तमिलनाडु में प्रत्येक साल सांबा सत्र में तकरीबन पंद्रह लाख हेक्टेयर इलाके में धान की बुआई की जाती है जिसमें से तीन से पांच लाख हेक्टेयर की खेती उत्तर पूर्वी मानसून की वजह से बाढ़ से प्रभावित होती है।
खास तौर पर डेल्टा जिलों के कछार वाले बाढ़ प्रभावित इलाके, थिरुवरूर और नागापट्टिनम जैसे तटीय जिले प्राय बाढ़ से प्रभावित होते हैं परिणामस्वरूप धान की उत्पादकता प्रभावित होती है और उत्पादन में गिरावट दर्ज होती है।

जल जमाव

हालांकि बुआई के लिए धान की अनेकों उन्नत किस्में मौजुद हैं लेकिन इन प्रजातियों की उपज भी बाढ़ और लगातार जल जमाव से प्रभावित होती हैं।
अगर बाढ़ का पानी एक सप्ताह से अधिक वक्त तक रूका रहा तो वर्तमान में मौजुद तकरीबन सभी उन्नत प्रजातियों के धान भी इस विषमता को नहीं झेल पाती हैं और उत्पादन पर अत्यधिक दुष्प्रभाव पड़ता है।

प्राकृतिक आपदा

ऐसी प्राकृतिक आपदाएं मानवीय नियंत्रण से बाहर होती हैं। इन परिस्थितियों से उबरने के लिए कोएंबटूर स्थित तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने बाढ़ प्रतिरोधी धान की उन्नत प्रजाति लांच की जो इन इलाकों के लिए किसी वरदान सरीखा साबित हुआ।
धान की ये उन्नत प्रजाति बाढ़ के दिनों में 14 से 17 दिनों तक जल जमाव को झेल सकती है। इस प्रजाति की सघन खेती यानि कि सिस्टम ऑफ राइस इंटेन्सिफिकेशन (एसआरई) प्रणाली में खेती की जानी चाहिए।

जल जमाव प्रतिरोधकता

स्वर्णा सब 1 प्रजाति पूर्वी भारत में उपजाई जाने वाली स्वर्णा प्रजाति के धान जैसी ही होती है सिवाए इसके कि इस प्रजाति में जल जमाव प्रतिरोधकता के गुण मौजुद हैं। साल 2011 में राज्य भर में फैले कृषि विज्ञान केंद्र की मदद से तंजावुर (निदाम्मंगलम) और नामाक्कल (सिक्कल) जिलों में विशेष अभियान चला कर स्वर्णा सब 1 प्रजाति को लोकप्रिय किया गया और बीज बांटे गए। इन इलाकों के तकरीबन सौ किसानों को इस प्रजाति के बीज बांटे गए जिन्होंने बाढ़ प्रभावित परिस्थतियों में इस प्रजाति के धान की सफलतापूर्वक खेती की।
दो सप्ताह तक बाढ़ के पानी में डूबे रहने वाले खेतों में भी में इस प्रजाति के धान की उपज प्रति हेक्टेयर तीन से साढ़े तीन टन तक रहा।

धान की इस उन्नत प्रजाति के बारे में विस्तार से जानने के लिए आप डॉ रॉबिन, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, चावल विभाग, मोबाइल नंबर – 9442224409

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