BL27_AGRI_CARDAMOM_1280446e.pngइडुक्की (केरल) : मई महीने की एक सुबह सेबेस्टियन जोसेफ केरल के इडुक्की जिले के कट्टापना पहाड़ियों के बीच अपने डेड़ एकड़ के खेत में काम में लगे हुए हैं। छोटा सा खेत है, ताउम्र किसानी कर रहे जोसेफ अपने खेत में खुद ही सारा काम करते हैं। सेबेस्टियन सुबह सुबह लुंगी लपेटे, और बदन पर एक शर्ट डाले, कंधे पर दक्षिण भारत में लोकप्रिय वस्त्र सारोंग लपेटे हुए हैं। मौसम का असर उनके चेहरे पर नुमांया है, जिस व्यक्ति ने भारत में इलायची की खेती की तस्वीर बदल दी हो वो दिखने में भारत में लाखो सीमांत किसान की तरह ही हैं, आज भी जिसकी आजीविका खेती से बड़ी मुश्किल से पूरी हो पाती है।

नब्बे के दशक में जोसेफ ने इलायची की एक नई किस्म नजल्लानी (Njallani) विकसित की जो आज की तारीख में देश में मसाला उत्पादन का तकरीबन सत्तर फीसदी हिस्सा है।

पश्चिमी घाट के वर्षा आधारित इलाकों खासतौर पर केरल और कुछ हद तक कर्नाटक में बड़े पैमाने पर इलायची की खेती होती है। दुनिया में मसालों की आपूर्ति का अधिकतम हिस्सा इसी प्राकृतिक खेती से आता रहा जब तक कि अंग्रेजों ने अठ्ठारहवीं सदी में केरल और देश के अन्य हिस्सों में इसकी संगठित खेती की शुरूआत नहीं की, जहां वो पहले से ही कॉफी की संगठित खेती कर रहे थे। जब तक जोसेफ ने नजल्लानी किस्म विकसित नहीं किया था तब तक पारंपरिक तौर पर प्रति हेक्टेयर इलायची की उपज़ 200 से 250 किलो था। नजल्लानी किस्म के आने से ये उपज 1500 किलो तक बढ़ गया। केरल के माइलाडुंपारा स्थित भारतीय इलायची अनुसंधान संस्थान के निदेशक जे. थॉमस भारत में इलायची की खेती में जोसफ के योगदान को ‘महानतम’की संज्ञा देते हुए कहते हैं कि इन्हीं की वजह से भारत दुनिया के इलायची उत्पादकों में ग्वाटेमाला के बाद महत्वपूर्ण स्थान बना सका।

साल 2006 में दुनिया भर में मसाले का बाजार 40,000 टन का था जिसमें मध्य अमेरिकी देशों का हिससा तकरीबन 68 फ़ीसदी था जबकि भारत का तीस फ़ीसदी। थामस बताते हैं कि नजल्लानी प्रजाति इडुक्की जिले में उपजाए गए इलायची का 90 फ़ीसदी हिस्सा है।

Cardamom2जोसफ का जन्म केरल के कोट्टायम जिले के पाला में हुआ था। उनके माता पिता कृषि मजदूर थे। गरीबी में ही उनका जीवन बीता। चौथी कक्षा के बाद उनकी पढ़ाई भी छूट गई और वो दूसरों के खेतों में काम करने लगे। 1953 में विवाह के बाद वो कट्टापना चले आए। उन्होंने थोड़ी सी जमीन खरीदी और एक छोटा सा घर बनाया जिसमें वो आज भी रहते हैं। खेती में उन्होंने धान, केले और साबूदाना में हाथ आजमाए लेकिन इलायची उपजाने से पहले तक उन्हें ठीक ठाक सफलता नहीं मिली।

मसाले की खेती ने उन्हे धनवान नहीं बनाया लेकिन अपने चार बच्चों की ठीक ठाक परवरिश करने में मदद जरूर की। उनके तीन बेटे अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी अपनी गृहस्थी में जम गए, सबसे छोटा बाला रॉय आज भी अपने माता पिता के साथ ही रहता है।

जोसफ ने दुर्घटनावश नजल्लानी की खोज की। उन्होंने ये सोच कर अपने खेत में मधुमक्खियों को पालने के लिए एक स्थान विकसित किया था कि इससे अतिरिक्त आय हो सकेगी। इनके खेत में मधुमक्खियां इलायची की विभिन्न प्रजातियां को परागण करने में सहायक होती थीं, ऐसा होता देखकर ही जोसफ के मन में ये विचार जन्मा था। परागण से तैयार हुई प्रजातियों को उन्होंने एक जाल डालकर सामान्य प्रजातियों की इलायची से अलग कर दिया ताकि मधुमक्खियां उनका रस न चूस ले, और उन पौधों को चिन्हित कर दिया। फिर उन्होंने उन अलग किए हुए पौधों के उपज की गणना की। इनमें से जो उच्च उपज देने वाले पौधो थे उनको चून कर उन्होंने परागण कराया। एक दशक के बाद उन्होंने ऐसी प्रजाति तैयार कर पाने में सफलता पाई जो सामान्य प्रजाति के 30-40 इलायची की तुलना प्रति पौधे 120 से 150 इलायची की उपज देने में सफल रही थी। उस प्रजाति का नामकरण उन्होंने अपने परिवार के नाम पर नजल्लानी कर दिया। राष्ट्रीय इलायची अनुसंधान संस्थान ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि पारंपरिक प्रजातियों की तुलना में ये प्रजाति अधिक उपज प्रदान करती है।

Cardamom7जोसेफ इलायची के पौधो को तेजी से उपज देने लायक बनाने वाला एक क्रांतिकारी तरीका भी सामने ले कर आए। सालों तक किसान इलाइची की बुआई कर पहली फसल लेने के लिए तीन साल तक इंतजार करते थे। उच्च उपज वाली प्रजाति जो उन्होंने विकसित की थी उसकी कटाई से इलाइची का पौधा उन्होंने लगाया और महज़ दो साल में ही उनकी फसल पहली उपज देने के लिए तैयार हो गई।

जोसफ के नई प्रजाति खोजने की खबर जंगल में आग की तरह फैली। जोसफ बताते हैं, “दूसरे किसानों ने जब उन्नत प्रजाति के बारे में सुना तो वो उनके खेत से आकर नई प्रजाति के पौधे चुरा कर भाग जाते। इससे निकलने का एक ही रास्ता था कि मैं उन्हें कम पैसे पर ही सही बेच दूं ताकि थोड़े बहुत पैसे मुझे मिल जाए”।

इलायची एक मंहगा मसाला है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय इलायची की कीमत तकरीबन 7-8 डॉलर या भारतीय रुपये में तकरीबन 287-328 रुपये प्रति किलोग्राम है जबकि घरेलु बाजार में इसकी कीमत साढ़े तीन सौ रुपये प्रति किलोग्राम है। जबकि ग्वाटेमाला के इलायची की कीमत 4 डॉलर है। नजल्लानी प्रजाति की खोज से किसानों के प्रति हेक्टेयर उत्पादन 250 किलोग्राम से बढ़कर 1500 किलोग्राम तक चला गया जिससे किसानों की आय 87,500 रुपये से बढ़कर 5.25 लाख रुपये हो गई।

मसाला बोर्ड के निदेशक और अर्थशास्त्री बी. श्रीकुमार कहते हैं कि नजल्लानी के आने से इलाके में इलायची उत्पाद किसानों की हालत में बेहतर सुधार हुआ। उच्च उत्पादन से उनके आय में बढ़ोत्तरी हुई जिससे उनकी जीवन स्तर में सुधार हुआ। इसके साथ ही प्रति एकड़ इलायची तोड़ने वाले मजदूरों की मांग में भी बढ़ोत्तरी हुई जिससे कि अन्य लोगों को भी रोजगार मिला।

Cardamom3इलायची तोड़ने वाले मजदूरों की मांग बढ़ने से उनकी मजदूरी भी बढ़ी जिससे इलाके की पूरी अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचा। लेकिन नजल्लानी के पीछे का जोसफ को अपनी इस खोज से बहुत ज्यादा लाभान्वित नहीं हो पाया। वो कहते हैं, “पैसे कैसे कमाएं जाएं इसकी जानकारी मुझे थी ही नहीं”। जोसेफ ने नजल्लानी प्रजाति को लोगों में बांट दिया जिससे कि इडुक्की में सबसे ज्यादा इलायची की ये प्रजाति उपजाए जाने लगा। इस प्रजाति की प्रसिद्दी कर्नाटक तक भी पहुंची जहां से किसान चल कर जोसफ के खेत तक आने लगे। जोसफ कर्नाटक के उन किसानों में से कुछ के खेतों में जाकर उन्हें इस प्रजाति को उपजाने के तरीका समझा आते। सम्मान के तौर पर वो किसान बदले में जोसप को ढाई हजार से दस हजार रुपये तक देते थे।

इस बात का कि नजल्लानी प्रजाति की इलायची उपजाने वाले किसान करोड़पति हो गए लेकिन जिस व्यक्ति ने इस प्रजाति की खोज की वो आज भी साधारण जीवन जी रहा है जोसफ के मन में मिली जुली प्रतिक्रिया है। लेकिन वो इस बात से जरूर संतुष्ट हैं कि उनके प्रयासों से देश के इलायची उत्पादकों की किस्मत बदल पाया। जोसेफ ने नजल्लानी प्रजाति का पेटेंट भी अपने नाम नहीं किया क्योंकि वो कहते हैं कि उन्हें पेटेंट के बारे में कुछ पता ही नहीं है। वो कहते हैं, ‘मैं 78 साल का हूं, महज चौथी कक्षा तक पढ़ाई की है। मुझे मेरे खोज की वास्तविक कीमत का पता ही नहीं है और इसी वजह से मैं आज भी सीमांत किसान ही हूं। विकसित किए गए इस नई प्रजाति का पेटेंट कराने को लेकर मेरा विरोध नहीं है, लेकिन मुझे पता ही नहीं है कि मैं इसका पेटेंट कैसे करूं। जोसफ कहते हैं, “मैंने पेटेंट के बारे में सुना तो है, लेकिन तो मैं इसका खर्च वहन कर सकता हूं और न ही इसके लिए जरूरी विशेषज्ञता मुझमें है”। वो कहते हैं कि वो एक और नई प्रजाति इसी तरीके से विकसित कर रहे हैं, लेकिन इसकी जानकारी मैं आपको नहीं दे सकता। इन सबका पेटेंट तभी हो सकता है जब कोई मेरी मदद करे।

वर्ष 2001 में वंडानमेडु के एक किसान ने अपने एक हेक्टेयर खेत में नजल्लानी प्रजाति की इलाइची से 2750 किलोग्राम उत्पादन लेकर स्पाइस बोर्ड अवार्ड जीता।

नई प्रजाति की चुनौती

Cardamom5इडुक्की के एक और किसान अब्राहम कोशी कहते हैं कि नजल्लानी प्रजाति की कुछ अपनी तरह की चुनौतियां भी हैं। वो बताते हैं, “फसल का उत्पादन उस इलाके में अच्छा है जहां बेहतर जमीन प्रबंधन और सिंचाई के सुनिश्चित व्यवस्था है”। वो कहते हैं कि सिर्फ एक प्रजाति पर टिक कर नहीं रहा जा सकता है, कुछ औऱ भी नए प्रजाति का विकास किया जाना चाहिए। इडुक्की में बदल रही खेती की तकनीक भी कम बड़ी परेशानी नहीं है। राष्ट्रीय इलायची अनुसंधा केंद्र के थॉमस कहते हैं कि रासायनिक खाद का बेइंतहा इस्तेमाल और अंधाधुंध पेड़ों की कटाई इलायची के किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं।

रासयनिक खाद औऱ कीटनाशकों के बेइंतहा इस्तेमाल से आ रही चुनौतियों से निपटने के लिए जोसफ कहते हैं, सिर्फ जैव उर्वरक और प्राकृतिक कीटनाशकों का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। वृद्ध हो चुके जोसफ नई इलाइची की एक और नई प्रजाति के विकास में लगे हैं, लेकिन उन्हें इस बात की चिंता है कि शायद बढ़ती उम्र की वजह से वो इस काम को पुरा न कर पाएं।

COMMENTS

Share This: