goat1आज हम बात बकरी पालन व्यवसाय की कर रहे हैं, जिसके माध्यम से गरीब किसान अपनी किस्मत ना सिर्फ सुधार सकते हैं बल्कि चमका भी सकते हैं। इस लेख में हम उदाहरण के तौर पर पंजाब के एक किसान का उदाहरण लिया है ताकि आप समझ सकें कि किस तरह इस व्यवसाय को अपना कर अपनी किस्मत चमका सकते हैं।

ये कहानी पंजाब के एक किसान की है जो किसी भी दूसरे चरवाहे या गड़ेरिए की तरह सड़क पर चलते हुए दिखते हैं। 32 साल के सुखचैन सिंह दूसरे चरवाहे की तरह दिखते हैं, लेकिन वो इन सबसे अलग हैं जिस तरह पंजाब में अधिकांश चरवाहे हैं।

दो एकड़ जमीन पर बकरी पालन का धंधा करने वाले वो एक छोटे किसान हैं, जिनके पास दो गांवों में बने दो शेड में 70 बकरियों का झुंड है। उनका मानना है कि, बकरियों को संभालना कठिन काम है, लेकिन साथ ही यह भी मानते हैं कि कोई भी धंधा बिना चुनौतियों के नहीं होता है और ना ही नियमित तौर पर मुनाफा हो सकता है। कुछ महीने के अंतराल पर वो अपनी बकरियों को एक छोटे से ट्रक में लाद कर चारे की तलाश में निकल जाते हैं। सुखचैन बताते हैं, ‘इन दिनों पखोवाल में प्रचुर मात्रा में हरे-भरे पेड़ और जंगली घास होती हैं जो मेरी बकरियों के लिए काफी अच्छा होता है। बाद में, मैं उन्हें वापस लेकर अपने मोगा के अपने गांव रामा लौट आता हूं। कई सालों तक मैं उन्हें घास चराने के लिए बाहर लेकर जाता रहा लेकिन अब यह काम एक नौकर करता है।’ चूंकि बकरी पर ध्यान देने की बहुत जरूरत पड़ती है, इसलिए वह (नौकर) उसी शेड में बकरियों के साथ रहता है।

उनका बकरी पालन का धंधा बहुत अच्छी तरह चल रहा है। मोटी-तगड़ी बकरियों से उन्हें अच्छी कमाई हो जाती है। वो बताते हैं,’पिछली बिक्री में चापड़ मंडी में सबसे अच्छी बकरी से मुझे 60 हजार रुपये की कमाई हुई थी। आमतौर पर साधारण बकरियों से औसत कमाई 10 हजार से 35 हजार के बीच होती है, और बकरियों के बच्चे एक हजार से ढाई हजार में बिक जाती हैं। हम बकरियों की दूध की भी 30 से 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक्री करते हैं।’

बकरियों का प्रबंधन

goat1वो कुछ ही सालों में इस क्षेत्र में एक्सपर्ट हो गए हैं, इसके बावजूद बकरी बालन आसान काम नहीं है। वो बताते हैं, ‘बकरियां बारिश और ठंड को लेकर बेहद संवेदनशील होती हैं, और अगर वो बीमार पड़ गई या फिर उन्हें बारिश में चरने के लिए छोड़ दिया तो वो दूध देना छोड़ देती हैं। कई सालों के बाद मुझे यह बात समझ में आई कि इन बकरियों की देखभाल कैसे की जाती है।’ ‘ठंड के दिनों में, हमें पशु चिकित्सकों को बुलाकर इन्हें दवाइयां दिलानी पड़ती है। बच्चे पैदा कराने में मुझे अपने नौकर की मदद मिलती है। अब मैं खुद नये पैदा हुए बच्चों को वैक्सीन दे देता हूं।’ और सिर्फ जंगली घास और पेड़ की पत्तियां ही इन लोगों के लिए चारा नहीं होती है। प्रगतिशील चरवाहे का कहना है, ‘वो सब चारा का एक हिस्सा मात्र होती है, हम उनके लिए चारा उगाते हैं, इसके अलावा हम उन्हें मक्का, दाल, जौ और गेहूं भी खिलाते हैं। बकरियां खाने के मामले में बेहद चूजी हैं। अगर चारा रसदार और पर्याप्त मुलायम नहीं हुआ तो वो भूख हड़ताल कर देती हैं।’

बकरी पालन ही क्यों ?

सुखचैन से जब यह सवाल पूछा गया कि उन्होंने इस व्यवसाय को ही क्यों चुना ?, तो उन्होंने जवाब दिया, ‘इमानदारी से कहूं तो, मेरे परिवार के पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं था। हमारे पास घर में कुछ बकरियां और भेड़ें थी जिसे मेरे पापा ने गांव में किसी से खरीदी थी। चूंकि मैं भी इन बकरियों के साथ पला-बढ़ा हूं तो मेरे लिए इनकी देखभाल करना आसान लगा। मुझे पता है कि ऐसे किसानों को सम्मान के लिए नहीं समझा जाता है, लेकिन मुझे इस बात की परवाह नहीं है, क्योंकि मैं अपने काम को लेकर बहुत खुश हूं। जब मैं अपनी बकरियों को बेचने के लिए मंडी जाता हूं तो इनकी वहां चर्चा होती है। दूसरी बकरियां पालनेवाले लोग जिन्हें अच्छी जानकारी है वो मेरे पास आते हैं। मैंने उस दिन जिस बकरी को 60 हजार रुपये में बेचा था वो सबसे महंगा था और उसके बच्चे अभी भी मेरे पास है।’

सुखचैन के तीन भाई है, और संघर्ष से भरी अनूठी कहानी है जिसमे जमीन के बंटवारे की वजह से खेती महंगी साबित हो रही है। परिवार ने गांव के घर को बेचकर उसे दूसरी जगह खेत में बनाया। सुखचैन के बड़े भाई गुरतेज सिंह ढाई एकड़ जमीन में खेती करते हैं और तीन भाइयों के साथ रहते हैं। गुरतेज बताते हैं, ‘सुखचैन की बकरियों से होने वाली आमदनी से हमें प्रत्येक साल खेती के लिए लीज पर और ज्यादा जमीन लेने में मदद मिलती है। हम गेहूं, धान और चारे की पैदावार करते हैं। हालांकि हम लीज पर लिए इन जमीन से ज्यादा बचत नहीं कर पाते हैं, में खेती से जुड़ा हूं और व्यस्त रहता हूं जिससे मुझे खुशी मिलती है।’

सबसे छोटे भाई ने गाड़ी चलाना सीख लिया है और एक टैक्सी खरीद ली है जिससे परिवार की आमदनी में योगदान हो रहा है। गुरतेज बताते हैं, ‘अगर हमे जिंदा रहना है तो हम सभी को मिलकर अलग-अलग कार्य करना होगा। हम अब धनी होने की ओर बढ़ रहे हैं, और यह बकरियां ही हैं जो हमारी प्रगति में योगदान कर रही हैं।’

 

सुखचैन की सफलता से प्रेरित होकर गांव के दूसरे कई किसानों ने भी बकरी पालन का धंधा अपनाया, लेकिन सफलता कुछ ही किसानों को मिल पाई। सुखचैन बताते हैं, ‘पूरा हिम्मतपुरा गांव पास में बकरियां चराने जाता है। जब मैंने काम शुरू किया, तब मैंने बेचे हुए घर के पैसे से बकरियां और भेड़ें खरीदी। जब मेरे पास 105 पशुओं का झुंड हो गया, तब मैंने महसूस किया कि बकरियां और भेड़ें एक साथ अच्छी तरह से नहीं पाली जा सकती हैं, और यह बात मात्रा को लेकर नहीं थी बल्कि गुणवत्ता को लेकर थी। उसके बाद मैंने भेड़ें बेच दी और अच्छी गुणवत्ता वाली बकरियां पालने पर ध्यान केंद्रित किया। इसके लिए बेहतर जानकारी और अनुभव की जरूरत होती है लेकिन बदले में बहुत अच्छा रिटर्न भी मिलता है।’

दूध ही सफलता की चाबी-

goat3सुखचैन के मुताबिक, बकरियों से नियमित आमदनी मुख्यतौर पर दूध से होती है। बकरियों से हम रोज दो बार दूध ले सकते हैं, और 70 बकरियों से करीब50 से 60 लीटर तक दूध रोज हो सकता है। वो इसे गांव के सरकारी संग्रहण केंद्रों पर 30 से 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बेच देते हैं। हालांकि यह दूध साल में सिर्फ छह महीने के लिए ही बेचा जाता है, और इससे जो कमाई होती है उसका आधा फिर इसी व्यवसाय में लगा दिया जाता है। एक बकरी एक साल में औसतन एक से दो बच्चे देती है, उनमे से बचे 50 से 60 बच्चों को बाद में एक से ढाई हजार रुपये में बेच दिया जाता है जिससे अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। सुखचैन बताते हैं, ‘हम एक साल में एक ही बार बच्चे पैदा करने देते हैं, इससे बच्चे स्वस्थ होते हैं और अच्छी तरह बढ़ते हैं। पुरानी बकरियों की जगह नई बकरियां ले लेती हैं और पुरानी बकरियां बेच देते हैं। कमाई और खर्च दोनों में बड़ा अंतर होता है। अगर दूध की गुणवत्ता अच्छी है तो हमें अच्छी कीमत मिलती है। अगर बीमारियों का खतरा है तो हमें इन बच्चों को बहुत कम कीमत पर बेचना पड़ जाता है। अगर बारिश और ठंड ज्यादा दिनों तक चलता है तो हमें चारा का और इंतजाम करना पड़ता है, इससे हमारी लागत खर्च और बढ़ जाती है। अगर भेड़ें सिर्फ बाहर खाती हैं तो यह शुद्ध मुनाफा होता है।’

मांस की आसान उपलब्धता-

बठिंडा के नथाना में दविंदर सिंह हाईटेक बकरी फार्म चलाते हैं जहां बीटल और बरबेरी किस्म की बकरियां पाली जाती हैं जिसे सिर्फ मांस के लिए बेचा जाता है। वो बताते हैं, ‘सबसे आसान रास्ता है इन बकरियों को गुज्जर (घुमंतू चरवाहा) को बेचना जो इसे वजन के हिसाब से भुगतान करते हैं और वो मुझे एक बच्चे के लिए करीब तीन हजार रुपये तक देते हैं।’

पंजाब पशुपालन विभाग के निदेशक एच एस संधा बताते हैं, बकरी पालन बहुत गरीब किसान के लिए बहुत अच्छा विकल्प है। ‘पहले इसके साथ एक सामाजिक कलंक जुड़ा था लेकिन अब इसे एक व्यवसाय की तरह देखा जाता है जिसे धनी किसान अतिरिक्त आमदनी के तौर पर देखते हैं। गरीबों के लिए, यह एक एटीएम की तरह है। इसके लिए बेहद कम निवेश की जरूरत पड़ती है। आप एक नर और मादा बकरी का बच्चा पांच हजार से भी कम में खरीद सकते हैं और शुरुआत कर सकते हैं। इसके लिए आपको एक छोटा और अच्छी तरह से ढंके कमरा की जरूरत पड़ेगी। बकरियां खुले में चर सकती हैं, फसल कटे खेतों में और पेड़ की पत्तियां भी खा सकती हैं।’

एक औसत बकरी एक साल से भी कम समय में दो बच्चे को जन्म देती है और इस तरह बकरी का व्यवसाय चल निकलता है। संधा बताते हैं, ‘दूध कमाई का एक श्रोत है क्योंकि यह एक लाभदायक उत्पाद है। हालांकि इसके लिए अलग से कोई सरकारी संग्रह केंद्र नहीं है, नियमित दुग्ध सहकारी केंद्र ही इसे लेता है। बड़ी बकरियां मंडी में मांस के लिए बेची जाती है। मांस के लिए राजस्थान से बड़ी संख्या में खरीदार यहां आते हैं। सरकार 40 बकरियों की एक यूनिट पर करीब 25 से 33 फीसदी तक सब्सिडी देती है जो करीब एक लाख रुपये होती है।’

बकरियों से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य-

  1. एक दिन में दो बार दूध
  2. 70 बकरियों से करीब 30 से 40 लीटर दूध प्रतिदिन
  3. 6 महीने तक दूध की उपलब्धता
  4. दूध से कमाई का 50 फीसदी हिस्सा वापस बकरी व्यवसाय में लगाया जाता है
  5. कुछ अतिरिक्त कमाई
  6. एक से दो बच्चे का जन्म प्रतिदिन
  7. बकरी का एक बच्चा एक से ढाई हजार में बिकता है
  8. 40 बकरियों के एक शेड पर 25-33 फीसदी सरकारी सब्सिडी करीब एक लाख मिलता है
  9. 10,000-35,000 रुपये औसतन एक बकरी की कीमत, बेहतरीन किस्म के लिए 60,000 रुपये तक मिल जाता है।
  10. व्यवसाय शुरू करने का खर्च- 5,000 रुपये

 

इस तरह से यह साफ हो जाता है कि बकरी पालन का व्यवसाय खासकर गरीबों के लिए फायदे का धंधा है, और धीरे-धीरे गरीबी से बाहर निकाल कर अच्छी स्थिति में पहुंचा देता है।

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