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सेहत के साथ किसानों की आमदनी का जरिया है नींबू
4 months ago

सेहत के साथ किसानों की आमदनी का जरिया है नींबू

नींबू में कई तरह के औषधीय गुण हैं इससे तो सभी परिचित हैं लेकिन नीबूं का फसल किसानों के लिए भी फायदेंमंद है। नीबू की खेती कर किसान बेहतर कमाई कर सकते है। नींबू की अलग अलग प्रजातियां भारत में उगाई जाती है। एसिड लाइम (नींबू की एक प्रजाति ) वैज्ञानिक नाम साइट्रस और्तिफोलिया स्विंग की खेती भारत में ज्यादा प्रचलित है। इस प्रजाति को भारत के अलग अलग राज्यों में उगाया जाता हैl आंध्र प्रदेश , महाराष्ट्र ,तमिलनाडु ,गुजरात ,राजस्थान ,बिहार के साथ ही देश के अन्य हिस्सों में भी इसकी खेती की जाती है।

क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक

विशेषज्ञों की राय है कि साइट्रस पौधों को बोने के लिए उप उष्णकटिबंधीय जलवायु को उपयुक्त माना जाता है। नए पौधों के लिए 40 डिग्री से कम तापमान को कृषि वैज्ञानिको ने हानिकारक बताया है। मिट्टी का तापमान 250 डिग्री हो तो पौधों के जड़ो के विकास सामान्य रूप से होता है और यह तापमान साइट्रस पौधों के विकास के लिए सटीक माना गया है। 25 सेमी से 250 सेमी तक होने वाली बरसात साइट्रस पौधों के लिए अच्छी मानी जाती है। उच्च आद्रता में साइट्रस फसलों में रोग लगने की आशंका बनी रहती है। ठण्ड भी इन फसलों के लिए माकूल नहीं माना जाता। तेज़ हवा से नीबू के पेड़ पर लगने वाले फलो को नुकसान होता है। वही साइट्रस की कुछ प्रजातियां ठंढे प्रदेशो में भी उगाई जाती है। दार्जलिंग मंदारिन जैसी नस्लों को २००० मीटर के ऊंचाई पर भी उगाया जाता है।

नींबू की खेती के लिए मिट्टी की तैयारी:

निम्बू को कई किस्म के मिट्टी उगाया जा सकता हैं। मृदा की प्रतिक्रिया, मिट्टी की उर्वरता, जल निकासी,मुफ्त चूने और नमक सांद्रता जैसे मृदा गुण आदि कुछ महत्वपूर्ण कारक हैं जो कि निम्बू वृक्षारोपण की सफलता का निर्धारण करते हैं। अच्छी जल निकासी के साथ हल्की मिट्टी पर निम्बू फल अच्छी तरह से फूलते हैं। पीएच श्रेणी 5.5 से 7.5 के बीच मिट्टी को निम्बू के फसल के लिए अच्छा माना जाता है। हालांकि, निम्बू की पैदावार 4 से 9 की पीएच श्रेणी में भी अच्छी हो सकती हैं।

भारत में नींबू की उगाई जाने वाली किस्में:

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भारत के अलग अलग हिस्सों में उगाये जाने वाले नींबू की महत्वपूर्ण किस्में हैं:

1. मैंडरिन ऑरेंज: कुर्ग (कुर्ग और विलीन क्षेत्र), नागपुर (विदर्भ क्षेत्र), दार्जिलिंग (दार्जिलिंग क्षेत्र), खासी (मेघालय क्षेत्र) सुमिता (असम), विदेशी किस्म – किन्नो (नागपुर, अकोला क्षेत्रों, पंजाब और आसपास के राज्यों)।

2. मिठाई ऑरेंज : रक्त लाल (हरियाणा, पंजाब और राजस्थान), मोसंबी (महाराष्ट्र), सतगुडी (आंध्र प्रदेश), विदेशी किस्मों- जाफ, हैमलिन और अनानास (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान), वेलेंसिया।

3. नींबू: प्रामलिनी, विक्रम, चक्रधर, पीकेएम 1, चयन 49, सीडलेस लाइम, ताहिती स्वीट लाइम : मिथाचिक्रा, मिथोत्र लिंबा: यूरेका, लिस्बन, विलाफ्रांका, लखनऊ बीडलेस, असम लीमन, नेपाली राउंड, लेमन 1 मैंडरिन संतरे, नागपुर सबसे महत्वपूर्ण किस्म है। मोसंबी मध्य-ऋतु के शुरुआत में आता है, लेकिन कम रसदार किस्म की सतगुड़ी बाजार में जल्दी आती है। प्रमिलिनी, विक्रम और पीकेएम 1 आईसीएआर द्वारा अत्यधिक क्लस्टर वाले खट्टे नींबू हैं।

नींबू की खेती के लिए स्थान / भूमि का चयन: भूमि को व्यापक रूप से जोता जाना आवश्यक है गहन जुताई के बाद खेतों को समतल किया जाना चाहिए. पहाड़ी क्षेत्रों में ढलानों के साथ की जगहों में नींबू का रोपण किया जाता है। ऐसी भूमि में उच्च घनत्व रोपण संभव है क्योंकि समतल जगह की तुलना में पहाड़ी ढलान पर ज्यादा कृषि उपयोग हेतु जगह उपलब्ध रहती है.

नींबू की खेती के लिए मानक
1. नारंगी: सामान्य अंतर – 6 मी x 6 मीटर; पौधे की आबादी – 275 / हे०

2. स्वीट लाइम: सामान्य अंतर – 5 मी x 5 मीटर; पौधे आबादी – 400 / हे०

3. लाइम / नींबू सामान्य अंतर – 4.5 मी x 4.5 मीटर; पौधे आबादी – 494 / हेक्टेयर बहुत हल्की मिट्टी में, अंतर 4 मीटर x 4 मीटर हो सकता है उपजाऊ मिट्टी में और उच्च वर्षा क्षेत्रों में अंतर 5 मी x 5 मीटर हो सकता है

नींबू की खेती के समय : रोपण का सबसे अच्छा मौसम जून से अगस्त तक है। रोपाई के लिए 60 सेमी x 60 सेमी x 60 सेमी के आकार के गड्ढे खोदे जा सकते हैं। 10 किलोग्राम एफवायएम और 500 ग्राम सुपरफॉस्फेट को प्रति गड्ढे पर लगाया जा सकता है। अच्छी सिंचाई प्रणाली के साथ रोपण अन्य महीनों में भी किया जा सकता है।

नींबू के पौधों की सिंचाई : नींबू की सर्दियों और गर्मियों के दौरान पहले साल में की गयी सिचाई नींबू के पौधों के लिए जीवन रक्षक साबित होती है और पौधों को बचाने में आवश्यक भूमिका अदा करती है। सिंचाई से पौधों में वृद्धि के साथ ही फलों के आकार पर भी सकारात्मक असर होता है. सिंचाई कम होने की सूरत में नींबू के फसल पर नकारात्मक असर पड़ता है और कई बीमारियाँ भी पौधों को लग सकती है. रूट सड़ांध और कॉलर रोट जैसे रोग अत्यधिक सिंचाई की स्थिति में हो सकते हैं और किसानों को क्यारी क्षेत्र को गीला न रखने की सलाह दी जाती है। उच्च आवृत्ति के साथ हल्की सिंचाई फायदेमंद है। 1000 से अधिक पीपीएम लवण वाले सिंचाई का पानी हानिकारक है। पानी की मात्रा और सिंचाई की आवृत्ति, मिट्टी बनावट और पौधों के विकास के स्तर पर निर्भर करती है। वसंत ऋतु में मिट्टी को आंशिक रूप से सूखा रखना फसल के लिए फायदेमंद है।

खाद और उर्वरक:

फ़रवरी, जून और सितंबर के महीनों एक वर्ष में खाद/फ़र्टिलाइज़र की तीन समान खुराक खाद नींबू के पौधे में डाला जा सकता है। मिट्टी, पौधों की उम्र और पौधों की वृद्धि के आधार पर, खुराक भिन्न होता है। आठवें वर्ष पर पूर्ण मात्रा तक पहुंचने के लिए खुराक को प्रतिवर्ष अनुपात में वृद्धि करनी चाहिए। सूक्ष्म पोषक तत्व के मिश्रण का छिड़काव एक या दो बार किया जाना चाहिए.

नींबू के साथ उगाये जा सकने वाले पौधे (अंतर-फसल): मटर, फ्रांसीसी बीन, मटर की अन्य प्रजातियाँ या अन्य कोई सब्जियां आदि नींबू के बगीचे में उगाई जा सकती हैं। अंतर-फसल केवल प्रारंभिक दो से तीन वर्षों के दौरान उचित है।

कटाई और छंटाई : एक मजबूत तने के विकास के लिए प्रारंभिक चरण में विकसित हुए पहले 40-50 सेमी में सभी नयी टहनियों को हटा दिया जाना चाहिए। पौधे का केंद्र खुला होना चाहिए। शाखाएं सभी पक्षों को अच्छी तरह वितरित की जानी चाहिए क्रॉस टहनियां और पानी की सोरियों को जल्दी से हटाया जाना चाहिए। फल लगे पेड़ों को कम या नहीं के बराबर छंटनी की आवश्यकता होती है सभी रोगग्रस्त और सूखी शाखाओं को समय-समय पर नींबू के पौधे से हटा दिया जाना चाहिए।

कीट / कीड़े और रोग नियंत्रण प्रबंधन:

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कीट: नींबू के महत्वपूर्ण कीटों में साइट्रस साइलिया, पत्ती माइनर, स्केल कीड़े, नारंगी शूट बोरर, फल मक्खी, फलों की चूसने वाली पतंग, कण, आदि विशेष रूप से आर्द्र में विशेष रूप से मेन्डिना नारंगी पर हमला करने वाले अन्य कीटक जलवायु मेलीबग, नेमेटोड आदि हैं। प्रमुख कीटों के नियंत्रण के उपाय नीचे दिए गए हैं:

1. साइट्रस साइला: मैलेथियन का छिड़काव – 0.05% या मोनोक्रोटोफॉस – 0.025% या

2. कार्बारील – 0.1%

3. पत्ती माइनर : फॉस्फमोइडन के @ 1 के छिड़काव एमएल या मोनोक्रोटोफ़ोस @ 1.5 एमएल प्रति लीटर 2 या 3 बार पाक्षिक रूप से

4. स्केल कीड़े: पैराथायन (0.03%) पायस, 100 लीटर पानी में डाइमिथोएट और 250 मिलीलीटर केरोसिन तेल 0.1% या कार्बरील @ 0.05% प्लस ऑयल 1%

5. ऑरेंज शूट बोरर: बाग के दौरान मिथाइल पैराथाइन @ 0.05% या एन्डोसल्फान @ 0.05% या कार्बरील @ 0.2% का छिड़काव।

नींबू के पेड़ पर लगने वाले सामान्य रोग : नींबू के मुख्य रोग त्रिस्टेजा, साइट्रस कैंकर, गमुमोस, पाउडर फफू, एंथ्राकनोज इत्यादि हैं। इन रोगों के नियंत्रण के उपाय संक्षेप में नीचे दिए गए हैं:

1. ट्रिज़ेज़ा: एफ़िड्स का नियंत्रण और क्रॉस-संरक्षित रोपाई का उपयोग की सिफारिश की।

2. साइट्रस कैंकर: 1% बोर्डो मिश्रण या तांबा कवकनाशी का छिड़काव करना एवं प्रभावित टहनियों को काटना। 500 पीपीएम का जलीय समाधान, स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट भी प्रभावी है।

3. गमुमोस: प्रभावित क्षेत्र और बोर्डो मिश्रण या तांबे के ऑक्सिफ्लोराइड के आवेदन के स्क्रैपिंग।

4. पाउडर फफूंद: पहले से फुफुंद द्वारा प्रभावित टहनियों को छांटना चाहिए। वेटेबल सल्फर 2 ग्राम / लीटर, तांबे ऑक्कोक्लोराइड – 3 ग्राम / लीटर पानी अप्रैल और अक्टूबर में छिड़काव किया जा सकता है। कार्बेन्डैज़िम @ 1 ग्रा / लीटर या तांबा ऑक्सी क्लोराइड – 3 ग्रा / लीटर पाक्षिक

5. एंथ्राकनोज: सूखे टहनियाँ को पहले ही छांट देना चाहिए। कार्बेंडज़िम @ 1 ग्रा / लीटर या तांबा ऑक्सी क्लोराइड के दो स्प्रे के बाद इसे 3 ग्रा / लीटर पाक्षिक

नींबू की कटाई : गर्मी, बरसात के मौसम और शरद ऋतु में एक वर्ष में 2 या 3 फसल हो सकती है। ऑरेंज की फसल को तोड़ने का निर्णय फल के विकसित रंग के आधार पर लिया जाता है।

लाइम फार्मिंग नींबू की खेती का उपज :

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1. नारंगी : 4/5 वें वर्ष से शुरू होता है और प्रति पेड़ 40/45 फल होता है। 10 वीं वर्ष में पौधे का विकास स्थिर के बाद औसत उत्पादन लगभग 400-500 फल प्रति पेड़ है।

2. मीठे ऑरेंज : तीसरी या चौथी वर्ष से 15 से 20 फलों प्रति पेड़ के साथ शुरू होता है। 8 वें वर्ष के आसपास पौधे का विकास स्थिर होने के बाद औसत उत्पादन लगभग 175-250 फल प्रति पेड़ है।

3. निम्बू / नींबू : 2 / 3rd वर्ष से 50-60 फलों प्रति पेड़ के साथ शुरू होता है। 8 वें वर्ष में पौधे का विकास स्थिर के बाद औसत उत्पादन लगभग 700 फल प्रति पेड़ है।

नींबू के पौधों का जीवन काल : नारंगी और मीठे निम्बू – 20 से 30 साल

खट्टा नींबू – 15 से 25 साल

साइट्रस के बाद का फसल प्रबंधन: मिठा नारंगी और नारंगी के रंग के विकास के लिए ईथर के साथ छिड़काव किया जा सकता है। 250C से कम तापमान में इथाइलीन नारंगी के रंग को प्रभावित कर सकता हैं। साइट्रस का प्री-कूलिंग एयर सिस्टम द्वारा किया जाता है। संतरे के लिए संक्रमण तापमान 100 डिग्री सेल्सियस है। संतरे अच्छी तरह हवादार CFB बक्से में पैक हो सकती हैं – 30 सेमी x 30 सेमी x 30 सेमी धुलाई, छंटाई, आकार ग्रेडिंग, नारंगी के लिए फंगल संबंधी उपचार और फिर सीएफ़बी बॉक्स में पैकिंग के लिए एक यांत्रिक साइट्रस पैकिंग लाइन भी उपलब्ध है।

साइट्रस का भंडारण: मंदारिन ऑरेंज: ऑरेंज 5-70 सेंटीग्रेड पर 4-8 सप्ताह के लिए 85-90% आद्रता के साथ संग्रहीत किया जा सकता है। मीठा ऑरेंज: 5-70 सेंटीग्रेड में मिठाई संतरे को 3-8 सप्ताह के लिए 85-90% आद्रता के साथ संग्रहीत किया जा सकता है। निम्बू / नींबू : निम्बू और नींबू को 9-800 के भंडारण तापमान पर 6-8 सप्ताह के लिए 80-90% आद्रता युक्त रखा जा सकता है।

लाइम फार्मिंग विपणन और निर्यात : साइट्रस परिवेश की स्थिति के तहत एक लंबे समय के लिए अच्छी तरह से सुरक्षित रहता है और इसलिए विपणन के लिए दूर के स्थानों में पहुँचाया जा सकता है। देश में नींबू और संतरे के फल दूर दराज इलाकों में भी बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। कई फल प्रसंस्करण इकाइयां भी थोक में साइट्रस फल की खरीददारी करती हैं। भारतीय संतरे अन्य देशों को भी निर्यात किये जाते हैं.

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प्रति पौधा 19 किलो की उपज देने वाले टमाटर की नई प्रजाति आई सामने
1 year ago

प्रति पौधा 19 किलो की उपज देने वाले टमाटर की नई प्रजाति आई सामने

टमाटर का इकलौता पौधा कितनी उपज दे सकता है, आप अनुमान लगा सकते हैं क्या?  दिमाग के सारे घोड़ों को दौड़ाइये….और बताइए…कितना किलो तक पहुंचे…5 किलो से लेकर 10 किलो तक। ये भी आपको ज्यादा लग रहा होगा, है न!

हम यहां जिस टमाटर के पौधे का जिक्र करने जा रहे हैं, वो कोई मामूली टमाटर के पौधे नहीं है, इसे भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) ने विकसित किया है। संस्थान ने टमाटर की ये नई किस्म जो विकसित की है, उसके एक पौधे से 19 किलो टमाटर का उत्पादन हुआ है। रिकॉर्ड बनाने वाली टमाटर की इस नई उन्नतशील किस्म का नाम अर्का रक्षक है। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने परिशोधन खेती के तहत उन्नतशील किस्म के इस पौधे से इतना उपज हासिल किया।

इस विधि से टमाटर उत्पादन का ये उच्चतम उपज स्तर है। इस रिकार्ड तोड़ उपज ने टमाटर की खेती करने वाले किसानों के बीच हलचल मचा दी है। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान अर्कावथी नदी के किनारे स्थित है। यही वजह है कि उत्पादन के रिकॉर्ड बनाने वाली टमाटर की इस नई किस्म को अर्का रक्षक के नाम से नवाजा गया है।

इसके बारे में संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक और सब्ज फसल डिवीजन के प्रमुख एटी सदाशिव कहते हैं, “पूरे प्रदेश में टमाटर की ये सर्वाधिक उपज है और वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक टमाटर की ये प्रजाति राज्य में में टमाटर की सबसे ज्यादा उपज देने वाली साबित हुई है”।

इनके मुताबिक टमाटर के संकर प्रजाति की अन्य पौधों में सर्वाधिक उपज 15 किलो तक रिकार्ड की गई है। उन्होंने कहा कि जहां कर्नाटक में टमाटर का प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 35 टन है, वहीं अर्का रक्षक प्रजाति की टमाटर का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 190 टन तक हुआ है।

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नई किस्म के टमाटर के पौधे को लेकर किसानों के बीच काफी उत्सुकता है। कई किसान इसकी खेती को लेकर काफी आशान्वित नज़र आ रहे हैं और कुछ किसान इसकी खेती कर रिकार्ड उपज भी पा चुके हैं। चिक्कबल्लपुर जिले के देवस्थानदा हौसल्ली के एक किसान चंद्रापप्पा ने इस उन्नतशील प्रजाति के 2000 टमाटर के पौधे अपने आधे एकड़ के खेत में लगाकर 38 टन टमाटर की उपज हासिल की जबकि इतनी संख्या मे ही अन्य हाइब्रिड टमाटर के पौधे से20 टन का उत्पादन वो ले पाते थे।

चंद्राप्पा बताते हैं, “नवंबर 2012 से लेकर जनवरी 2013 के बीच मैंने 5 रुपये से ग्यारह रुये प्रति किलो तक इसे बेचकर, 80 हजार रुपये की लागत राशि काटकर पौने तीन लाख रुपये की बचत हासिल की।

डॉ सदाशिव के मुताबिक ये महज उच्च उपज देने वाली प्रजाति ही नहीं है बल्कि टमाटर के पौधों में लगने वाले तीन प्रकार के रोग, पत्तियों में लगने वाले कर्ल वायरस, विल्ट जिवाणु और फसल के शुरूआती दिनों में लगने वाले विल्ट जिवाणु से सफलतपूर्वक लड़ने की भी इनमें प्रतिरोधक क्षमता मौजुद हैं। उनके मानना है कि इससे कवक और कीटनाशकों पर होने वाले खर्च की बचत से टमाटर की खेती की लागत में दस फीसदी तक की कमी आती है।

इसके साथ ही गहरे लाल रंग के इस टमाटर की खेती के कुछ अन्य फायदे भी हैं। मसलन इसके गहरे रंग की वजह से इन टमाटरों को अधिक दूरी तक ट्रांसपोर्ट के जरिए भेजने में आसानी होती है। अन्य सामान्य प्रजातियों के टमाटरों की उपज के बाद छह दिनों तक रखा जा सकता है, संकर प्रजाति के टमाटर दस दिनों तक जबकि अर्क प्रजाति के टमाटर पंद्रह दिनों तक आसानी से किसी अन्य प्रयास के रखे जा सकते हैं।

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चीन के बाज़ार में धूम मचाने को तैयार  भारतीय शरीफा ‘अर्का सहन’
1 year ago

चीन के बाज़ार में धूम मचाने को तैयार भारतीय शरीफा ‘अर्का सहन’

भले ही चायनीज समान भारत में कहीं पर आसानी से बिक जाता हो, लेकिन भारत के उत्पाद को चीन में बेचना आसान नहीं है। फिर भी कुछ भारतीय उत्पाद भी चीन में अपना जलवा बिखेरने का माद्दा रखते हैं। इसी फेहरिस्त में प्रसिद्ध देसी फल शरीफा (सीताफल) का नाम मुख्य रूप से लिया जा रहा है। खासकर, नई प्रजाति का ‘अर्का सहन’ शरीफा चीन के बाज़ार में अपनी जगह और धूम मचाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पौष्टिक तत्वों की भरपूर मात्रा के साथ-साथ परंपरागत किस्म की तुलना में अधिक टिकाऊ होने के बाद भी नई प्रजाति का ये शरीफा निर्यात के मामले में अब तक लोकप्रियता हासिल नहीं सका है। लेकिन अब ये चीन के बाज़ार को गुलजार करने की तैयारी में है।

पिछले मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चीन दौरे पर भारत ने अर्का सहन के निर्यात को लेकर चले रहे गतिरोध को दूर करने का आग्रह चीन से किया है। चीन की ओर से अर्का सहन को लेकर की गई पूछताछ से भारतीय वैज्ञानिकों के उम्मीद को भी पंख लग गए हैं। खास तौर पर बेंगलुरु स्थित भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान IIHR के वैज्ञानिकों में जिन्होंने सत्रह सालों की कडी मशक्कत के बाद अर्का सहन की प्रजाति को विकसित करने में सफलता पाई, इसको लेकर जोश दोगुना हो गया। वैज्ञानिकों का दावा है कि नई किस्म का ये शरीफा पौष्टिक मूल्य, आकार और टिकाऊपन के मामले में अतुलनीय है।

अर्का सहन प्रजाति को विकसित करने वाली टीम के सदस्य रहे और भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के प्रमुख सेवानिवृत्त वैज्ञानिक एस एच जलिकॉप का कहना है, “हालांकि ये कस्टर्ड एप्पल (शरीफा) (दक्षिण भारत औऱ देश के अन्य भागों में सीताफल के रुप में जाना जाता है) के समान ही है तथापि ये आप में एक नया फल है। इसे संभ्रांत संकर किस्म के रूप में विकसित होने में 17 साल लग गए”।

एक नया फल : अर्का सहन

  • शरीफे के समान लेकिन वैज्ञानिकों का दावा कि ये एक नया फल है।
  • इसमें शरीफा के पोषक तत्वों की तुलना में 87 प्रतिशत अधिक प्रोटीन, 249 फीसदी अधिक फास्फोरस और 42 प्रतिशत अधिक कैल्सियम पाए जाते हैं।
  • पका हुआ अर्का सहन सामान्य शरीफे की तरह ही ठोस
  • इसमें बहुत कम बीज होते हैं जो फल के गुदा से नहीं चिपकते हैं।
  • अधिक टिकाऊ होने और धीरे-धीरे पकने की इसकी प्रकृति इसे लंबी दूरी के ट्रांसपोर्ट और निर्यात के अनुकूल बनाती है।
  • पारंपरिक शरीफा से 250 प्रतिशत बड़ा होता है।
  • यह गर्म शुष्क क्षेत्रों में खेती के लिए बेहद उपयुक्त
  • अर्का सहन के पेड़ वर्तमान में कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात में लगाए गए हैं।

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 वो कहते हैं, “अर्का सहन पूरी तरह से सीताफल नहीं है। बल्कि दो प्रजातियों को मिलाने से तैयार एक नया फल है जो 75 फीसदी सीताफल और 25 फीसदी चेरीमोया से मिलकर बना है।

इस फल का बाहरी आवरण लंबे समय के लिए टिकाऊ होते हैं और धीमी गति से पकने वाली प्रवृति इसे लंबी दूरी तक ले जाने के लिए उपयुक्त बनाते हैं। इसी कारण इसे निर्यात करना भी आसान होता है।

इसके बारे में एस एच जलिकॉप बताते हैं कि अर्का सहन पूर्ण रूप से सीताफल नहीं है। यह एक नये किस्म का फल है, जो सीताफल के 75 प्रतिशत और चेरीमोया के 25 प्रतिशत के संकरण से बना है। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के वैज्ञानिकों ने इसे इसी रूप में विकसित किया था। जिस प्रकार से दुनिया के अन्य हिस्सों में दो या तीन फलों को आपस में क्रॉस (संकर) कराकर एक नई किस्म के कई फलों को विकसित किया जाता है। इस प्रक्रिया से फलों की नई किस्म बन जाती है और बाज़ार को एक नया फल मिल जाता है। इसे लेकर उन्होंने कई नई विकसित किस्मों के फलों जैसे प्लमकाट जो बेर और खुबानी के संकर से, ऐप्रिम खुबानी और बेर के संकर से, पीकाटम( बेर, आडू और खुबानी से) का उदाहरण दिया। कहा, जबकि इनकी खेती संयुक्त राज्य अमेरिका में वाणिज्यिक रूप से की जाती है।

हालांकि पारंपरिक शरीफा की किस्म (मूल रूप से दक्षिण अमेरिकी देश का फल) भारत के कई हिस्सों में काफी अच्छी तरह से जाना जाता है, लेकिन फल का कमजोर बाहरी आवरण और प्रचुर मात्रा में बीजों की उपस्थिति के कारण इसे व्यापक उपभोक्ता स्वीकृति नहीं मिल पाई। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2000 में इसे पहली बार घरेलू बाजार में नए अवतार में अर्का सहन को उतार कर व्यापक उपभोक्ता स्वीकृति दिला दी है।

इस फल का नाम अर्कावती नदी से जुड़ा है, जो भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR), बेंगलुरू के करीब बहती है। जलिकॉप ने कहा, “संस्थान में पैदा होने वाले फल, सब्जियों और फूलों की किस्मों का उपसर्ग ‘अर्का’ है। ‘सहन’ का मतलब धैर्य के लिए होता है क्योंकि नए फलों को परिपक्व और परिपक्व फल के लिए समय लगता है, जबकि पारंपरिक सीताफल की तुलना में शरीफा) जो तेजी से पकने और बहुत जल्दी खराब होने के लिए कुख्यात है। ”

इन नए गुणों के साथ, अर्का सहन लंबी दूरी की परिवहन या निर्यात के लिए सबसे उपयुक्त हो गया है। यह हाल के दिनों में न केवल व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण फल बन गया है, बल्कि संस्थान से गढ़ा हुआ रोपण सामग्री की मांग भी बढ़ रही है।

इसके उपलब्धि के बारे में भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के प्रमुख वैज्ञानिक और अर्का सहन के प्रजनन पर वैज्ञानिक जलिकॉप के सहयोगी पी संपत कुमार ने कहा कि  जब से अर्का सहन यानि वर्ष 2000 में बाजार में लॉन्च किया गया, तब से लगभग 2 लाख ग्राफ्ट किसानों को 15 अक्टूबर तक बेचे गए हैं। जो संभवत विभिन्न राज्यों में 500 हेक्टेयर भूमि को कवर किया हो।

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किसानों के लिए बड़ी सौगात: इफको ने डीएपी (DAP), एनपीके (NPK) खाद के दाम घटाए
2 years ago

किसानों के लिए बड़ी सौगात: इफको ने डीएपी (DAP), एनपीके (NPK) खाद के दाम घटाए

1600/- रु प्रति टन कम की कीमत, हर बोरे पर 85 रु  दाम घटे , घटी कीमत तत्काल प्रभाव से लागू

किसानों को एक बड़ी सौगात देते हुए फर्टीलाइज़र की सबसे बड़ी सहकारी कंपनी इफको ने डीएपी और एनपीके उर्वरकों के दाम करने का फैसला किया है। इफको ने प्रति टन 1600 रुपये दाम करने का फैसला किया है। इफको के इस फैसले से किसानों को इन उर्वरकों के हर बोरे पर आज से ही 85 रुपये का फायदा होगा।  कीमत कम करने का फैसला तत्काल प्रभाव से लागू किया गया। अपने स्थापना के पचासवें साल में प्रवेश कर रही इफको की ओर से देश के किसानों को ये तोहफा है। इस साल 3 नवंबर 2016 को इफको अपनी स्थापना के पचासवें साल में प्रवेश कर रही है। 3 नवंबर 2017 को इफको अपनी स्थापना के पचास वर्ष पूरे कर लेगी।DAP 2

इफको के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ यू एस अवस्थी ने नई दिल्ली में आयोजित इफको की 45 वीं वार्षिक आम बैठक में उर्वरकों की कीमत कम करने संबंधी  घोषणा की। डॉ अवस्थी ने इस मौके पर कहा कि ये एक प्रकार से देश के किसानों के लिए इफको की तरफ एक तोहफा  है। किसानों के लाभ के लिए उर्वरकों के मूल्य में ये अब तक सबसे बड़ी कटौती में से एक है। भारत सरकार की महत्वपूर्ण डिजिटल इंडिया अभियान को समर्थन करते हुए इफको ने लगातार दूसरे साल 76 करोड़ रुपये के लाभांश का हस्तांतरण अपने 36 हजार सहकारी समितियों को ऑन लाइन बैंकिंग के जरिए किया।

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घर ही नहीं बैंक भी हैं बिना दरबाजे के … एक गांव ऐसा भी !

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बीते दिनों महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले का शनि शिंगनापुर गांव राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर हुए आंदोलन की वजह से चर्चा में रहा। दरअसल इस गांव की एक और खासियत है। अपने इष्ट शनि देव की वजह से प्रसिद्ध इस गांव की एक और खासियत देश दुनिया का ध्यान अपनी ओर खिंचती है। करीब 5 हज़ार की आबादी वाले इस गांव में लोग घरों में दरबाजे नहीं लगाते। घरों में दरबाजे का चौखट तो होता है लेकिन फाटक नहीं होता। घरों में ही नहीं बल्कि गांव में मौजुद बैंक भी बगैर दरबाजे के ही हैं। है न चौंकाने वाली बात। दरअसल गांव वालों को चोरी होने का भय नहीं सताता। लिहाज़ा घरों में दरबाजे ही नहीं लगाते।

क्या गांववासियों को चोर उचक्कों का डर नहीं सताता ? गांव में रहने वाली जयश्री गाडे बताती हैं “सालों पहले शनिदेव भक्तों के सपने में आए और कहा, तुम लोगों को अपने घरों में दरवाजे लगाने की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा। इसलिए हमलोगों के घरों में दरबाजा नहीं है”।

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साल 2011 में यूको बैंक ने शनिशिंगनापुर की शाखा की शुरूआत तो की लेकिन गांव वालों की इस विश्वास और भरोसे से लबरेज परंपरा का सम्मान करते हुए अपनी इस शाखा में उन्होंने तालों से परहेज ही किया। जानवरों को अंदर आने से रोकने के लिए बैंक में शीशे का फाटक तो है लेकिन दरबाजे नहीं है और न ही ताला। देश भर में अपनी तरह का ये अनुठा बैंक है। बैंक में तकरीबन चार हजार लोगों के खाते हैं।

गांव की पहचान शनिदेव की वजह से है। गांव के बीचों बीच तकरीबन पांच फीट लंबे काले रंग का एक चट्टान बगैर छत के एक प्लेटफार्म पर खड़ा है… यही प्रतिमा हजारों गांव वासियों की शक्ति का स्त्रोत हैं। आज शनिदेव का यह मंदिर अकूत धन संपत्ति वाले एक ट्रस्ट में तब्दील हो चुका है। लेकिन आज भी समुचे गांव की तरह इस मंदिर में भी कोई दरबाजा नहीं है।

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मंदिर के विदेशी मुद्रा खंड में काम करने वाले कैशियर अनिल डारनडाले अपनी इस आस्था के बारे में बताते हैं…” हमारा मानना है कि अगर कोई व्यक्ति कुछ चुराता है या किसी तरह की कोई बेइमानी करता है तो उस पर साढ़े सती का प्रकोप गिरता है। साढ़े सती मतलब दुर्भाग्य के साढ़े सात साल। उसके घर में कुछ न कुछ बुरा होता है। परिवार कोर्ट मुकदमें में फंसा जाता है, या दुर्घटना का शिकार हो जाता है। किसी की मौत हो जाती है या उसके व्यापार में उसे भारी घाटे का सामना करना पड़ता है। अनिल कहते हैं कि एक बार उनके चचेरे भाई ने लकड़ी का दरबाजा लगवाया था अगले ही दिन उसका कार एक्सिडेंट हुआ।

 

सदियों से इस गांव में चोरी डकैती छिनैती जैसा कोई वाकया नहीं हुआ है लेकिन बीते कुछ सालों गांव के लोग दबी जुबान में ही सही लेकिन दरबाजा, ताला औऱ घरों की सुरक्षा को लेकर शुरूआती स्तर पर ही सही बदलाव की बात करने लगे हैं। पिछले कुछ सालों में एक आध वारदात के बाद लोग घरों की सुरक्षा को लेकर दबी जुबान में ही सही बदलाव के संकेत तो देते हैं लेकिन अब भी शनिदेव के प्रति आस्था अटूट है और पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को एक झटके में छोड़ने को तैयार नहीं दिखते।

भौतिकवाद की अंधी दौड़ में लगी दुनिया के लिए शनि शिंगनापुर का ये प्रचलन ज़ाहिर है एक बहुत बड़ा संदेश है।

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