Image

News

प्रति पौधा 19 किलो की उपज देने वाले टमाटर की नई प्रजाति आई सामने
7 months ago

प्रति पौधा 19 किलो की उपज देने वाले टमाटर की नई प्रजाति आई सामने

टमाटर का इकलौता पौधा कितनी उपज दे सकता है, आप अनुमान लगा सकते हैं क्या?  दिमाग के सारे घोड़ों को दौड़ाइये….और बताइए…कितना किलो तक पहुंचे…5 किलो से लेकर 10 किलो तक। ये भी आपको ज्यादा लग रहा होगा, है न!

हम यहां जिस टमाटर के पौधे का जिक्र करने जा रहे हैं, वो कोई मामूली टमाटर के पौधे नहीं है, इसे भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) ने विकसित किया है। संस्थान ने टमाटर की ये नई किस्म जो विकसित की है, उसके एक पौधे से 19 किलो टमाटर का उत्पादन हुआ है। रिकॉर्ड बनाने वाली टमाटर की इस नई उन्नतशील किस्म का नाम अर्का रक्षक है। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने परिशोधन खेती के तहत उन्नतशील किस्म के इस पौधे से इतना उपज हासिल किया।

इस विधि से टमाटर उत्पादन का ये उच्चतम उपज स्तर है। इस रिकार्ड तोड़ उपज ने टमाटर की खेती करने वाले किसानों के बीच हलचल मचा दी है। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान अर्कावथी नदी के किनारे स्थित है। यही वजह है कि उत्पादन के रिकॉर्ड बनाने वाली टमाटर की इस नई किस्म को अर्का रक्षक के नाम से नवाजा गया है।

इसके बारे में संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक और सब्ज फसल डिवीजन के प्रमुख एटी सदाशिव कहते हैं, “पूरे प्रदेश में टमाटर की ये सर्वाधिक उपज है और वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक टमाटर की ये प्रजाति राज्य में में टमाटर की सबसे ज्यादा उपज देने वाली साबित हुई है”।

इनके मुताबिक टमाटर के संकर प्रजाति की अन्य पौधों में सर्वाधिक उपज 15 किलो तक रिकार्ड की गई है। उन्होंने कहा कि जहां कर्नाटक में टमाटर का प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 35 टन है, वहीं अर्का रक्षक प्रजाति की टमाटर का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 190 टन तक हुआ है।

tomato-52ef2dcc445f1_exlst

नई किस्म के टमाटर के पौधे को लेकर किसानों के बीच काफी उत्सुकता है। कई किसान इसकी खेती को लेकर काफी आशान्वित नज़र आ रहे हैं और कुछ किसान इसकी खेती कर रिकार्ड उपज भी पा चुके हैं। चिक्कबल्लपुर जिले के देवस्थानदा हौसल्ली के एक किसान चंद्रापप्पा ने इस उन्नतशील प्रजाति के 2000 टमाटर के पौधे अपने आधे एकड़ के खेत में लगाकर 38 टन टमाटर की उपज हासिल की जबकि इतनी संख्या मे ही अन्य हाइब्रिड टमाटर के पौधे से20 टन का उत्पादन वो ले पाते थे।

चंद्राप्पा बताते हैं, “नवंबर 2012 से लेकर जनवरी 2013 के बीच मैंने 5 रुपये से ग्यारह रुये प्रति किलो तक इसे बेचकर, 80 हजार रुपये की लागत राशि काटकर पौने तीन लाख रुपये की बचत हासिल की।

डॉ सदाशिव के मुताबिक ये महज उच्च उपज देने वाली प्रजाति ही नहीं है बल्कि टमाटर के पौधों में लगने वाले तीन प्रकार के रोग, पत्तियों में लगने वाले कर्ल वायरस, विल्ट जिवाणु और फसल के शुरूआती दिनों में लगने वाले विल्ट जिवाणु से सफलतपूर्वक लड़ने की भी इनमें प्रतिरोधक क्षमता मौजुद हैं। उनके मानना है कि इससे कवक और कीटनाशकों पर होने वाले खर्च की बचत से टमाटर की खेती की लागत में दस फीसदी तक की कमी आती है।

इसके साथ ही गहरे लाल रंग के इस टमाटर की खेती के कुछ अन्य फायदे भी हैं। मसलन इसके गहरे रंग की वजह से इन टमाटरों को अधिक दूरी तक ट्रांसपोर्ट के जरिए भेजने में आसानी होती है। अन्य सामान्य प्रजातियों के टमाटरों की उपज के बाद छह दिनों तक रखा जा सकता है, संकर प्रजाति के टमाटर दस दिनों तक जबकि अर्क प्रजाति के टमाटर पंद्रह दिनों तक आसानी से किसी अन्य प्रयास के रखे जा सकते हैं।

Share This:

चीन के बाज़ार में धूम मचाने को तैयार  भारतीय शरीफा ‘अर्का सहन’
7 months ago

चीन के बाज़ार में धूम मचाने को तैयार भारतीय शरीफा ‘अर्का सहन’

भले ही चायनीज समान भारत में कहीं पर आसानी से बिक जाता हो, लेकिन भारत के उत्पाद को चीन में बेचना आसान नहीं है। फिर भी कुछ भारतीय उत्पाद भी चीन में अपना जलवा बिखेरने का माद्दा रखते हैं। इसी फेहरिस्त में प्रसिद्ध देसी फल शरीफा (सीताफल) का नाम मुख्य रूप से लिया जा रहा है। खासकर, नई प्रजाति का ‘अर्का सहन’ शरीफा चीन के बाज़ार में अपनी जगह और धूम मचाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पौष्टिक तत्वों की भरपूर मात्रा के साथ-साथ परंपरागत किस्म की तुलना में अधिक टिकाऊ होने के बाद भी नई प्रजाति का ये शरीफा निर्यात के मामले में अब तक लोकप्रियता हासिल नहीं सका है। लेकिन अब ये चीन के बाज़ार को गुलजार करने की तैयारी में है।

पिछले मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चीन दौरे पर भारत ने अर्का सहन के निर्यात को लेकर चले रहे गतिरोध को दूर करने का आग्रह चीन से किया है। चीन की ओर से अर्का सहन को लेकर की गई पूछताछ से भारतीय वैज्ञानिकों के उम्मीद को भी पंख लग गए हैं। खास तौर पर बेंगलुरु स्थित भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान IIHR के वैज्ञानिकों में जिन्होंने सत्रह सालों की कडी मशक्कत के बाद अर्का सहन की प्रजाति को विकसित करने में सफलता पाई, इसको लेकर जोश दोगुना हो गया। वैज्ञानिकों का दावा है कि नई किस्म का ये शरीफा पौष्टिक मूल्य, आकार और टिकाऊपन के मामले में अतुलनीय है।

अर्का सहन प्रजाति को विकसित करने वाली टीम के सदस्य रहे और भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के प्रमुख सेवानिवृत्त वैज्ञानिक एस एच जलिकॉप का कहना है, “हालांकि ये कस्टर्ड एप्पल (शरीफा) (दक्षिण भारत औऱ देश के अन्य भागों में सीताफल के रुप में जाना जाता है) के समान ही है तथापि ये आप में एक नया फल है। इसे संभ्रांत संकर किस्म के रूप में विकसित होने में 17 साल लग गए”।

एक नया फल : अर्का सहन

  • शरीफे के समान लेकिन वैज्ञानिकों का दावा कि ये एक नया फल है।
  • इसमें शरीफा के पोषक तत्वों की तुलना में 87 प्रतिशत अधिक प्रोटीन, 249 फीसदी अधिक फास्फोरस और 42 प्रतिशत अधिक कैल्सियम पाए जाते हैं।
  • पका हुआ अर्का सहन सामान्य शरीफे की तरह ही ठोस
  • इसमें बहुत कम बीज होते हैं जो फल के गुदा से नहीं चिपकते हैं।
  • अधिक टिकाऊ होने और धीरे-धीरे पकने की इसकी प्रकृति इसे लंबी दूरी के ट्रांसपोर्ट और निर्यात के अनुकूल बनाती है।
  • पारंपरिक शरीफा से 250 प्रतिशत बड़ा होता है।
  • यह गर्म शुष्क क्षेत्रों में खेती के लिए बेहद उपयुक्त
  • अर्का सहन के पेड़ वर्तमान में कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात में लगाए गए हैं।

cust-apple-2

 वो कहते हैं, “अर्का सहन पूरी तरह से सीताफल नहीं है। बल्कि दो प्रजातियों को मिलाने से तैयार एक नया फल है जो 75 फीसदी सीताफल और 25 फीसदी चेरीमोया से मिलकर बना है।

इस फल का बाहरी आवरण लंबे समय के लिए टिकाऊ होते हैं और धीमी गति से पकने वाली प्रवृति इसे लंबी दूरी तक ले जाने के लिए उपयुक्त बनाते हैं। इसी कारण इसे निर्यात करना भी आसान होता है।

इसके बारे में एस एच जलिकॉप बताते हैं कि अर्का सहन पूर्ण रूप से सीताफल नहीं है। यह एक नये किस्म का फल है, जो सीताफल के 75 प्रतिशत और चेरीमोया के 25 प्रतिशत के संकरण से बना है। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के वैज्ञानिकों ने इसे इसी रूप में विकसित किया था। जिस प्रकार से दुनिया के अन्य हिस्सों में दो या तीन फलों को आपस में क्रॉस (संकर) कराकर एक नई किस्म के कई फलों को विकसित किया जाता है। इस प्रक्रिया से फलों की नई किस्म बन जाती है और बाज़ार को एक नया फल मिल जाता है। इसे लेकर उन्होंने कई नई विकसित किस्मों के फलों जैसे प्लमकाट जो बेर और खुबानी के संकर से, ऐप्रिम खुबानी और बेर के संकर से, पीकाटम( बेर, आडू और खुबानी से) का उदाहरण दिया। कहा, जबकि इनकी खेती संयुक्त राज्य अमेरिका में वाणिज्यिक रूप से की जाती है।

हालांकि पारंपरिक शरीफा की किस्म (मूल रूप से दक्षिण अमेरिकी देश का फल) भारत के कई हिस्सों में काफी अच्छी तरह से जाना जाता है, लेकिन फल का कमजोर बाहरी आवरण और प्रचुर मात्रा में बीजों की उपस्थिति के कारण इसे व्यापक उपभोक्ता स्वीकृति नहीं मिल पाई। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2000 में इसे पहली बार घरेलू बाजार में नए अवतार में अर्का सहन को उतार कर व्यापक उपभोक्ता स्वीकृति दिला दी है।

इस फल का नाम अर्कावती नदी से जुड़ा है, जो भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR), बेंगलुरू के करीब बहती है। जलिकॉप ने कहा, “संस्थान में पैदा होने वाले फल, सब्जियों और फूलों की किस्मों का उपसर्ग ‘अर्का’ है। ‘सहन’ का मतलब धैर्य के लिए होता है क्योंकि नए फलों को परिपक्व और परिपक्व फल के लिए समय लगता है, जबकि पारंपरिक सीताफल की तुलना में शरीफा) जो तेजी से पकने और बहुत जल्दी खराब होने के लिए कुख्यात है। ”

इन नए गुणों के साथ, अर्का सहन लंबी दूरी की परिवहन या निर्यात के लिए सबसे उपयुक्त हो गया है। यह हाल के दिनों में न केवल व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण फल बन गया है, बल्कि संस्थान से गढ़ा हुआ रोपण सामग्री की मांग भी बढ़ रही है।

इसके उपलब्धि के बारे में भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के प्रमुख वैज्ञानिक और अर्का सहन के प्रजनन पर वैज्ञानिक जलिकॉप के सहयोगी पी संपत कुमार ने कहा कि  जब से अर्का सहन यानि वर्ष 2000 में बाजार में लॉन्च किया गया, तब से लगभग 2 लाख ग्राफ्ट किसानों को 15 अक्टूबर तक बेचे गए हैं। जो संभवत विभिन्न राज्यों में 500 हेक्टेयर भूमि को कवर किया हो।

Share This:

किसानों के लिए बड़ी सौगात: इफको ने डीएपी (DAP), एनपीके (NPK) खाद के दाम घटाए
1 year ago

किसानों के लिए बड़ी सौगात: इफको ने डीएपी (DAP), एनपीके (NPK) खाद के दाम घटाए

1600/- रु प्रति टन कम की कीमत, हर बोरे पर 85 रु  दाम घटे , घटी कीमत तत्काल प्रभाव से लागू

किसानों को एक बड़ी सौगात देते हुए फर्टीलाइज़र की सबसे बड़ी सहकारी कंपनी इफको ने डीएपी और एनपीके उर्वरकों के दाम करने का फैसला किया है। इफको ने प्रति टन 1600 रुपये दाम करने का फैसला किया है। इफको के इस फैसले से किसानों को इन उर्वरकों के हर बोरे पर आज से ही 85 रुपये का फायदा होगा।  कीमत कम करने का फैसला तत्काल प्रभाव से लागू किया गया। अपने स्थापना के पचासवें साल में प्रवेश कर रही इफको की ओर से देश के किसानों को ये तोहफा है। इस साल 3 नवंबर 2016 को इफको अपनी स्थापना के पचासवें साल में प्रवेश कर रही है। 3 नवंबर 2017 को इफको अपनी स्थापना के पचास वर्ष पूरे कर लेगी।DAP 2

इफको के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ यू एस अवस्थी ने नई दिल्ली में आयोजित इफको की 45 वीं वार्षिक आम बैठक में उर्वरकों की कीमत कम करने संबंधी  घोषणा की। डॉ अवस्थी ने इस मौके पर कहा कि ये एक प्रकार से देश के किसानों के लिए इफको की तरफ एक तोहफा  है। किसानों के लाभ के लिए उर्वरकों के मूल्य में ये अब तक सबसे बड़ी कटौती में से एक है। भारत सरकार की महत्वपूर्ण डिजिटल इंडिया अभियान को समर्थन करते हुए इफको ने लगातार दूसरे साल 76 करोड़ रुपये के लाभांश का हस्तांतरण अपने 36 हजार सहकारी समितियों को ऑन लाइन बैंकिंग के जरिए किया।

Share This:

घर ही नहीं बैंक भी हैं बिना दरबाजे के … एक गांव ऐसा भी !

By  •  News

बीते दिनों महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले का शनि शिंगनापुर गांव राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर हुए आंदोलन की वजह से चर्चा में रहा। दरअसल इस गांव की एक और खासियत है। अपने इष्ट शनि देव की वजह से प्रसिद्ध इस गांव की एक और खासियत देश दुनिया का ध्यान अपनी ओर खिंचती है। करीब 5 हज़ार की आबादी वाले इस गांव में लोग घरों में दरबाजे नहीं लगाते। घरों में दरबाजे का चौखट तो होता है लेकिन फाटक नहीं होता। घरों में ही नहीं बल्कि गांव में मौजुद बैंक भी बगैर दरबाजे के ही हैं। है न चौंकाने वाली बात। दरअसल गांव वालों को चोरी होने का भय नहीं सताता। लिहाज़ा घरों में दरबाजे ही नहीं लगाते।

क्या गांववासियों को चोर उचक्कों का डर नहीं सताता ? गांव में रहने वाली जयश्री गाडे बताती हैं “सालों पहले शनिदेव भक्तों के सपने में आए और कहा, तुम लोगों को अपने घरों में दरवाजे लगाने की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा। इसलिए हमलोगों के घरों में दरबाजा नहीं है”।

Shani Shingnapur1

साल 2011 में यूको बैंक ने शनिशिंगनापुर की शाखा की शुरूआत तो की लेकिन गांव वालों की इस विश्वास और भरोसे से लबरेज परंपरा का सम्मान करते हुए अपनी इस शाखा में उन्होंने तालों से परहेज ही किया। जानवरों को अंदर आने से रोकने के लिए बैंक में शीशे का फाटक तो है लेकिन दरबाजे नहीं है और न ही ताला। देश भर में अपनी तरह का ये अनुठा बैंक है। बैंक में तकरीबन चार हजार लोगों के खाते हैं।

गांव की पहचान शनिदेव की वजह से है। गांव के बीचों बीच तकरीबन पांच फीट लंबे काले रंग का एक चट्टान बगैर छत के एक प्लेटफार्म पर खड़ा है… यही प्रतिमा हजारों गांव वासियों की शक्ति का स्त्रोत हैं। आज शनिदेव का यह मंदिर अकूत धन संपत्ति वाले एक ट्रस्ट में तब्दील हो चुका है। लेकिन आज भी समुचे गांव की तरह इस मंदिर में भी कोई दरबाजा नहीं है।

Shani1

मंदिर के विदेशी मुद्रा खंड में काम करने वाले कैशियर अनिल डारनडाले अपनी इस आस्था के बारे में बताते हैं…” हमारा मानना है कि अगर कोई व्यक्ति कुछ चुराता है या किसी तरह की कोई बेइमानी करता है तो उस पर साढ़े सती का प्रकोप गिरता है। साढ़े सती मतलब दुर्भाग्य के साढ़े सात साल। उसके घर में कुछ न कुछ बुरा होता है। परिवार कोर्ट मुकदमें में फंसा जाता है, या दुर्घटना का शिकार हो जाता है। किसी की मौत हो जाती है या उसके व्यापार में उसे भारी घाटे का सामना करना पड़ता है। अनिल कहते हैं कि एक बार उनके चचेरे भाई ने लकड़ी का दरबाजा लगवाया था अगले ही दिन उसका कार एक्सिडेंट हुआ।

 

सदियों से इस गांव में चोरी डकैती छिनैती जैसा कोई वाकया नहीं हुआ है लेकिन बीते कुछ सालों गांव के लोग दबी जुबान में ही सही लेकिन दरबाजा, ताला औऱ घरों की सुरक्षा को लेकर शुरूआती स्तर पर ही सही बदलाव की बात करने लगे हैं। पिछले कुछ सालों में एक आध वारदात के बाद लोग घरों की सुरक्षा को लेकर दबी जुबान में ही सही बदलाव के संकेत तो देते हैं लेकिन अब भी शनिदेव के प्रति आस्था अटूट है और पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को एक झटके में छोड़ने को तैयार नहीं दिखते।

भौतिकवाद की अंधी दौड़ में लगी दुनिया के लिए शनि शिंगनापुर का ये प्रचलन ज़ाहिर है एक बहुत बड़ा संदेश है।

Share This:

Make in India: IFFCO launches joint venture with Mitsubishi Corp for manufacturing agrochemicals

By  •  News, Breaking
NEW DELHI: Fertilizer cooperative IFFCO on Wednesday formally launched a joint venture with Japanese firm Mitsubishi Corp for manufacturing agrochemicals in India that will start operation in this rabi season starting October. Read more

Share This:

IFFCO ने मित्शुबिशी के साथ साझा उपक्रम शुरू किया

By  •  News, Breaking

उर्वरकों का उत्पादन और विपणन करने वाली देश की प्रतिष्ठि‍त सहकारी संस्था इफको ने जापान की मित्सुबिशी कॉरपोरेशन के साथ मिलकर ‘इफको-एम सी क्रॉप साइंस प्राइवेट लिमिटेड’ नाम से एक संयुक्त कंपनी बनाने का करार किया है. संस्था अपने इस कदम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया कैंपेन के बढ़ते कदम के तौर पर देख रही है. Read more

Share This:

IFFCO and Mitsubishi Corp. form agchems JV in India

By  •  News

Indian Farmers Fertilizer Cooperative (IFFCO), the largest producer and marketer of fertilizers in India, has teamed up with Mitsubishi Corp. in a joint venture to produce agrochemicals in India. Read more

Share This:

IFFCO forms agrochem JV with Mitsubishi Corp

By  •  News, Breaking

Share This:

An e-platform to empower rural India
Would you like to stay updated about latest
agricultural information from Rural India?