षा की बात नहीं करते हैंहालांकि वे ऐसे हैं जो पृथ्वी और अन्य जीवित प्राणियों को भी बचा पाएंगे। वे जैव विविधता के संरक्षक हैं “kailash-murthy-1

 मूर्ति कहते हैं कि ये छोटे सूक्ष्म जीव जहां मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं, वहीं पेड़-पौधे उगकर हरियाली की नई दुनिया बसाते हैं। यदि किसी स्थान पर पेड़-पौधे हैं तो जल्द ही आपके पास जंगल होगा और जहां जंगल होगा वहां जीवन का स्वरूप होगा। इस प्रक्रिया में पानी के संरक्षण में भी मदद मिलती है।

 मूर्ति जो प्राकृतिक तरीके से खेती करते हैं उनके लिए कृत्रिम खेती किसी खलनायक से कम नहीं है। कृत्रिम खेती की वजह से ही सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। मूर्ति कहते हैं कि आप जब प्राकृतिक पद्धति के अनुसार खेती करते हैं, तो इस प्रक्रिया में सूक्ष्म जीव संरक्षित रहते हैं और यदि आप खेती करने में कृत्रिम प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हैं तो मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव मर जाते हैं। देखा जाय तो खेती के लिए कृत्रिम प्रक्रिया एक प्रकार से खलनायक होता है। रासायनिक खेतीवनों की कटाई के कारण मिट्टी का कटावसूरज की किरणों की प्रत्यक्ष रोशनी और मिट्टी के प्रकृति को लगातार बदलने से अक्सर सूक्ष्म जीवों को परिवर्तनों के अनुकूल होने का मौका नहीं मिलता। ये सब सूक्ष्म जीवों की दुनिया के खिलाफ एक प्रकार से अपराध करते हैं।

 मूर्ति के मुताबिक, ‘ये सूक्ष्मजीव बड़े काम के होते हैं, एक तरफ जहां वो मिट्टी में कॉलनी बसाते हैं, वहीं दूसरी तरफ पौधों के लिए पानी का संरक्षण भी करते हैं, इस प्रकार से हमें झीलों और बांधों की आवश्यकता नहीं होती है’। जल संरक्षण का ये चैंपियन कहते हैं कि जहां तक जल संरक्षण की बात हैं, ये मिट्टी में पनपने वाला सूक्ष्मजीव की अवधारणा बताता है कि खेती के लिए कृत्रिम झीलों और बांधों के निर्माण का विचार गलत है। मूर्ति के मुतबिक, ‘पानी के संरक्षण के अन्य प्रभावी तरीके भी हैं, जिसमें सबसे प्रमुख तरीका प्राकृतिक रूप से खेती करके सूक्ष्मजीवों को संरक्षण की प्रक्रिया शामिल है। देखा जाय तो बांधों या झीलों के निर्माण से पानी का अधिक वाष्पीकरण हो जाता है। पानी एक बार वाष्पीकरण करते हुए जब नदी के सहारे समुद्र में जाता है और फिर इसे वापस भूजल के रूप में प्राप्त करना असंभव है’।

उनका कहना है कि पानी जमीन में जमा होने से गाद का निर्माण होता है, जिससे कारण पानी सही रूप से जमीन में प्रवेश नहीं कर पाता है और पानी का ग्राउंड लेवल ऊपर नहीं पहुंच पाता है। इस प्रकार से हम जो प्रक्रिया अपना रहे हैं यह क्या भूमिगत जल संरक्षण कर पा रहे हैं, इस बात पर ध्यान देने की ज़रुरत है।

 जबकि मूर्ति प्राकृतिक रूप से खेती करके सूक्ष्मजीवों को संरक्षण के जरिए आस पास बंजर खेत के होने और भूजल स्तर सामान्य रूप से नीचे गिरने के बाद भी अपने खेत में भूजल का स्तर सामान्य स्तर तक रखने में सफल रहे हैं। इसके बारे में मूर्ति कहते हैं, “मेरे खेत में मेरे पास प्रचुर मात्रा में पानी है। मुझे जमीन से 65-70 फीट पानी मिल जाता हैजबकि बांकियों को करीब 1,500 फीट या उससे भी ज्यादा की ऊंचाई तक पहुंचने के बाद ही पानी मिल पाता है’। मूर्ति बताते हैं, ‘किसानजल संरक्षण बोर्डइंजीनियरों और कृषि विभाग को खेतों में जल संरक्षण पर ध्यान देना होगा। किसानों को उचित तरीकों को अपनाने की जरूरत है, जो उन्हें अपने क्षेत्रों में 80 प्रतिशत पानी बचाने में मदद कर सकती हैं।”

 वे अपने खेत में कृषि प्रयोजनों के लिए केवल 10 प्रतिशत पानी का ही उपयोग करते हैं और बाकी बचे पानी का उपयोग आस पास के 4-5 किसान अपने खेत में भी कर सकते हैं। इस प्रकार से मूर्ति 90% पानी का संरक्षण करते हैं। इनके खेतों के पौधे सूरज की रोशनी से ही हरा-भरा रहता है। वे पौधों को पानी देने के लिए छोटे पाइप का उपयोग करते हैं। मूर्ति अपनी योजना में कितना सफल रहे हैं इसका अंदाज उनके फार्म में मौजुद आम के हरे भरे पेड़ों को देखकर बखुबी हो जाता है। उनके खेत में सब्जियां और फलों के कई किस्म के पेड़-पौधे हैं। इनके फलों के आकार भी अच्छे हैं। इस प्रकार की प्राकृतिक खेती से मूर्ति ने जो हासिल किया है, उससे वे अपने भविष्य को हर मामले में सुरक्षित कर रखा है।

अब कई सालों से मूर्ति अपने खेत के बाहर से कोई फल उपभोग नहीं किया है। वे कहते  आखिरकार खाद्य सुरक्षा काफी महत्वपूर्ण है। लेकिन हमलोग प्राकृतिक पद्धति से खेती-बाड़ी के कॉन्सेप्ट kailash-2को छोड़कर कृत्रिम पद्धति अपनाकर हमने इस मामले में हार मान ली है। हम आगे निकल चुके हैं और इस प्रक्रिया से भूजल स्तर काफी तेज़ी से नीचे जा चुका है”।

 मूर्ति ने यहां की बंजर ज़मीन के भाग को प्राकृतिक पद्धति की शक्तियों से हरा-भरा बना कर एक छोटे से जंगल में परिवर्तित कर दिया, जबकि इस कार्य को करने के लिए प्राकृतिक पद्धति का सिर्फ उपयोग किया गया। इस प्रकार से प्रकृति से प्राप्त तत्व जैसे छोटे और सूक्ष्म जीव एक प्रकार से मिट्टी के लिए वो पोषक तत्व प्रदान करता है, जो बंजर भूमि में भी जान डाल देता है। कैलाश मूर्ति का खेत जो एक छोटा सा हरा-भरा वन का रूप ले लिया है, ये आस-पास के खेतों से बिल्कुल अलग है। मूर्ति कहते हैं कि गहन कृत्रिम खेती में उर्वरक और रसायनों के इस्तेमाल ने मिट्टी की उर्वरता में कमी और मृदा क्षरण को बढ़ाया है और इसके दुष्प्रभाव के कारण खाद्य श्रृंखला नष्ट हो गया है।

 वो कहते हैं, “प्राचीन समय में, लोग अपनी ज़रुरत के फसलों की खेती बिना जुताई किए ही अपने आवास स्थान के आस-पास ही करते थे। उनका मानना था कि बिना जुताई किए जमीन पर उगाए गए फसल ज़मीन को  स्वस्थ बनाता हैलेकिन अब क्या हो गया हैहम नियमित चिकित्सा जांच में कितना खर्च कर रहे हैं?” देखा जाय तो  इस बात के कई मायने हैं।

 मूर्ति ने यहां की बंजर ज़मीन के टुकड़े पर सामान्य प्राकृतिक तरीके से खेती करने की शुरुआत की और उन्होंने ज़मीन को बिना हल से जोते हुए यानि मिट्टी को सामान्य रूप में रहने दिया। इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का रसायन और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया। ज़मीन पर बेतरतीब ढंग से बीज को रहने दिया। हैरानी की बात हैदो साल के भीतर यहां पर  एक चमत्कारी परिवर्तन हुआ। जब मिट्टी की प्राकृतिक संतुलन अपने आप बहाल हो गया और  11 एकड़ ज़मीन एक छोटे से वन में बदल जाने के बाद ये स्थान एक आत्मनिर्भर ईको-सिस्टम में विकसित हो गया।

 मूर्ति के शब्दों में “हमें गलत तरीके से बताया जाता है कि कीटनाशक या उर्वरक फसलों के लिए अच्छे हैं। इसका उपयोग करकेहम वास्तव में पौधों की प्राकृतिक रक्षा तंत्र की एक प्रकार से हत्या कर देते हैं। पौधों में भी जलवायु में बदलाव के हिसाब से स्वयं के अनुकूल होने की भरपूर क्षमता होती है। हमें खेती- बाड़ी के लिए अमूमन यह भी कहा जाता है कि कीटों को पेड़ों से हटा दिया जाना चाहिए। ये भी गलत है। देखा जाय तो पेड़-पौधे भी कीटनाशक के लिए अपने तंत्र का निर्माण स्वयं कर लेते हैं। 

मूर्ति पेड़-पौधे के लिए प्रकाश संश्लेषण को एक सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया मानते हैं। पौधे एक सुंदर प्रक्रिया के माध्यम से सांस लेते हैं और श्वसन करते हैं। हमें कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है। वे अपनी प्राकृतिक प्रक्रियाओं का प्रबंधन स्वयं करते हैं और बढ़ते हैं।”

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