फसलों की कटाई के मौसम में इस प्रकार की खबरें प्राय अखबारों की सुर्खियां बनती आपने भी देखी होंगी.. फसलों के अवशेष को जलाने पर सरकार ने जताई चिंता, किसानों से की फसल के अवशेष न जलाने की अपील, फसल अवशेषों के समाधान के वैज्ञानिक तरीके सिखाएगा कृषि विभाग।

वास्तव में ये एक गंभीर समस्या है जिसके लिए बहुत हद खेती की परंपरागत शैली जिम्मेदार है। आपको इस बात की बानगी देखनी है तो पंजाब के गांवों की ओर रूख करना होगा। जहां पर फसल की कटाई के बाद बचे अवशेष जलाने से हवा में लगातार जहर घुल रहा है। इससे न केवल राज्य के वातावरण में प्रदूषण के स्तर में इजाफा होता है बल्कि स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

पंजाब के ज्यादातर गांवों में चाहे वह गेहूं या धान की फसल हो, कटाई के अंत में पूरे इलाके में धुएं की चादर फैल जाती है। चारों ओर जहर घुलता धुंआ का साम्राज्य होता है। इन स्थानों पर किसान अगली फसल के लिए खेत को तैयार करने से पहले अवांछित पौधों के अवशेषों से छुटकारा पाने के लिए खेत में मौजुद फसल की खूंटी जलाने का विकल्प चुनते रहे हैं। इस पर ज्यादातर किसान कहते हैं कि ये प्रक्रिया एकमात्र व्यवहारिक विकल्प है क्योंकि मशीनों का इस्तेमाल करते हुए वैज्ञानिक तरीके से बची हुई फशल की खूंटी (अवशेषों) का प्रबंधन करना बहुत महंगा है। फिर भी बहुत से ऐसे किसान भी हैं, जिन्होंने फसल के बचे हुए अवशेष को जलाने के दुष्प्रभाव की गंभीरता को समझा और बायोमास के लिए अवशेषों को इकट्ठा करने और उन्हें आपूर्ति करने में लोगों की सहायता कर रहे हैं। इस तरीके से जहां उन्हें लाभ हुआ है, वहीं वातावरण को भी प्रदूषण से मुक्ति मिल रही है।

पंजाब के मुक्तसर के चक दुहे वाला गांव के 51 वर्षीय किसान त्रिलोचन सिंह ने अपने बलबुते साबित कर दिखाया है कि फसल की कटाई के बाद बची हुई खूंटी (अवशेष) से कमाई भी हो सकती है। वह कम से कम आसपास के 5 गांवों के खेतों में अवशेषों का प्रबंधन करते हैं, जिसे किसान अमूमन आग लगा कर जला देते रहे हैं। इस कार्य के जरिए वे मानवता की सेवा करने के साथ-साथ वह कुछ पैसे भी कमा लेते हैं।trilok singh-2

बेलर्स और अन्य आधुनिक मशीनरी का इस्तेमाल करते हुए वो लगभग 2,000 एकड़ जमीन से बिना किसी सरकारी मदद से ये अवशेष एकत्रित करते हैं। आपको बता दें कि मशीनों से इस प्रकार के खेतों में बचे अवशेषों को प्रबन्धन करने की लागत 15 लाख आती है, जिसे छोटे किसान वहन नहीं कर सकते। त्रिलोचन बताते हैं, “मैं इस पूरे क्षेत्र का पहला व्यक्ति था, जो वर्ष 2009 में 12 लाख रुपये में बेलर और 2 लाख 90 हजार रूपये के रेक मशीन खरीदने के लिए गया था। मैंने फसल की खूंटी के अवशेष एक बेलर की सहायता से एकत्रित करके इसे पास के बायोमास बिजली उत्पादन संयंत्र में बेचना शुरू किया”।

आज उनके पास पांच बेलर्स, छह रेक मशीन, रीपर और छह ट्रैक्टर हैं, जिसे वो अन्य किसानों को किराए पर देता हैं, जिससे अब वे किसान भी स्टबल(फशलों की खूंटी) से अतिरिक्त पैसा कमाते हैं। वो कहते हैं, “इससे एक किसान प्रति एकड़ में 4,000 रुपये तक कमा सकते हैं। एक एकड़ की खेत में 25-35 क्विंटल फसलों के अवशेष निकल आते हैं। बायोमास प्लांट की कंपनी बची हुई फसलों के अवशेष की कीमत 132 रुपये प्रति क्विंटल देती हैं”।

अपने 200 एकड़ की जमीन में फसल की अवशेष का प्रबंधन करने के साथ ही त्रिलोचन अन्य किसानों को फसल की अवांछित अवशेष को आग के हवाले करने के विरूद्ध प्रेरित भी करते हैं। त्रिलोचन कहते हैं कि जब तक सरकार मशीन खरीदने में किसानों को सहयोग नहीं करेगी, तब तक इसे पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता।

इस मामले में अहम जानकारी देते हुए वो कहते हैं कि सरकार ने दो साल पहले ही बेलर्स और रेक मशीनों पर सब्सिडी देना बंद कर दिया था। धनी किसानों के लिए भी इन मशीनों को खरीदना अब असंभव सा हो गया है। उनका सुझाव है कि अगर सरकार इस प्रथा को रोकना चाहती है तो इसे खरीदने में सरकार को किसानों को सब्सिडी देनी चाहिए।  इससे पहले,  सरकार बेलर्स पर 4 लाख रुपये और रैक मशीन पर 1.3 लाख रुपये की सब्सिडी देती थी। उनके मुताबिक यहां पर और बायोमास प्लांट लगाने की जरूरत है, जिससे फसल के अवशेष की मांग और बढ़ेगी। उनका कहना है, “अधिक बायोमास प्लांट से ज्यादा मांग होगी”।

इसी इलाके में तीन साल पहले संधवान गांव के जगदेव सिंह (63) ने फसलों के अवशेषों को जलाने की प्रथा को रोकने के लिए कदम उठाया था जिसका अब उन्हें फायदा मिल रहा है। गढ़शंकर के गुज्जरपुर गांव में बायोमास संयंत्र को ये अवशेष बेच कर उन्हें प्रति क्विंटल 70 रुपये लाभ हो रहा है।Jagdev Singhके बारे में जगदेव सिंह कहते हैं कि मैं फसल की अवशेषों को 140 रूपये प्रति क्विंटल बेच कर माल की ढुलाई, मशीन का खर्च और मजदूरी की लागत निकाल दें तो 70 रूपये का मुनाफा कमाता हूं। वह गन्ने के अवशेषों की बिक्री भी कर रहे हैं, जिससे उन्हें 170 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिलता हैं।

उनकी देखा देखी उनके ही गांव के तीन अन्य किसानों ने भी उनकी नकल शुरू की। दो साल पहले तक सरकार की ओर से दी जाने वाली 40 फीसदी की सब्सिडी लेकर उन्होंने बेलर खरीदा। सभी किसान मिलकर इलाके की 500 एकड़ जमीन पर फसल अवशेष का प्रबंधन कर रहे हैं।

किसान जगदेव सिंह बताते हैं कि फसलों की खूंटी इकट्ठा करने और गांठों को बनाने की पूरी प्रक्रिया को पूरा करने में बेलर मशीन को कुछ घंटों की ही ज़रूरत पड़ती है, लेकिन किसान अपनी खेतों को फसल कटाई के तुरंत बाद ही फसलों की अवशेषों को हटाना चाहते हैं, इसलिए, वे इसे जलाने का सबसे आसान विकल्प चुनते हैं।

जगदेव सिंह किसानों को फसलों के अवशेषों को जलाने के दुष्प्रभाव से अवगत कराते हैं और उन्हें इस बात की भी जानकारी देते हैं कि इससे पैसे कैसे कमा सकते हैं। इस काम को सही रूप से करने के लिए किसान अपने आसपास के क्षेत्र में अधिक बायोमास प्लांट चाहते हैं। राज्य सरकार भी किसानों के इस मांग को लेकर सकारात्मक सोचती है।

पंजाब ऊर्जा विकास प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमरपाल सिंह कहते हैं कि हम अधिक बायोमास संयंत्रों की स्थापना के लिए निविदाएं जारी कर रहे हैं। जल्द ही, राज्य में फसलों की अवशेषों की मांग बढ़ेगी।

मुख्य तथ्य पर एक नज़र

-यदि किसान फसलों के अवशेषों को बेच देते हैं तो उन्हें प्रति एकड़ 4,000 रुपये अतिरिक्त आय होगी।

-फसलों के अवशेषों को जलाने के कारण वातावरण में निलंबित कणों में 25-50% वृद्धि होती है।

-इस सीजन में पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) ने 736 किसानों का चालान काटा है

-ऐसा करने वाले किसानों पर 30 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।

– फसलों के अवशेष का इस्तेमाल करने वाले सात बायोमास प्लांटों में 70 मेगावाट बिजली पैदा की जाती है।

-इन प्लांट्स में फसलों के 10 लाख टन अवशेषों की खपत होती है।

-खरीफ सीजन में 180 लाख टन स्टबल का उत्पादन होता है।

-फसल के अवशेषों का सिर्फ 22 प्रतिशत ही इस कार्य में इस्तेमाल होता है, बाकी को जला दिया जाता है।

– पूरे इलाके में 28 लाख हेक्टेयर जमीन का इस्तेमाल धान की खेती के लिए किया जाता है।

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