परिवर्तन योजना 

प्रमाणित जैविक उत्पादन के लिए फसलों को कम से कम 18 महीने तक जैविक प्रबंधन के अधीन रखना चाहिए। नये रोपण किए गएgerminate-black-pepper-seeds_mini पौधों से तृतीय वर्ष में काली मिर्च की प्रथम उपज प्राप्त होना प्रारंभ हो जाती है। इसे हम जैविक उत्पादन के रूप में बिक्री कर सकते हैं। पहले से ही स्थापित पुराने पौधों को जैविक उत्पादन में परिवर्तन करने के लिए 36 माह की अवधि का परिवर्तन काल आवश्यक है। अगर जैविक खेत या क्षेत्र जहां खेती की जा रही हैं उस क्षेत्र के इतिहास के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध है कि भूमि पर पहले कभी किसी रासायनों का प्रयोग नहीं किया गया है तो परिवर्तन काल के समय को कम कर सकते हैं। यह आवश्यक है कि पूरे फार्म में जैविक उत्पादन की विधि अपनायी जाए। लेकिन ज्यादा बड़े क्षेत्रों के लिए ऐसी योजना बनाए कि परिवर्तन योजना क्रमानुसार हो।  
अगर काली मिर्च की खेती एकल फसल के रूप में की गई है उस स्थिति में पूरी फसल को जैविक उत्पादन के लिए परिवर्तन कर सकते हैं। परन्तु अगर काली मिर्च की फसल मिश्रित फसल के रूप में उगाई गई है, तब यह अति आवश्यक है कि सभी फसलों को जैविक उत्पादन विधि के अधी रखना चाहिए। काली मिर्च की फसल कृषि – बागवानी तथा सिल्बी-बागवानी पद्धति का एक उत्तम घटक है। जब काली मिर्च को नारियल, सुपारी, कोफी तथा रबड़ इत्यादि फसलों के साथ अन्त:फसल के रूप में खेती कर रहे हैं तब फार्म की अनुपयोगी वस्तुओं को पुन: चक्रण करके उपयोग कर सकते हैं। हरी खाद्य फसलों के साथ इसकी अन्त:फसल खेती भी कर सकते हैं। जिससे इसमें शक्ति युक्त पोषक तत्वों का उत्पादन हो।
जैविक उत्पादन के खेत को आसपास के अजैविक खेतों से दूषित होने से बचाने के लिए उचित माध्यम अपनाना चाहिए। जैविक खेतों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए। बहावदार ढलान वाले स्थानों पर बराबर के खेतों से पानी और रसायनों के आगमन को रोकने के लिए पर्याप्त उपाय करना चाहिए। छोट-छोटे क्षेत्रों में काली मिर्च की खेती करने वाले निकटतम खेतों को एक बाह्य परिधि की आवश्यकता होती है। 
जैविक प्रबंधन विधि 
जैविक उत्पादन के लिए ऐसी परंपरागत प्रजातियों को अपनाते हैं जो स्थानीय मिट्टी और जलवायु की स्थिति में प्रतिरोधक या कीटों, vermi compost1सूत्रकृमियों तथा रोगों से बचाव करने में समर्थ होती हैं। क्योंकि जैविक खेती में कोई कृत्रिम रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों या कवकनाशकों का उपयोग नहीं करते हैं। अत: उर्वरकों की कमी को पूरा करने के लिए फार्म की सभी फसलों के अवशेष, हरी घास, हरी पत्तियां, गोबर, तथा मुर्गी लीद आदि को कंपोस्ट के रूप में उपयोग करके मृदा की उर्वरता उच्च स्तर की बनाते हैं।  पौधों की आयु के अनुसार एफ.वाई.एम. 5-10 कि. ग्राम प्रति पौधा के साथ साथ केंचुआ खाद या पत्तियों के कंपोस्ट (5-10 कि.ग्राम प्रति पौधा) को डालते हैं। मृदा परीक्षण के आधार पर फॉस्फोरस और पोटैशियम की न्यूनतम पूर्ति करने के लिए पर्याप्त मात्र में चूना, रॉक फॉस्फेट और राख का उपयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त ऑयल केक जैसे नीम केक (1 कि.ग्राम/पौधा), कंपोस्ट कोयर पिथ (2.5 कि. ग्राम/पौधा) या कंपोस्ट कॉफी का पल्प (पोटैशियम की अत्यधिक मात्रा), अजोस्पाइरियलम तथा फॉस्फेट सोलुबिलाइसिंग जीवाणु का उपयोग उर्वरता और उत्पादकता में वृद्धि करते हैं। पोषक तत्वों के अभाव में फसल की उत्पादकता प्रभावित होती है। मानकता सीमा या संगठनों के प्रमाण के आधार पर पोषक तत्वों के स्त्रोत खनिज/रसायनों को मृदा या पत्तियों पर उपयोग कर सकते हैं।
जैविक खेती की प्रमुख नीति के अनुसार कीटों, सूत्रकृमियों और रोगों का प्रबंधन जैव कीटनाशक, जैव नियंत्रण कारक, कर्षण और फाइटोसेनीटरी उपायों का उपायों का उपयोग करके करते हैं। नीम गोल्ड (0.6%) को 21 दिनों के अंतराल पर जुलाई-अक्तूबर के मध्य में छिड़काव करने से पोल्लू बीट को नियंत्रण किया जा सकता है। शल्क कीटों को नियंत्रण करने के लिए अत्यधिक बाधित शाखाओं को उखाड़ कर नष्ट कर देना तथा नीम गोल्ड (0.6 %) या मछली के तेल की गंधराल (3 %) का छिड़काव करना चाहिए।
जैव नियंत्रण कारकों जैसे ट्राइकोडरमा या प्सयूडोमोनस को मिट्टी में उचित वाहक मीडिया जैसे कोयरपिथ कंपोस्ट, सूखा हुआ गोबर या नीम केक के साथ उपचारित करने से कवक द्वारा उत्पन्न रोगों को नियंत्रण करके किया जा सकता है। अन्य रोगों को नियंत्रित करने के लिए 1 % बोर्डियो मिश्रण तथा प्रति वर्ष 8 कि.ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से कॉपर का छिड़काव करना चाहिए। जैव कारक जैसे, पोकोनिया क्लामाइडोस्पोरिया को नीम केक के साथ उपचारित करने से कवक द्वारा उत्पन्न रोगों को नियंत्रण किया जा सकता है।
प्रमाणीकरण
प्रमाणीकरण तथा लेबलिंग एक स्वतंत्र निकाय द्वारा करान चाहिए जो उत्पादक की गुणवत्ता की पूर्णत जिम्मेदारी ले। भारत सरकार ने छोटे और सीमित उत्पादन करने वाले किसानों के लिए स्वदेशी प्रमाणित प्रणाली बनाई है। जिसके अंतर्गत एपिडा द्वारा गठित प्रमाणित एजेंसिया वैध जैविक प्रमाण पत्र जारी करती है। इन प्रमाणित एजेंसियों द्वारा निरीक्षकों की नियुक्ति की जाती है। जो खेतों पर जाकर निरीक्षण करके विवरण को रजिस्टर में लिखने के साथ साथ कृषक खेत का मानचित्र, खेत का इतिहास, तुड़ाई, भंडारण, कीट नियंत्रण, गतिविधियों, उपकरणों की सफाई तथा लेबलिंग का पूरा ब्यौरा रखता है। इन अभिलेखों की आवश्यकता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए होती है। विशेषकर, जब परंपरागत तथा जैविक दोनों प्रकार से खेती करते हैं। भौगोलिक निकटता वाले एक ही वर्ग के लोग जो उत्पादन और प्रक्रिया को एक क्रम में करते हैं। उनके लिए वर्ग प्रमाण पत्र हासिल करने का भी प्रावधान है।
तुड़ाई एवं फसलोत्तर प्रबंधन
तुड़ाई
काली मिर्च पुष्पण के छह आठ माह उपरांत पक कर तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। मैदानी क्षेत्रों में तुड़ाई नवंबर – जनवरी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में जनवरी-मार्च में करते हैं। जब पूरी स्पाइक में एक या दो बेरी नारंगी रंग की हो जाए तब स्पाइक को पौधों से हाथों से तोड़ कर बैग में रखते हैं। बेरी को स्पाइक से अलग करके 7-10 दिनों के लिए सूर्य के प्रकाश में सुखाते हैं। सामान्यत स्पाइक की तुड़ाई बांस की एक सीढ़ी की सहायता से की जाती है।  अगर बेरी ज्यादा पक कर खुद ब खुद जमीन पर गिर जाती है जिससे अधिक हानि होती है। अगर बेरी अपने आप टूट कर जमीन पर गिरे तब उन्हें अच्छी तरह साफ करके रखना चाहिए। काली मिर्च का उपयोग अलग अलग कार्यों के लिए किया जाता है।
तालिका : विभिन्न प्रकार के उत्पादकों के लिए काली मिर्च की तुड़ाई का समय
उत्पादक                                                                          तुड़ाई का समय
कैंड पेपर                                                                                  4-5 माह 
निर्जलीकृत हरी काली मिर्च                                                  परिपक्व होने से 10-15 दिन पूर्व
ओलिओसरिन एवं एसनशियल ऑयल                                परिपक्व होने से 15-20 दिन पूर्व 
काली मिर्च                                                                           स्पाइक में 1-2 बेरी पीले से लाल रंग की हो जाए
पेप्पर चूर्ण (पाउडर)                                                             पूर्ण परिपक्व (स्टार्च सहित)
सफेद काली मिर्च                                                                 पूर्ण परिपक्व
फसलोत्तर प्रक्रिय 
काली मिर्च की बेरी को तोडने के पश्चात विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाएं जैसे थ्रेसिंग, उबालना, सुखाना, सफाई, ग्रेडिंग तथा पैकिंग होती है। काली मिर्च की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए इन प्रक्रियाओं को करते समय काफी सावधानी बरतनी चाहिए। किसी भी प्रक्रिया में अगर कोई कमी रह जाएगी तब काली मिर्च की गुणवत्ता पर काफी फर्क पडता है। इससे कृषक को हानि होती है।
थ्रेसिंग 
सामान्यत परंपरागत विधि द्वारा काली मिर्च की बोरियों को स्पाइक से मनुष्य अपने पैरों से कुचलकर अलग करते हैं। यह विधि अंशोधित, धीमी तथा अस्वस्थ्यकर हैं। इस प्रक्रिया द्वारा बेरी के साथ – साथ बाहरी पदार्थ, मिट्टी तथा गंदगी के भी आने की संभावना रहती है। जबकि वर्तमान में बेरी को स्पाइक से अलग करने के लिए 50 किलो ग्राम प्रति घंटा से 2500 किलोग्राम प्रति घंटा की क्षमता वाले थ्रेसर उपलब्ध हैं। लेबर की कमी के कारण मुख्यत इस प्रक्रिया के लिए यांत्रिक थ्रेसर को परंपरागत विधि की तुलना में प्रोत्साहित किया जाता है।
उबालना/पकाना
काली मिर्च की गुणवत्ता को अच्छी करने के लिए बर्तन में रखे हुए उबले पानी में बोरियों को एक मिनट तक डुबाकर निकाल लेते हैं। इस प्रक्रिया के अन्य और भी लाभ हैं ….
— सूखने के पश्चात बोरियों का रंग एक समान होता है
— गरम पानी में डुबाने से बोरियों में अगर सूक्ष्म जीवों की समस्या होती हैं तो इस प्रक्रिया के बाद उनकी मात्रा कम हो जाती है। black-pepper-benefits in-hindi
— बेरी सूखने में 3-4 दिन लेती है जबकि परंपरागत विधि द्वारा सूखने में 5-6 दिन का समय लेती हैं। 
— इस प्रक्रिया से बाहरी तत्व एवं गंदगी को बेरी से अलग कर सकते हैं।
सुखाना 
बेरी की तुड़ाई के समय उसमें 65-70 % तक जल की मात्रा उपलब्ध होती है। बेरी को सुखाने के बाद उसमें जल की मात्रा को दस प्रतिशत तक करना होता है। क्लोरोफिल की उपलब्धता के कारण परिपक्व बेरी का रंग हरा होता है। सुखाने के समय, फनोलेस एन्जाइम के उत्प्रेरक प्रभाव के कारण वातावरणीय आक्सीजन द्वारा एन्जाइम और फिनोलिक यौगिकों का ऑक्सीकरण के कारण हरी काली मिर्च का रंग काला हो जाता है।
परंपरागत प्रक्रिया में काली मिर्च की बेरी को सूर्य के प्रकाश में सुखाते हैं। टूटी हुई बेरी को फर्श पर बिखेर कर 3-5 दिनों तक सूर्य के प्रकाश में सुखाकर जल की मात्रा को दस प्रतिशत तक करते हैं।  अगर बेरी में जल की मात्रा 12 प्रतिशत से अधिक हो तो कवक संक्रमण की संभावना अधिक होती है। कवक संक्रमण के कारण बेरी विषैली हो जाती है जो मनुष्यों के लिए हानिकारक होती है। अच्छी गुणवत्ता वाली काली मिर्च प्राप्त करने के लिए बेरियों को सूखे, साफ-सुथरे फर्श / बांस की चटाई / प्लास्टिक शीट पर सूर्य के प्रकाश में 4-6 दिनों तक सुखाते हैं। प्रजातियों अथवा कल्टीवरों के आधार पर लगभग औसतन 33-37 % सूखी उपज प्राप्त होती है। काली मिर्च को सुखाने के लिए विभिन्न संस्थाओं द्वारा विकसित विभिन्न यांत्रिक ड्रायर भी उपलब्ध हैं जो बिजली और आग की सहायता से चलते हैं।
सफाई एवं ग्रेडिंग 
सूखी हुई काली मिर्च में स्पाइको के टुकड़े, कंकर – पत्थर एवं मिट्टी का कण आदि भी होते हैं। सफाई एवं ग्रेडिंग वह प्रक्रिया है जिसे अपनाकर हम उपज को अच्छा बना कर अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं। सामान्यत सफाई के लिए उपज को सूप की सहायता से फटककर तथा हाथों द्वारा मिलावट को हटाकर अलग करते हैं। सफाई एवं ग्रेडिंग के लिए यांत्रिक उपकरण भी उपलब्ध हैं। इस यंत्र में पंखा पीछे के भाग में सीधी दिशा में लगा होता है जिसकी हवा से इसके अंदर मौजूद गंदगी, अपरिपक्व बेरी तथा अनावश्यक सिरों के ढनढल उड़कर दूर ही जाते हैं।
काली मिर्च की ग्रेडिंग के लिए विभिन्न प्रकार की छन्नियों का उपयोग भी किया जाता है। काली मिर्च के आकार के अनुसार उनकी निम्न ग्रेडिंग कर सकते हैं – 
काली मिर्च की ग्रेडिंग

ग्रेडिंग                                                                                आकार 
तेली चेरी ग्रेवलड एक्स्ट्रा बोल्ड                                        4.2 मि.मी
तेली चेरी ग्रेवलड                                                                4.6 मि.मी
मलबार ग्रेवलेड                                                                 एम डी ग्रेड 1 तथा 2
मलबार अनग्रेवलेड                                                          ए यू जी ग्रेड 1 तथा 2

सफेद काली मिर्च (पेप्पर)
सफेद काली मिर्च तैयार करने के लिए आम तौर पर पूर्णत परिपक्व लाल बेरियों को सात आठ दिनों तक पानी में भिगोकर नरम किया जाता है। जिसके बाद इसकी बाहरी आवरण को आसानी से निकाल कर बेरी को धोकर सुखाकर उसमें जल की मात्रा को 12 प्रतिशत तक बनाए रखते हैं। सफेद काली मिर्च को परिपक्व हरी काली मिर्च तथा सामान्य काली मिर्च से भी किण्वन विधि द्वारा तैयार किया जा सकता है।
पैकिंग
जैविक खेती द्वारा उत्पादित काली मिर्च को लेबर करके अलग पैकिंग करना चाहिए। व्यवसायिक दृष्टि से विभिन्न प्रकार की काली मिर्च packingको मिलाकर पैकिंग करना लाभदायक नहीं है। पैकिंग के लिए वातावरण हितैषी सामग्री जैसे, साफ टाट के बैग या मजबूत कागज के लिफाफे का उपयोग करना चाहिए। प्लास्टिक बैगों का कम से कम मात्रा में उपयोग करना चाहिए। पुन: चक्रित योग्य / पुन: उपयोगी सामग्री का यथासंभव उपयोग करना चाहिए।
भंडारण 
काली मिर्च प्राकृतिक आर्द्रताग्राही होने के कारण यह हवा से आर्द्रता का शोधन करती हैं। मानसून के समय जब आर्द्रता अधिक होती है तब इसमें फफूंद तथा कीटों की समस्या हो सकती है। इसलिए भंडारण से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि इसकी बेरी में दस प्रतिशत से कम मात्रा में जल उपलब्ध है। ग्रेडिंग के अनुसार काली मिर्च को अलग – अलग भंडारण करना चाहिए। भंडारण के लिए बहु परत वाला कागज का लिफाफा अथवा मजबूत प्लास्टिक से बना हुआ बैग या जूट के बैगों का भी उपयोग कर सकते हैं। इन बैगों को फर्श पर मजबूत प्लास्टिक शीट बिछाकर बांस की चटाई पर रखते हैं।

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