पिछले दिनों समाचार माध्यमों ड्रोन और उसके उपयोग को लेकर समाचार माध्यमों में खासी सरगर्मी देखने को मिली। निगरानी और फौजी अभियानों में इस्तेमाल होने वाला ड्रोन की तब भी बहुत चर्चा हुई जब भारत की सीमा पर भी पिछले दिनों एक ड्रोन मार कर गिराया गया। गिराए गए ड्रोन पर जासूसी की शंका थी। बहरहाल ड्रोन के कुछ सकारात्मक उपयोगों की भी चर्चा हुई। खास तौर पर खेती किसानी के क्षेत्र में ड्रोन के उपयोग को लेकर पूरे भारत में कई जगहों से व्यक्तिगत उपलब्धियों और सरकार के स्तर पर भी इसके इस्तेमाल की खबरे आईं। मसलन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक किसान के बेटे ने जुगाड़ टेक्नोलॉजी से ड्रोन बनाया है। ऐसा ड्रोन जो खेती में मददगार है और चंद मिनटों में पूरे खेत में दवा छिड़क देता है। घंटों का काम मिनटों में ये ड्रोन करता है। इस ड्रोन को बनाने में करीब दो साल का वक्त लगा है और वेबसाइट से जानकारी जुटाकर इस ड्रोन को बनाया गया है। spray-crops-from-drones
इसी तरह महाराष्ट्र में विदर्भ इलाके में सूखे के सर्वेक्षण के लिए राज्य सरकार ने ड्रोन के इस्तेमाल को प्रमुखता दी। हरियाणा के फरीदाबाद स्थित गांव कौराली निवासी इंजीनियनर रविंद्र भाटी ने फसलों पर कीटनाशकों के छिड़काव के लिए ऑटोनोमस प्रोग्राम पर आधारित ड्रोन विकसित किया। रविंद्र इसमें एक बार खेत नक्शा फीड करते हैं और ड्रोन अपने आप कीटनाशकों का छिडकाव कर देता है। रविंद्र पेशे से इंजीनियर हैं लिहाज़ा राज्य के कृषि विभाग के साथ मिलकर उन्होंने इस ड्रोन को तकरीबन पांच लाख रूपए तक की लागत से बनाया।Raipur Drone2
रायपुर के राहुल चावड़ा के पास न तो इंजीनियरिंग की डिग्री है और न ही कोई डिप्लोमा। हिंदी मीडियम से बीए पास राहुल ने विदेशों से ड्रोन के पार्ट्स मंगवाने के लिए अपने दोस्त से अंग्रेजी सीखी और और फिर वेबसाइट की मदद से इस नायाब तकनीक को कामयाब बना डाला। रायपुर से 30 किलोमीटर दूर हरदी गांव में राहुल का 25 एकड़ का फार्महाउस है। ये पिछले 15 साल से खेती कर रहे हैं। इनके मन में खेती को आसान बनाने के लिए ड्रोन बनाने का ख्याल आया क्योंकि मानसून के सीजन में मजदूर नहीं मिलते हैं और मिलते भी हैं तो मजदूरी इतनी ज्यादा होती है कि खेती करना महंगा पड़ जाता है, अब वो इस ड्रोन की मदद से घंटों का काम मिनटों में कर लेते हैं।Raipur Drone1
राहुल को इस ड्रोन को बनाने में करीब दो साल का वक्त लगा है। इसके लिए उन्होंने जापान, चीन और अमेरिका से ड्रोन के पार्ट्स मंगवाए और फिर इस तकनीक को तैयार किया। राहुल के पास तीन ड्रोन हैं, जिसमें दो ड्रोन उन्होंने खुद ही बनाए हैं। पहला ड्रोन बनाने में करीब दो लाख का खर्च लगा। राहुल बताते हैं इसी ड्रोन को विदेशों से खरीदने पर करीब पांच लाख रूपए का खर्च लगता और खराब होने पर यहां ठीक भी नहीं होता। इस ड्रोन को आसानी से फोल्ड किया जा सकता है और बैग या सूटकेस में ले जाया जा सकता है। इसमें गाड़ियों के पार्ट्स का इस्तेमाल किया गया है।
राहुल अब इस ड्रोन से अपने खेतों में दवा का छिड़काव करते हैं। उनके इस नायाब प्रयोग से खेतों की फसल लहलहाने लगी है। अगर उनकी ये तकनीक दूसरे किसानों के लिए भी कारगर साबित हुई तो खेती का अंदाज भी बदलेगा और पैदावार भी बढ़ेगा।

drone 1फसलों पर कीटनाशकों का छिड़काव जोखिम भरा होता है। कीटनाशकों के असर से किसानों को गंभीर वीमारियों से ग्रस्त होने की आशंका रहती है। कई बार किसानों की जान भी चली जाती है। सबसे ज्यादा मुश्किल गन्ना, ज्वार, बाजरा, अरहर जैसी ऊंचाई वाली फसलों में आती है। ड्रोन सभी फसलों पर छिड़काव करने में सक्षम है। एक एकड़ के जिस खेत में दो मजदूर दिनभर का समय लेते हैं, वह काम यह ड्रोन केवल आधे घंटे में कर देता है। रिचार्जवल बैटरी से चलने वाले इन ड्रोन पर छिड़काव के लिए बारह से पंद्रह रूपये का खर्च आता है। एक बार में तकरीबन पांच से सात लीटर कीटनाशकों के साथ ये ड्रोन उड़ान भर सकते हैं।

आमतौर पर मानसून के सीजन में मजदूर नहीं मिलते और मिलते भी हैं तो उनका रेट बहुत ज्यादा होता है। लिहाज़ा अगर आपके पास ड्रोन हो तो इस तरह की सद दर्द से भी आपको राहत मिलती है।

विदेशों में ड्रोन को लेकर अलग अलग प्रयोग भी देखने को मिल रहे हैं। अमेरिका में तो मीडिया रिपोर्टिंग भी ड्रोन से की जाती है। कई कंपनियों ने ड्रोन के जरिए ही ग्राहकों तक सामान पहुंचाने की व्यवस्था शुरू कर दी है। पिछले दिनों मुंबई में भी ड्रोन से पिज्जा डिलिवरी का सफल प्रयोग किया गया। यही नहीं पिछले साल दिल्ली में दंगे भड़कने के हालात पैदा हुए तो पुलिस ने ड्रोन से ही मकान के छतों पर नजर रखी। ब्रिटेन के किसान ड्रोन से ही पशुओं पर ड्रोन से नज़र रख रहे हैं।

ड्रोन का एक औऱ बेहतरीन इस्तेमाल पिछले दिनों महाराष्ट्र में तब देखने को मिला जब सूखा राहत के लिए सूखे का सर्वेक्षण कराने का जिम्मा राज्य सरकार ने ड्रोन्स के हवाले किया। राज्य के उस्मानाबाद जिले में दो ड्रोन की मदद से राज्य सरकार ने ये काम किया और उनके जुटाए आंकड़ों के आधार पर ही किसानों को दिए जाने वाले मुआवजे का निर्धारण किया गया। बाद में राज्य के यवतमाल और औरंगाबाद जिलों में भी ये प्रक्रिया दोहराई गई।

खेती किसानी के क्षेत्र में ड्रोन के उपयोग की असीम संभावनाएं हैं। ड्रोन से आने वाले तूफान का पता लगा सकता है। यही एक कारण है कि नासा,  द नेशनल ओशिएनिक और एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) और नॉर्थरोप ग्रूमेन ने तीन साल तक साथ काम किया तथा तूफान के उठने पर नजर रखने के लिए लॉन्ग रेंज अनमैन्ड एरिअल व्हीकल्स के उपयोग के लिए 30 मिलियन डॉलर का प्रयोग किया। ग्लोबल हॉक ड्रोन्स 30 घंटे तक हवा में रह सकता है और अपने 116 फूट के पंखों के फैलाव के साथ 11000 मील उड़ सकता है। यह तूफानी क्षेत्रों में ठहर सकता है जहां मानव सहित प्लेन पहुंच सकता।

छोटे, कम वजन वाले ड्रोन साधारण मॉडल एअरप्लेन जैसे दिख सकते हैं लेकिन वे हजारों डिजिटल इमेज के साथ लैंडस्केप्स का अवलोकन कर सकते हैं। इससे 3डी मैप तैयार किए जा सकते हैं। मिलिट्री और अन्य सरकारी सैटेलाइट वैसे ही मैप बनाती है, लेकिन तेजी से लोकप्रिया होती यूएवी टेक्नोलॉजी कई गुना सुविधाजनक होती है।

अमेरिका में जीव-जंतुओं की सुरक्षा के लिए ड्रोन का उपयोग शुरू हो चुका है। द डिपार्टमेंट ऑफ द इंटीरियर, द ब्यूरो ऑफ लैंड मैनेजमेंट और द यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्विस यूएवी का उपयोग कर रहे हैं और वन्य जीवन की आबादी या मैप रोड तथा वेटलैंड्स को मॉनिटर कर रहे हैं।

जापान में लोग बीस साल से यामाहा आरमैक्स उड़ा रहे हैं। पहाड़ी इलाकों पर कई सारे खेत हैं और ये व्हीकल्स पांच मिनट में एक एकड़ का दौरा कर लेते हैं जो कि एक ट्रैक्टर के लिए बहुत मुश्किल है। इसका तकनीक का उपयोग खेतों को मॉनिटर करने, मुनाफा बढ़ाने और पैसा बचाने के लिए किया जाता है। ड्रोन यह पता लगाने में मदद करता है कि किस क्षेत्र में कीटनाशक दवाएं, पानी या उर्वरक का उपयोग जरूरी है और उन्हें वहां पहुंचाता है। ड्रोन कैमरा पता लगाता है कि कहां नाइट्रोजन लेवल कम है या किस क्षेत्र का विकास कम हुआ है।

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