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युवा पेशेवरों का डेयरी फार्मिंग की ओर बढ़ता रूझान, प्रबंधक और इंजीनियर्स बन रहे हैं गौ पालक
2 months ago

युवा पेशेवरों का डेयरी फार्मिंग की ओर बढ़ता रूझान, प्रबंधक और इंजीनियर्स बन रहे हैं गौ पालक

Milk_Revolution6ग्राम्य भारत के प्रति विज्ञान गाडोडिया का प्रेम 2005 में तब शुरू हुआ था जब वो यस बैंक के माइक्रो फाइनेंस के प्रमुख के तौर पर भारत के ग्रामीण इलाकों में काम करने पहुंचे और गांवों में माइक्रो फाइनेनसिंग की संभावनाएं तलाशने के दौरान उन्हें ये बात समझ में आई कि ग्रामीणों को गरीबी से बाहर निकाल पाने में माइक्रोफाइनेंसिंग कुछ खास मदद नहीं कर पा रही है। यही वो समय था जब उन्होंने ग्रामीण इलाके में ही अपना एक उद्यम शुरू करने का विचार किया।

जुलाई 2006 में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ी और गांवो की परिस्थितियों का अध्ययन करने का विचार किया। 2006 से 2011 तक सतही तौर पर उन्होंने वर्मीन कंपोस्ट बनाने, जैविक खेती करने और एक ग्रामीण एनजीओ के लिए बीपीओ स्थापित करने का काम किया। आईआईटी – दिल्ली के इस बायोकैमिकल इंजीनियर ने 2012 में लोगों को शुद्ध औऱ ताजा दूध उपलब्ध कराने के मकसद और ये साबित करने के लिए कि डेयरी एक स्थापित उद्यम हो सकता है, जयपुर से 70 किलोमीटर दूर लिसारिया गांव में तकरीबन पौने दो एकड़ में अपना एक डेयरी स्थापित की।

भारतीय प्रबंधन संस्थान कलकत्ता के इस 40 वर्षीय एमबीए का मानना है कि गायों को प्रोत्साहन देने पर बेहतर, स्वास्थ्यवर्धक और भैंस की तुलना में ज्यादा पौष्टिक दूध मिलता है जो एक बेहतर संसाधन साबित हो सकता है।

वो बताते हैं, प्रत्येक भारतीय इस बात को जानते हैं कि गाय का दूध उनके लिए सबसे अच्छा है। पेट के लिए ये हल्का होता है और आसानी से पचता भी लेकिन किसान भैंस से अधिक दूध मिलने की वजह से जिससे उनको आय ज्यादा होती है गाय पालते ही नहीं हैं। हमने देखा है कि गाय के शुद्ध दूध की मांग है और उपभोक्ता इसके लिए ज्यादा पैसे खर्च करने को भी तैयार है। मुझे अब इसे उदाहरण के रूप में दिखाना था

Milk_Revolution3चार सालों में सहज़ डेयरी फॉर्म में गाय औऱ बछड़ों सहित कुल पशुओं की संख्या बढ़कर 150 तक हो गई और विज्ञान जयपुर के तकरीबन 250 घरों में दूध पहुंचाने का काम करते हैं। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात ये कि आस पास के 25 गांवों में विज्ञान के उदाहरण से प्रभावित होकर तकरीबन सभी किसान गौ पालन करने लगे।

पास में ही स्थित एक किसान सीताराम यादव जो तीन भैसों के मालिक थे अपना अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, मैंने सोचा कि अगर विज्ञान गायों के लिए सब कुछ छोड़ सकते हैं तो हम क्यों नहीं गौ पालन कर सकते हैं ? दो साल पहले मैंने एक गाय खरीदी, छह महीने बाद एक और गाय खरीदी और जनवरी 2015 में मैंने तीन और गायें खरीद लीं। मैं आज पचास लीटर दूध का उत्पादन करता हूं और अपने दो भाइयों की पढ़ाई का खर्च उठा पा रहा हूं। सीताराम यादव ने अपनी तीन भैंसों में से दो बेच दिए।

सहज में आज दूध देने वाली पचास गाय हैं और दूध का उत्पादन तकरीबन 500 लीटर है। लेकिन हाल ही में विज्ञान ने अपने फार्म में दूध प्रसंस्करण इकाई स्थापित कर लेने के बाद आस पास के किसानों से भी दूध इकठ्ठा करने की शुरूआत कर दी है। वो कहते हैं, ये किसान मेरे सैटेलाइट फार्म्स की तरह हैं। ये किसान बेहतर गुणवत्ता पूर्ण दूध का उत्पादन कर सकते हैं क्योंकि किसान व्यक्तिगत तौर पर गायों का ध्यान ज्यादा बेहतर तरीके से रख सकते हैं। हम देशी नस्ल की गाय से मिलने वाले दूध के लिए उन्हें पैसे भी ज्यादा देते हैं

अब विज्ञान की योजना है कि गाय के दूध से बनाए जाने वाले अन्य उत्पाद बटर मिल्क, योगहर्ट ड्रिंक्स, आइसक्रीम जैसे उत्पाद भी यहां बनाए जा सकें। हाल ही में विज्ञान की कंपनी सहज इन्क्लुसिव ऑपरच्युनिटी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड ने राजस्थान पशुपालन एवं पशुविज्ञान विश्वविद्यालय बिकानेर के साथ प्रौद्योगिकी विस्तार के कार्यक्रम के लिए एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। पॉलीमर इंजीनियर रहे विज्ञान के बड़े भाई आईआईटी दिल्ली पास आउट हैं। उन्होंने रिलांयस पॉलिमर के साथ अपनी बीस साल पुरानी नौकरी छोड़ कर दिसंबर 2014 में विज्ञान के फॉर्म से जुड़ने का फैसला किया।

विज्ञान कहते हैं, हम यहां प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसे स्थानीय किसान भी सीख सकते हैं औऱ अपने अपने फार्म्स में लागू कर सकते हैं। समझौता पत्र के तहत बीस से भी अधिक किसानों को हाइड्रोपोनिक्स यानि जलीय कृषि की यहां तीन दिनों तक ट्रेनिंग दी गई।

Milk_Revolution2कुछ ऐसी ही कहानी दिल्ली एनसीआर के वैभव अग्रवाल औऱ उनके दोस्तों की है। वैभव को गाय पर बात करना सबसे अच्छा लगता है। वो बड़े गर्व से बताते हैं कि वो दूर से ही देखकर किसी भी गाय की नस्ल, उसकी उम्र और  दूध देने का चक्र बता सकते हैं। अग्रवाल न तो चरवाहा हैं औऱ न ही गायों को लेकर किसी सर्तकता अभियान के संयोजक। मैनेजमेंट ग्रेजुएट अग्रवाल ने अपने साफ्टवेयर इंजीनियर भाई चिराग के साथ मिलकर एक डेयरी की स्थापना की है। अग्रवाल बंधु दूधवालों की नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें अधिकांश मैनेजमेंट पेशेवर और इंजीनियर हैं जो देश में नई दूध क्रांति के अगुवा बन रहे हैं।

दिल्ली से एक घंटे की दूरी पर उत्तर प्रदेश के कुछेसर स्थित ओ लेछे में अपने नौ एकड़ में फैले फार्म हाउस में दोनों भाई गायों की होलस्टेन फ्रीसियान नस्ल को सहलाते पुछकारते दिख जाते हैं।

वैभव बताते हैं वो दिल्ली और उसके आस पास के शहरों में तकरीबन 2000 परिवारों को जैविक दूध की सप्लाई करते हैं। दिल्ली एनसीआर जहां प्रति दिन 18 लाख लीटर दूध की खपत है, लगातार आधुनिक एकीकृत डेयरी फार्म्स का गढ़ बनता जा रहा है जहां फार्म्स में अपनी गायें हैं, पंखे और फव्वारे लगे हुए हैं आधुनिक खटाल है, दूग्ध उत्पाद के लिए प्रस्सकरण इकाइयां हैं।

रंभाती गायों के बीच बैठे 32 वर्षीय वैभव कहते हैं, बाजार में मिलावटी दूध उपलब्ध हैं। हम लोगो को शुद्ध, ताजे दूध उपलब्ध कराना चाहते हैं। इसके साथ ही मुझे दिल्ली के प्रदूषण से दूर गांव में वक्त बीताने का मौका मिल जाता है

Milk_Revolution4इस इलाके में इस तरह की कई अन्य डेयरियां हैं जो इंजीनियर और मैनेजमैंट प्रोफेशनल जैसे लोग चला रहे हैं। इनमें से आधिकांश अपनी शानदार नौकरियां छोड़कर दूध वाले बनने आए हैं। सुरिची कंसेल्टेंट्स के नाम से डेयरी कंसेल्टेंसी चलाने वाले कुलदीप शर्मा इस नए आकर्षण के बारे में बताते हुए कहते हैं, डेयरी फार्म स्थापित करने को लेकर मेरे पास आने वाले लोगों में से साठ प्रतिशत लोग इंजीनियर या प्रबंधन पेशेवर होते हैं। श्री शर्मा देश भर में डेयरी उद्यम स्थापित करने को लेकर कार्यक्रम कराते रहते हैं।

दिल्ली स्थित आईआईएम ग्रेजुएट चक्रधर गाडे ने 2013 में अपनी इन्वेंस्टमेंट बैंकिंग की नौकरी छोड़ कर पचास गाय के साथ सुल्तानपुर के पास सबराना में डेयरी फार्म की शुरूआत की। दो साल पहले उन्होंने भिवानी स्थित एक स्थानीय डेयरी फार्मस् के साथ संबंद्ध स्थापित कर शीत ग्रह श्रंखला ,दूध के गुणवत्ता की जांच करने वाली मशीन और ठंडा करने वाली मशीन स्थापित किया।

बत्तीस वर्षीय गाडे कहते हैं, मुझे इस सेक्टर में बड़ी संभावना दिखी। मैंनें गुड़गांव में घर-घर जाकर एक सर्वे किया औऱ पाया कि बड़ी संख्या में लोग मिलावटी दूध की शिकायत कर रहे हैं। वो लोग शुद्ध दूध के लिए ज्यादा पैसे देने को भी तैयार थे। उनकी ब्रांड कंट्री डिलाइट के पास 3500 ग्राहक हैं। गाडे कहते हैं कि इनमें से आधिकांश युवा पेशेवर हैं। उनका मानना है कि उनकी संभावनाओं अभी और भी अच्छी होंगी क्योंकि शुद्ध दूध की मांग अभी और बढ़ रही है।

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में तकरीबन 68 फीसदी दूध मिलावटी है और जांच के लिए लाए गए नमूनों का 70 फीसदी दूषित पाया गया। दूध में मिलावट के लिए पानी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया।


Milk_Revolution1हरियाणा के सोनिपत जिले के जांतिखुर्द गांव कम्प्यूटर इंजीनियर पंकज नवानी ने अपने दो इंजीनियर दोस्तों – दीपक और सुखविंदर के साथ बींसर फार्म स्थापित किया है। दीपक कहते हैं,
हम डेयरी फार्मिंग के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। हमें पोषण, चारे, हर मौसम में पशुओं के व्यवहार आदि के बारे में सीखना जरूरी था। हमने 50 ऐसी गायों से अपना काम शुरू किया जो उस वक्त दूध नहीं देती थीं ताकि उनके साथ समय गुजार कर हम थोड़ा बहुत उनके व्यवहार और उनके विकास को समझ सकें। दीपक ने एक मल्टीनेशनल कम्प्यूटर कंपनी की नौकरी छोड़ कर ये काम शुरू किया था।


दीपक बताते हैं,
हमने न्यूजीलैंड में अपने सह संस्थापकों से जाना की जानवरों के अच्छे स्वास्थ्य की कूंजी है हरा चारा। हमने भी अपने पशुओं को हरा चारा ज्यादा से ज्यादा खिलाने के लिए अपने फार्म में अस्सी एकड़ की जमीन पर मकई, राई और घास की खेती की।

बींसर फार्म तकरीबन साढ़े दस एकड़ में फैला है, यहां तीन सौ से ज्यादा गाय हैं जिनकी देखभाल के लिए बड़े बड़े पंखे और उनकी धुलाई के लिए बड़े बड़े झरने लगे हैं। फार्म में प्रति दिन पैंतीस सौ लीटर दूध उत्पादन होता है जो रोहिणी, पीतमपुरा, पटपड़गंज और इंदिरापुरम जैसे दिल्ली के इलाकों में बेचा जाता है। इन एकीकृत नए फार्मों से उत्पादित दूध की कीमत पैंसठ रुपये प्रति लीटर होती है जबकि ब्रांडेड कंपनियों की फूल क्रीम दूध के एक लीटर के पैकेट की कीमत 50 रुपये है।

शर्मा कहते हैं इन नए डेयरी फार्म उद्यमियों में से कई लोग विदेशों में रहे हैं औऱ वहां की डेयरी फार्मिंग को देखा है, अब उन चीजों को यहां लागू करना चाहते हैं। शर्मा कहते हैं, वो अपने उत्पाद की मार्केटिंग में भी दक्ष हैं औऱ साथ ही साथ अपने उद्यम में बेहतर प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में भी।

Milk_Revolution5उदाहरण के लिए कंट्री फ्रेश ने निर्धारित वक्त पर दूध की डिलिवरी और उसका पेमेंट हासिल करने के लिए एक एप का ही विकास कर लिया है। कंट्री फ्रेश का पचास फीसदी आर्डर की बुकिंग इसी एप के जरिए ही होत है। इस एप के जरिए दूध खरीदने वाले अधिकांश ग्राहकों की आय़ु 25 से 40 साल के बीच है। गाडे बताते हैं,एप के जरिए अपने सब्सक्रिप्सन को मैनेज करना बेहद आसान है। कब आर्डर देना है, कब कैंसिल करना है ये सब आपके अंगुलियों के इशारे पर संभव है

इन डेयरियों से दूध खरीदने वाले ग्राहक बताते हैं कि इससे पहले जो पैकेटबंद दूध का वो इस्तेमाल करते थे उनके बारे में हमे ये पता ही नहीं होता था कि वो दूध गाय के हैं, कि भैंस के या बकरियों के हैं या मिश्रित हैं। इन डेयरी फार्म्स से हाल ही में दूध खरीदना शुरू करने वाले आदित्य गुप्ता कहते हैं,मैं अपने बच्चों के लिए गाय का दूध लेना चाहते थे। ये पचने में आसान होता है और इसका पोषण मूल्य भी ज्यादा है। पैकेज दूध में मुझे ये सुविधा हासिल नहीं थी

ज़ाहिर है हर कोई शुद्ध ताजे और प्राकृतिक रूप से हासिल किए दूध के महत्व से वाकिफ है। ऐसे में इंजीनियरिंग औऱ मैनेजमैंट पेशेवरों को डेयरी फार्मिंग की ओर बढ़ते रूझान के पीछे की प्रेरणा तो आप भी समझ ही रहे हैं तो देर किस बात की आप भी हो जाइए गौ पालक।

हल्दी के फसल की खुदाई और सफाई के लिए दक्ष मशीन ने दिलायी किसानों को श्रमिकों के झंझट से आज़ादी
2 months ago

हल्दी के फसल की खुदाई और सफाई के लिए दक्ष मशीन ने दिलायी किसानों को श्रमिकों के झंझट से आज़ादी

harvesting-cleaning-turmeric1इरोड (तमिलनाडू) – विभिन्न नकदी फसलों की तुलना में हल्दी का बाज़ार भाव सालों भर बना रहता है क्योंकि इसका इस्तेमाल मुख्यत मूल्य संवर्धन उत्पाद के रूप में होता है। तमिलनाडु में इरोड में तकरीबन सभी किसान हल्दी के उपज में लगे हैं और यही वजह है कि इस इलाके को हल्दी उत्पादन के एक मुख्य केंद्र के रूप में जाना जाता है।

लेकिन धान की तरह ही हल्दी का उत्पादन भी गहन श्रम की मांग करता है। हल्दी की निराई, गुड़ाई, उर्वरकों के छिड़काव, हल्दी के गांठों की खुदाई और फिर उसकी सफाई आदि कार्यों में ज्यादा से ज्यादा श्रमिकों की जरूरत होती है।

गोबीचेट्टीपलायम, मेराडा के कृषि विशेषज्ञ डॉ एस, सरवनकुमार कहते हैं, अगर समय रहते हल्दी के गांठों की खुदाई नहीं होती है तो हल्दी में फंगस के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। बहुत से गांवों में मजदूर खोजने में भारी दिक्कत होती है। एक एकड़ के खेत के लिए तकरीबन तीन सौ मजदूर ( 110 पुरूष और 190 महिला श्रमिकों) की जरूरत होती है। इनको साथ लेकर काम करने में एक किसान मानसिक और आर्थिक तौर पर पूरी तरह से धाराशायी हो चुका होता है

हल्दी उत्पादक किसानों को तकरीबन इन्हीं हालात का सामना करना पड़ता है सालो भर। ऐसे में श्री पी रामाराजू जो कि एक सीमांत किसान हैं कि एक पहल से बड़ी राहत मिली है हल्दी उत्पादक किसानों को । श्री राजू ने तकरीबन एक साल तक मशक्कत करने के बाद हल्दी की खुदाई करने वाली एक मशीन का निर्माण करने में सफलता पाई।

Turmeric-Farming-2अपनी मशीन और उसकी जरूरत के बारे में बताते हुए राजू कहते हैं, अतीत में समय पर मजदूर नहीं मिलने की वजह से मुझे भारी नुकसान उठाना पड़ा। मैं इस समस्या का हल खोजने के लिए प्रतिबद्ध था तो मैंने सोचा क्यों न एक ऐसी मशीन बनाई जाए जो हल्दी के गांठों को जमीन से खोद कर बाहर निकाले ताकि बड़ी संख्या में मजदूरों की आवश्यकता ही न रह जाए

अपने इसी सोच को अमली जामा पहनाने के लिए राजू ने बिजली से चलने वाला पतवार यानि की पॉवर टीलर बनाया जिसको चलने के लिए 13 एचपी क्षमता की ऊर्जा की जरूरत होती है। मशीन में छोटी खुदाई के डीगर, भुजाएं और सामान रखने वाला एक बर्तन होता है। मशीन को चलाए जाने पर खुदाई वाली छोटी डीगर्स मिट्टी के अंदर से हल्दी की गांठे खोद कर बाहर निकालता है और शैकर की मदद से हल्दी के आसपास मिट्टी के आवरण को कम करता है यानि की हल्दी की गांठों पर मिट्टी की पकड़ को ढीली करता है।

यह एक पावर टिलर संचालित हल्दी हारवेस्टर है। यह पावर टिलर के पीछे रखा होता है और बेल्ट एवं घिरनी की मदद से चलता है। इसमें एक ब्लेड लगा होता है जिसे मिट्टी में जाकर खोदने के लिए तीन अलग बार प्वाइंट्स होते हैं जो स्टील की आठ पट्टियों से जुड़ी होती है जिसमें दोलन पॉवर टिलर की मदद से होता है। पावर टिलर के गियर बाक्स जो कि रोटावेटर को बिजली सप्लाई करता है कि मदद से हार्वेस्टर अटेचमेंट को गति मिलती है। गियर बाक्स के बाद हार्वेस्टर के उपर बीच में लगी तीन इंच डायमीटर वाले पट्टे को बेल्ट औऱ घिरनी की मदद से बिजली पहुंचती है। दो पावर टिलर की स्पीड सेटिंग की मदद से प्रति मिनट 70 से 100 बार दोलन होता है।

विभिन्न मृदा परिस्थितियों में इस खुदाई मशीन की क्षमता की जांच के बाद ये पाया गया कि एक एकड़ में लगाए गए हल्दी को निकालने में मशीन को सात घंटे का वक्त लगता है। हालांकि मशीन के कार्य करने के लिए कुछ पूर्वशर्तों का पालन जरूरी है मसलन खेत में लगी हल्दियों के दो कतारों के बीच कम से कम डेढ़ से दो फीट की दूरी आवश्यक है, हल-रेखा लंबी और चौड़ी हो। ड्रीप सिंचाई प्रणाली वाले खेतों के लिए ये मशीन सर्वाधिक उपयुक्त है।

Turmeric-Farming-3डॉ श्रवणकुमार कहते हैं, विभिन्न मृदा परिस्थितियों और कृषि पद्धति के मद्देनजर हमने इस मशीन में कुछ सुधार भी किए। किसानों से बात करके, उनके सुझाव के आधार पर यह किया गया। ऐसा करने से इस मशीन को बेहतर बनाने में मदद मिली।  रामराजू बताते हैं, ये मजदूरों से मुक्ति दिलाने का यंत्र है। एक एकड़ में हल्दी की गांठों को निकालने के लिए इस मशीन में मात्र एक पुरूष और 15-20 महिला श्रमिकों की आवश्यकता होती है जबकि बगैर मशीन के इसी काम के लिए कम से कम अस्सी से अधिक मजदूरों की आवश्यकता पड़ेगी जिसका खर्च कम से कम चौदह से सोलह हजार रुपये का आता है। इस मशीन का इस्तेमाल करके आप प्रति एकड़ सात से नौ हजार रुपया बचा सकते हैं

एक घंटे में मशीन में एक लीटर डीजल की खपत होती है जिसका खर्च एक साधारण किसान भी आसानी से उठा सकता है। मशीन में लगा एक पट्टा मिट्टी से बाहर निकाले गए हल्दी की गाठों में लगी मिट्टी को भी झाड़ने का काम करता है ताकि साफ सुथरी हल्दी किसान के हाथ में पहुंचे। मशीन का निर्माण करने वाले राजू ने विभिन्न दक्षिणी राज्यों मसलन तमिलनाडू, कर्नाटक औऱ आँध्र प्रदेश में मशीन का प्रदर्शन किया है। राजू के बनाए गए इस मशीन की कीमत तीस हजार रुपये है। राजू ने अब तक 172 मशीनें बेची हैं।

अन्य मशीनों की तरह ही इस मशीन को भी रख रखाव और सर्विसिंग की जरूरत होती है। ट्रेक्टरों की तरह ही इन छोटे छोटे मशीनों को भी सर्विसिंग की जरूरत होती है जिसकी पूर्ति राजू खुद करते हैं। राजू सुझाव भी देते हैं और आवश्यकतानुसार मशीन इस्तेमाल कर रहे किसानों के पास जा कर भी मशीन की सर्विसिंग करते हैं।

कर्नाटक एवं तमिलनाडू के किसान अक्सर राजू के खेत पर पहुंचकर मशीन की कार्यप्रणाली को समझते भी हैं। राजू के इस अन्वेषण को नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भी मान्यता प्रदान की है और राष्ट्रीय कृषि अन्वेषक सम्मेलन 2010 में इन्हें सर्वोत्तम कृषि अन्वेषक के सम्मान से नवाजा है।

अगर आप श्री पी रामराजू के इस अन्वेषण को देखना समझना और खरीद कर इस्तेमाल करना चाहते हैं तो आप उनसे इस पता पर संपर्क कर सकते हैं –

श्री पी रामराजू, पुदुपालायम, पोस्ट – गेट्टीसमुद्रम, तालुक – अंथियुर, जिला – इरोड, तमिलनाडू, पीन नं- 638501

मोबाइल नंबर – 986517190.

Mr.P. Ramaraju, Pudhupalayam, Gettisamudram post, Anthiyur Taluk, Erode district – 638 501, TamilNadu, mobile:9865171790.

 

‘बी द चेंज’  मधुमक्खी पालन की क्रांतिकारी पहल
2 months ago

‘बी द चेंज’ मधुमक्खी पालन की क्रांतिकारी पहल

Bee-the-change1कई बार एक छोटी सी पहल एक बड़े परिवर्तन या प्रभाव का सबब बनती है। अंग्रेजी भाषा के विद्वानों ने इस प्रभाव को व्यक्त करने के लिए शब्द गढ़ा है बटरफ्लाई इफेक्ट। लेकिन इन दिनों महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में बटरफ्लाई इफैक्ट बी (मधुमक्खी) इफैक्ट में तब्दील होता दिख रहा है।गुंजते छोटे छोटे काले पीले मधुमक्खियों का यह झुंढ तकरीबन 70 फ़ीसदी फसल का परागण करती है जिससे दुनिया की नब्बे फीसदी मानवता अपना पेट भर पाती है। लेकिन मधुमक्खियों द्वारा स्थापित की गई प्रकृति की ये लंबी और जटिल श्रंखला इन दिनों बदलाव दिखने लगा है। दुनिया भर में मधुमक्खियों की आबादी में अचानक आ रही कमी अप्रत्याशित परिणामों के साथ पारिस्थितिकीय तंत्र के असंतुलन की धमकी दे रहा है।

ऐसे में महाराष्ट्र में श्रीकांत गजभीये अपने प्रयासों से जरूर उम्मीद जगा रहे हैं। श्रीकांत गजभीये बी द चेंजके संस्थापक हैं जो महाराष्ट्र में किसानों और जंगलों में रहने वाली आबादी को मधुमक्खी पालन की मुफ्त प्रशिक्षण देते हैं।

वो कहते हैं कि जब मधुमक्खियों को कृषि गतिविधियों के साथ सम्मिलित किया जाता है तो उत्पाद के रूप में शहद तो प्राप्त होता ही है साथ ही साथ कृषि उत्पादन में भी 20 से 200 फ़ीसदी तक बढ़ोत्तरी होती है। ग्रेट ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन में ये बात सामने आई कि मधुमक्खियों अपनी दैनिक गतिविधियों के जरिए अर्थव्यवस्था में 20 करोड़ पौंड जोड़ती हैं और अपने परागण के जरिए एक अरब पौंड अर्थव्यवस्था को देती हैं। इसी तरह के अध्ययन कुछ अन्य देशों में भी उपलब्ध हैं लेकिन खाद्य श्रंखला में मधुमक्खियों का कार्य हर जगह तकरीबन एक जैसा ही है।

Bee-the-change2अमेरिका में कुछ प्रजातियों की मधुमक्खियां तकरीबन विलुप्त हो चुकी हैं, यूरोपीयन युनियन ने इनके विलुप्त होने के खतरे को स्वीकार भी किया है। भारत में भी मधुमक्खियों की संख्या में तेजी से गिरावट देखी जा रही है। कुछ लोगों का मानना है कि मोबाइल फोन और मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगे मधुमक्खियों की लगातार घट रही आबादी के लिए एक बड़ी वजह है। मधुमक्खियों की घट रही आबादी दुनिया भर में चिंता का सबब बन रही है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए बी इफैक्टकी चर्चा इस बात को रेखांकित करने के लिए कि कैसे एक छोटी सी वजह एक बड़े परिणाम का सबब बनती है, कहीं से भी अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं लगता है। इसलिए भी श्रीकांत की ये पहल सिर्फ शहद उत्पादन के बारे में नहीं हैं बल्कि एक व्यापक परिणाम की दिशा में बढ़ाया गया कदम प्रतीत होता है।

दो साल पहले भारतीय प्रबंधन संस्थान से प्रबंधन की पढाई करने के बाद उन्होंने पुणे के एक सरकारी संस्थान से मधु मक्खी पालन की पांच दिन का कोर्स किया और मधुमक्खी पालन को अपना दिल ही दे बैठे। गजभीये बताते हैं, मैंने मधुमक्खियों के बारे में कुछ बहुत आश्चर्यजनक तथ्य और क्रास पोलिनेशन के जरिये वो पारिस्थितीकीय तंत्र के लिए जो भूमिका निभाते हैं उसके बारे में जाना। इससे मैंने न केवल मधुमक्खियों की उस भूमिका के बारे में जाना जो निर्वहन वो प्रकृति के प्रति करते हैं, बल्कि समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों के जीवन में बदलाव लाने की उनकी क्षमता है उसके बारे में भी जाना

पिछले कुछ महीनों में बी द चेंज ने 500 से अधिक किसानों, जंगल में रहने वाले जनजातियों को प्रशिक्षण दिया है और फिलहाल उनके नेटवर्क में पचास अन्य लोगों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

Bee-the-change4श्रीकांत कहते हैं, हमारे अभियान के तहत हम ग्रामीण इलाकों में किसानों से मिलते हैं और मुफ्त प्रशिक्षण और मधु मक्खी पालन के लिए मुफ्त डिब्बे उपलब्ध कराते हैं। फिर जब वो मधुमक्खी पालन शुरू करते हैं हम उनके द्वारा उत्पादित शहद पूर्व निश्चित दर पर उनसे खरीद लेते हैं। हमारा प्रक्रम लाभ कमाने के लिए नहीं है और हम इसे अपने ब्रांड के तहत खुदरा बिक्रेता को बेच कर पैसे कमाते हैं। किसानों के लिए शहद उत्पादन की प्रक्रिया और मोम इस व्यवसाय से होने वाले कई लाभों में से एक है।

श्रीकांत समझाते हुए बताते हैं, मधुमक्खियां उच्च रिटर्न के लिए एक निवेश हैं – फसल उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है और कृषि उत्पाद मूल्यवान हो जाता है। मधुमक्खी पालन और कीटनाशक साथ साथ नहीं चल सकता है क्योंकि कीटनाशक मधुमक्खियों को भी मार डालती हैं। इसलिए कृषकों एवं मधुमक्खी पालकों को सलाह दी जाती है कि मधुमक्खी पालन के दौरान खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल न करें। ज़ाहिर है मधुपालकों की खेती कीटनाशकों से मुक्त होती है।

बी द चेंज में मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण ले रहे 25 प्रशिक्षार्थी जैविक खेती का प्रमाणीकरण प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि मधुमक्खी पालन को एक निवेश के तौर पर किसानों को तैयार करना किसी चुनौती से कम नहीं होता है।

श्रीकांत बताते हैं, मधुमक्खी पालन के डब्बे की कीमत तकरीबन 5 हजार रुपये होता है और कुछ महीने बाद ही शहद उत्पादन शुरू हो पाता है। आमतौर पर उन इलाकों में जहां हमने पहले काम नहीं किया है, दस में से एक ही किसान मधुमक्खी पालन के लिए तैयार होते हैं लेकिन जैसे ही एक किसान को सफलता मिलने लगता है अन्य किसान भी इसकी तरफ आकर्षित होने लगते हैं हालांकि संस्थान वनवासियों के लिए कुछ अलग तरीके से काम करते हैं।  

Bee-the-change3इस पर श्रीकांत कहते हैं, हम उन्हें प्राकृतिक शहद उत्पादन, ऐसे छत्ते से शहद निकालने के तरीके जो जंगलों में प्राकृतिक रूप से पहले से मौजुद हैं, की तकनीक में प्रशिक्षित करते हैं। इससे उन्हें अपनी आय बढ़ाने में मदद मिलती है और मधुमक्खियों को भी अपने प्राकृतिक आवास में सुरक्षा मिलती है गजभीए बताते हैं बहुत कम संगठन ही ऐसे हैं जो इस दिशा में काम कर रही हैं, आधिकांश सिर्फ किसानों के साथ ही काम करती हैं जबकि बी द चेंज वनवासियों के साथ भी काम करती है। श्रीकांत बताते हैं कि इसके साथ ही अन्य संगठन किसानों के मधु उत्पाद को मंहगे दामों में बेचती हैं जबकि वो लोग आम आदमी के पहुंच के लायक इसका मूल्य रखते  हैं।

महाराष्ट्र में मधुपालन के लिए योग्य प्रशिक्षण साधनों का अभाव, मधुमक्खी पालन के लिए डब्बों का अभाव, प्रशिक्षणार्थियों के लिए बुनियादी ढांचे को सुचारू रूप से रख पाने की समस्याएं, मधुमक्खियों के प्रति नकारात्मक सोच, भाषाई अवरोध और पूंजी की कमी कुछ ऐसी चुनौतियां हैं जिनका सामना बी द चेंज को करना पड़ता है। इन चुनौतियों से कैसे निपटती है बी द चेंज, बताते हैं श्रीकांत गजभीए, हम इन समस्याओं का मुकाबला करने के लिए सबसे पहले खुद को प्रशिक्षित करते हैं और मधुमक्खियों का बाढ़ा तैयार करते हैं खुद से ताकि अपनी सफलता के उदाहरणों से लोगों को प्रभावित कर सकें।

Bee-the-change5फिलहाल प्रकृति में मधुमक्खियों का बाढ़ा या छत्ता बहुत कम संख्या में मौजुद है। इसलिए मधुमक्खियों का बाढ़ा या छत्ता तैयार करने में खर्च तुलनात्मक रूप से कुछ ज्यादा होता है। श्रीकांत कहते हैं,हम कोशिश करते हैं कि मधुमक्खियों का बाढ़ा या छत्ता प्रकृति के बीच तैयार करें, उनका प्रजनन हो और उनकी संख्या में बढ़ोत्तरी करें ताकि उनकी कार्य कुशलता में बढ़ोत्तरी हो।

इसके अलावा आय के साधनों को बढ़ाने के लिए बी द चेंज की योजना है कि जैविक शहद और मोम आधारित उत्पाद तैयार करने के लिए महिलाओं के समुह को प्रशिक्षित किया जा सके। बी द चेंज ने जो बीड़ा उठाया है वो निस्संदेह बहुत बड़ा है। श्रीकांत गजभीए अपने महत्वाकांक्षा को कुछ इन शब्दों में व्यक्त करते हैं, एक मुक्का तो आसमां में तबियत से उछालो यारो, नहीं तो आपके यहां होने का क्या मतलब है जाहिर है ऐसे उद्यमम में जहां संसाधन आराम से नहीं मिलते वहां लक्ष्य का प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा किसी क्रांति से कम नहीं है।

ऐसे में अगर आप अगर इस क्रांति से जुड़ना चाहते हैं, तो आप भी बी द चेंज से संपर्क कर सकते हैं चाहे तो उनके वेबसाइटwww.beethechange.in पर जाकर या उनसे इस पते पर पत्राचार करके।

पता – Bee The Change, 407-414, Exim Link Bldg,

Opp Container yard,Mulund-Goregaon Link Road,

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किसानों के लिए बड़ी सौगात: इफको ने डीएपी (DAP), एनपीके (NPK) खाद के दाम घटाए
6 months ago

किसानों के लिए बड़ी सौगात: इफको ने डीएपी (DAP), एनपीके (NPK) खाद के दाम घटाए

1600/- रु प्रति टन कम की कीमत, हर बोरे पर 85 रु  दाम घटे , घटी कीमत तत्काल प्रभाव से लागू

किसानों को एक बड़ी सौगात देते हुए फर्टीलाइज़र की सबसे बड़ी सहकारी कंपनी इफको ने डीएपी और एनपीके उर्वरकों के दाम करने का फैसला किया है। इफको ने प्रति टन 1600 रुपये दाम करने का फैसला किया है। इफको के इस फैसले से किसानों को इन उर्वरकों के हर बोरे पर आज से ही 85 रुपये का फायदा होगा।  कीमत कम करने का फैसला तत्काल प्रभाव से लागू किया गया। अपने स्थापना के पचासवें साल में प्रवेश कर रही इफको की ओर से देश के किसानों को ये तोहफा है। इस साल 3 नवंबर 2016 को इफको अपनी स्थापना के पचासवें साल में प्रवेश कर रही है। 3 नवंबर 2017 को इफको अपनी स्थापना के पचास वर्ष पूरे कर लेगी।DAP 2

इफको के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ यू एस अवस्थी ने नई दिल्ली में आयोजित इफको की 45 वीं वार्षिक आम बैठक में उर्वरकों की कीमत कम करने संबंधी  घोषणा की। डॉ अवस्थी ने इस मौके पर कहा कि ये एक प्रकार से देश के किसानों के लिए इफको की तरफ एक तोहफा  है। किसानों के लाभ के लिए उर्वरकों के मूल्य में ये अब तक सबसे बड़ी कटौती में से एक है। भारत सरकार की महत्वपूर्ण डिजिटल इंडिया अभियान को समर्थन करते हुए इफको ने लगातार दूसरे साल 76 करोड़ रुपये के लाभांश का हस्तांतरण अपने 36 हजार सहकारी समितियों को ऑन लाइन बैंकिंग के जरिए किया।

घर ही नहीं बैंक भी हैं बिना दरबाजे के … एक गांव ऐसा भी !

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बीते दिनों महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले का शनि शिंगनापुर गांव राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर हुए आंदोलन की वजह से चर्चा में रहा। दरअसल इस गांव की एक और खासियत है। अपने इष्ट शनि देव की वजह से प्रसिद्ध इस गांव की एक और खासियत देश दुनिया का ध्यान अपनी ओर खिंचती है। करीब 5 हज़ार की आबादी वाले इस गांव में लोग घरों में दरबाजे नहीं लगाते। घरों में दरबाजे का चौखट तो होता है लेकिन फाटक नहीं होता। घरों में ही नहीं बल्कि गांव में मौजुद बैंक भी बगैर दरबाजे के ही हैं। है न चौंकाने वाली बात। दरअसल गांव वालों को चोरी होने का भय नहीं सताता। लिहाज़ा घरों में दरबाजे ही नहीं लगाते।

क्या गांववासियों को चोर उचक्कों का डर नहीं सताता ? गांव में रहने वाली जयश्री गाडे बताती हैं “सालों पहले शनिदेव भक्तों के सपने में आए और कहा, तुम लोगों को अपने घरों में दरवाजे लगाने की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा। इसलिए हमलोगों के घरों में दरबाजा नहीं है”।

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साल 2011 में यूको बैंक ने शनिशिंगनापुर की शाखा की शुरूआत तो की लेकिन गांव वालों की इस विश्वास और भरोसे से लबरेज परंपरा का सम्मान करते हुए अपनी इस शाखा में उन्होंने तालों से परहेज ही किया। जानवरों को अंदर आने से रोकने के लिए बैंक में शीशे का फाटक तो है लेकिन दरबाजे नहीं है और न ही ताला। देश भर में अपनी तरह का ये अनुठा बैंक है। बैंक में तकरीबन चार हजार लोगों के खाते हैं।

गांव की पहचान शनिदेव की वजह से है। गांव के बीचों बीच तकरीबन पांच फीट लंबे काले रंग का एक चट्टान बगैर छत के एक प्लेटफार्म पर खड़ा है… यही प्रतिमा हजारों गांव वासियों की शक्ति का स्त्रोत हैं। आज शनिदेव का यह मंदिर अकूत धन संपत्ति वाले एक ट्रस्ट में तब्दील हो चुका है। लेकिन आज भी समुचे गांव की तरह इस मंदिर में भी कोई दरबाजा नहीं है।

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मंदिर के विदेशी मुद्रा खंड में काम करने वाले कैशियर अनिल डारनडाले अपनी इस आस्था के बारे में बताते हैं…” हमारा मानना है कि अगर कोई व्यक्ति कुछ चुराता है या किसी तरह की कोई बेइमानी करता है तो उस पर साढ़े सती का प्रकोप गिरता है। साढ़े सती मतलब दुर्भाग्य के साढ़े सात साल। उसके घर में कुछ न कुछ बुरा होता है। परिवार कोर्ट मुकदमें में फंसा जाता है, या दुर्घटना का शिकार हो जाता है। किसी की मौत हो जाती है या उसके व्यापार में उसे भारी घाटे का सामना करना पड़ता है। अनिल कहते हैं कि एक बार उनके चचेरे भाई ने लकड़ी का दरबाजा लगवाया था अगले ही दिन उसका कार एक्सिडेंट हुआ।

 

सदियों से इस गांव में चोरी डकैती छिनैती जैसा कोई वाकया नहीं हुआ है लेकिन बीते कुछ सालों गांव के लोग दबी जुबान में ही सही लेकिन दरबाजा, ताला औऱ घरों की सुरक्षा को लेकर शुरूआती स्तर पर ही सही बदलाव की बात करने लगे हैं। पिछले कुछ सालों में एक आध वारदात के बाद लोग घरों की सुरक्षा को लेकर दबी जुबान में ही सही बदलाव के संकेत तो देते हैं लेकिन अब भी शनिदेव के प्रति आस्था अटूट है और पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को एक झटके में छोड़ने को तैयार नहीं दिखते।

भौतिकवाद की अंधी दौड़ में लगी दुनिया के लिए शनि शिंगनापुर का ये प्रचलन ज़ाहिर है एक बहुत बड़ा संदेश है।

Make in India: IFFCO launches joint venture with Mitsubishi Corp for manufacturing agrochemicals

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NEW DELHI: Fertilizer cooperative IFFCO on Wednesday formally launched a joint venture with Japanese firm Mitsubishi Corp for manufacturing agrochemicals in India that will start operation in this rabi season starting October. Read more

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उर्वरकों का उत्पादन और विपणन करने वाली देश की प्रतिष्ठि‍त सहकारी संस्था इफको ने जापान की मित्सुबिशी कॉरपोरेशन के साथ मिलकर ‘इफको-एम सी क्रॉप साइंस प्राइवेट लिमिटेड’ नाम से एक संयुक्त कंपनी बनाने का करार किया है. संस्था अपने इस कदम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया कैंपेन के बढ़ते कदम के तौर पर देख रही है. Read more

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