काली मिर्च (सूचना निर्देशिका)

गोल मीर्च (पाइपर निग्राम एल) (परिवार – पिप्पली कुल (पाइपरसिया) एक बारहमासी बेल है जिसमें बेर से भी छोटा फल होता है जिसका आम तौर पर मसालों मे या औषधीय इस्तेमाल होता है। भारत दुनिया में काली या गोल मिर्च के बड़े उत्पादकों, उपयोगकर्ता और निर्यातकों में से एक है। साल 2013-14, में भारत ने दुनिया के विभिन्न देशों को 21,250 टन गोल मिर्च का निर्यात किया। भारत में केरल, कर्नाटक और तमिलनाडू में गोल मिर्च की बड़े पैमाने पर खेती होती है जबकि महाराष्ट्र, पूर्वोत्तर भारत और अंडमान-निकोबार द्वीप समुह में भी छिटपुट इसकी खेती होती है। वर्ष 2012-13 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में कुल 201381 हेक्टेयर क्षेत्र में काली मिर्च की खेती की गई जिससे 55000 टन का सालाना उत्पादन प्राप्त हुआ। भारत में काली मिर्च के उत्पादन में केरल और कर्नाटक सबसे आगे हैं।

खेती योग्य जलवायु और मिट्टी

काली मिर्च की खेती पर्याप्त वर्षा तथा आर्द्रता वाले आर्द्र उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों में की जाती है। पश्चिम घाट के उप पर्वतीय क्षेत्र, गरम और आर्द्र जलवायु इसकी खेती के लिए उत्तम है। इसकी खेती 20 डिग्री उत्तर और दक्षिण अक्षांश के दरमियान समुद्र तट से 1500 मीटर तक की उंचाई पर सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसकी फसल न्यूनतम 10 डिग्री सेल्सियस तथा उच्चतम 40 डिग्री सेल्सियस तापमान को सहन कर सकती है। जबकि इसकी खेती के लिए 23-32 डिग्री सेल्सियस के बीच (औसत तापमान 28 डिग्री सेल्सियस) तापमान अधिक उपयुक्त है।,

काली मिर्च के पौधों की वृद्धि के लिए 125-200 से.मी वार्षिक वर्षा आदर्श मानी जाती है। काली मिर्च की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। परन्तु लाल लैटेराइट मिट्टी इसकी खेती के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है। मृदा का पीएच मान 5.5 से 6.5 के बीच अनुकूल होता है।

भारत में काली मिर्च की खेती करने वाले पश्चिमी तटीय क्षेत्र जैसे, समुद्र तट के समीप भूमि, रोपण फसल के अनुपात में काली मिर्च को व्यापक स्तर पर उगाया जाता है, समुद्र तट से लगभग 800-1500 मीटर उंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र, काफी इलायची तथा चाय की फसल के साथ इसकी खेती अंत:फसल के रूप में करते हैं।

प्रजातियां एवं कल्टीवर्स

काली मिर्च के अधिकतर कल्टीवर्स उभयलिंगी (मादा एवं नर पुष्प एक ही डाली में) होते हैं जबकि नर तथा मादा पौधों के लिंग में पूर्णत: मित्रता पाई जाती है। भारत में काली मिर्च के 75 से अधिक कल्टिवरों की खेती की जा रही है। केरल में सभी कल्टिवरों में करिमुण्डा सबसे अधिक लोकप्रिय है। कोट्टनाडन ( दक्षिणी केरल), नारायकोडी (मध्य केरल), ऐंपीरियन (वयनाडु), नीलमुण्डी (इडुक्की), कुतिरवल्ली (कोझीकोड और इडुक्की), बालनकोट्टा, कुल्लुवैली (उत्तर केरल), मल्लीगीसरा तथा उदागरे (कर्नाटक) आदि प्रमुख कल्टीवर्स हैं। कुतिरवल्ली तथा बालनकोट्टा कल्टिवरों से एकांतर वर्ष में उपज प्राप्त होती है। गुणवत्ता की दृष्टि से कुट्टनाडन में ओलिओरसिन (17.8 फीसदी) की अधिक मात्रा तत्पश्चात ऐम्पीरियन (17.5 फीसदी) होती है।

प्रवर्धन

काली मिर्च के पौधों को तीन प्रकार से विकसित किया जा सकता है – 1) लंबे इंटर नोड युक्त तना जिसमें अपस्थानिक जड़ें होती हैं जो सहायक वृक्षों से चिपकी रह सकती हैं। 2) भूस्तरी प्ररोह जो बेल के निचले भाग से उद्भव होकर ज़मीन के सहारे फैली रहती हैं। इनमें जड़े युक्त लंबे इण्टर नोड होते हैं। 3) फल युक्त पार्श्व शाखाएं।

रोपण के लिए रोपन सामग्री मुख्यत: आरोही प्ररोह से तैयार की जाती है जबकि इसके उत्पादन में सीमांत प्ररोह का भी उपयोग करते हैं। बुश काली मिर्च को विकसित करने के लिए पार्श्व शाखाओं का उपयोग किया जाता है। काली मिर्च की वेरी में भी अंकुरण क्षमता होती है। परन्तु आम तौर पर इसका उपयोग रोपण के लिए नहीं करते क्योंकि यह आनुवांशिक रूप से एक समान नहीं होती।

रोपण सामाग्रियों का उत्पादन

परंपरागत विधि

उच्च उपज वाली स्वस्थ पौधे के प्ररोह के निचले भाग को मिट्टी में दबाकर लकड़ी के सहारे रखते हैं तथा जड़ निकलने तक लगा छोड़ देते हैं। फरवरी तथा मार्च के महीने में इसकी 2-3 नोड को काटकर अलग करके प्रत्येक को नर्सरी बेडों या पोंटिंग मिश्रण (मृदा, बालू तथा खाद को 1:1:1 के अनुपात) युक्त पोलीथीन बैगों में रोपण करते हैं। रोपित पौधों को पर्याप्त छाया में रखकर नियमित सिंचाई करना चाहिए। मई – जून माह में यह पौधे खेतों में रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं।

संशोधित प्रवर्धन विधि

श्रीलंका में काली मिर्च की रोपण सामग्रियों को उत्पादन करने के लिए एक उत्तम विधि विकसित किया गया है। इस विधि द्वारा जल्दी और आसानी से काली मिर्च की रोपण सामग्रियों का उत्पादन किया जा सकता है। भारत में कुछ संशोधन के साथ इस प्रवर्धन विधि को अपनाया गया है। इस विधि में 45 से.मी गहराई तथा 30 से.मी चौड़े एवं सुविधानुसार लंबे गड्डे बनाए जाते हैं। इन गड्ढों में मृदा, रेत तथा खाद को 1:1:1 के अनुपात से भर देते हैं। बांस को दो भागों में विभाजित करके इसके आधे हिस्से (जिसकी लंबाई लगभग 1.25-1.50 मीटर तथा 8-10 से.मी. व्यास) को 30 से.मी. के अंतराल पर 45 डिग्री कोण पर रखते हैं। बांस के उपरी हिस्से को किसी मजबूत वस्तु के सहारे रखकर उसके खोखले भाग में रूटिंग मीडियम (नारियल जट एवं खाद को 1:1 अनुपात) भर देते हैं। पौधों को बढ़ने के साथ- साथ बांस के बांकि हिस्से में भी रूटिंग मीडियम भरकर प्रत्येक विकसित नोड को रूटिंग मीडियम में नारियल की पत्ती की मध्य शिरा की सहायता से दबाते हैं।
जब बेल ऊपर की तरफ बढ़ने लगे तब पौधों की ऊपर वाली तीन नोडों को काट कर सौरीकृत पोटिंग मिश्रण युक्त पोलीथीन बैगों में रोपण करते हैं। रोपण के समय टाइकोंडरमा को 1 ग्राम तथा वी ए एम 100 सी सी / कि. ग्राम को प्रति बैग दर से डालते हैं। पौलीथीन बैगों को ठण्डे तथा आर्द्रता वाले स्थान पर खेतों में रोपण होने तक रखते हैं। इस विधि द्वारा पौधों का तीव्र गति से विकास (1:40), अच्छी तरह विकसित जड़ें, खेतों में पौधों की अच्छी तरह स्थापना तथा पौधे की तेजी से वृद्धि होती है।

ट्रेन्च विधि

खेत में उगाए गए काली मिर्च के पौधे के आरोही प्ररोहों की एक नोड से काली मिर्च की रोपण सामग्री तैयार करने के लिए एक सरल, सस्ती, और उत्तम विधि को इस संस्थान द्वारा विकसित किया गया है। ठंडे और छायादार स्थान में 2.0 मी. गुणा 1.0 मी. गुणा 0.5 मी. आकार का गढ्डा खोद लेते हैं। खेत में उगाये गये पौधों को पत्तों सहित 8-10 से.मी. लंबे एक नोड को रेत, मिट्टी, नारियल जटा और गोबर की खाद को समान अनुपात में पोलीथीन बैग (200 गेज का; 25 से.मी. गुणा 15 से.मी आकार) में रोपण करते हैं। नोड को इस तरह रोपण करते हैं कि इसकी पत्तियां मिश्रण के ऊपर रहना चाहिए। इन बैगों को गड्ढों में रखने के बाद गड्ढों को एक पोलीथीन शीट से ढक देते हैं। इन पौलीथीन शीटों के कोने पर वजन रखकर उसको दबाते हैं ताकि वह हवा में स्थिर रहें। पौधे युक्त बैगों में दिन में चार पांच बार सिंचाई करना चाहिए तथा गड्ढों को सिंचाईके तुरंत बाद पौलीथीन शीट से पुन: डक देना चाहिए। पौधा युक्त पोलीथीन बैगों में कॉपर ऑक्सिक्लोराइड (2 ग्राम प्रति लीटर) को 2-3 बार डालना चाहिए।

लगभग एक महीने के बाद पौधों में नये प्ररोह निकलने शुरू हो जाते हैं। रोपण के दो महीने बाद पौधों को गढ्डों से बाहर निकालकर छायदार जगह में रखकर दिन में दो बार सिंचाई करनी चाहिए। यह पौधे लगभग दो से ढाई महीने बाद खेतों में रोपण करने के लिए तैयार हो जाते हैं। इस विधि द्वारा उत्पादित रोपण सामग्रियों में 80-85 फ़ीसदी पौधे खेतों में सफलतापूर्वक स्थापित होते हैं।

सर्पेन्टाइन विधि

काली मिर्च की रोपण सामग्रियों के उत्पादन के लिए यह विधि सबसे सस्ती एवं प्रभावशाली विधि है। पौधशाला में पांच सौ ग्राम सौरीकृत पोंटिग मिश्रण को पॉलीथीन बैग में भर कर उसमें जड़ युक्त पौधों को मातृ पौधे की हैसियत से रोपण करते हैं। इन पौधों के बढ़ने के साथ- साथ उसमें कुछ नोड निकल आती है। इन नोडो को अन्य पोटिंग मिश्रण युक्त पॉलीथीन बैग (20 गुणा 10 से.मी. आकार) में नारियल पत्तों की मध्य शिरा की सहायता से दबा कर रखे तथा यह सुनिश्चित कर लें कि नोड अच्छी तरह पोटिंग मिश्रण में दबी है। इसी तरह प्रक्रिया को आगे जारी रखते हैं। तीन महीने बाद रोपित किए मातृ पौधे से प्रथम 10 से 12 नोड वाले पौधे रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं। इन नोडों को काटकर अलग करके उन्हें पॉलीथीन बैग में जैवनियंत्रक कारक तथा सौरीकृत पोटिंग मिश्रण अर्थात मृदा, ग्रेनाइट पाउडर और खाद को 2:1:1 के अनुपात में भरते हैं। इन पौधों में एक सप्ताह के अंदर नई पत्तियां निकलना शुरू हो जाती हैं। ये पौधे लगभग 2-3 माह बाद खेतों में रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं। इन पौधों में दिन में रोजाना सिंचाई करनी चाहिए। इस विधि द्वारा प्रत्येक वर्ष प्रत्येक मातृ पौधे से लगभग साठ पौधे प्राप्त किये जा सकते हैं।

मृदा रहित पोटिंग मिश्रण

नारियल जटा, केचुआ खाद (75:25 के अनुपात) तथा ट्राइकोडरमा आधारित टाल्क पावडर (10-7 सीएफयू प्रति किलो ग्राम 1) 10 ग्राम प्रति किलो ग्राम की दर से मिला कर मृदा रहित पोटिंग मिश्रण बनाते हैं। इस मिश्रण को प्लग ट्रे में भरकर पौधों को रोपण करते हैं। परंपरागत प्रवर्धन विधि की अपेक्षा प्लग-ट्रे द्वारा उत्पादित रोपण सामग्री उत्तम होती है।

प्लग ट्रे प्रवर्धन विधि एक तरह संशोधित सरपेन्टाइन विधि है। नारियल जटा तथा केंचुआ खाद (75:25 के अनुपात) की सहायता से सुविधानुसार लंबी, 1.5 मीटर चौड़ी तथा 10 से.मी. ऊंची बेड़ बनाते हैं। इनमें पौधों की वृद्धि होने देते हैं तथा प्रत्येक नोड को रूटेड मिडियम में दबाते हैं। लगभग 45-50 दिनों पश्चात 15-20 नोड को काट कर अलग -अलग मृदा रहित पोटिंग मिश्रण युक्त प्लग ट्रे (7.5 गुणा 7.5 गुणा 10 से.मी के आकार) के अलग-अलग खानों में रोपण करते हैं। इन प्लग ट्रे को आद्रता नियंत्रित ग्रीन हाउस (27+-2 डिग्री सेल्सियस) में रखते हैं। 45-50 दिनों के बाद जब पौधों में 4-5 पत्तियां निकल आये तब इन पौधों को मजबूती प्रदान करने के लिए प्राकृतिक हवादार ग्रीम हाउस में स्थानांतरण करते हैं। 120-150 दिनों के बाद स्वस्थ काली मिर्च के पौधे खेतों में रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं।

पौधशाला में काली मिर्च के पौधों को हानि पहुंचाने वाले रोग एवं प्रबंधन

फाइटोफथोरा रोग

पौधशाला में काली मिर्च पौधों के पत्तों, तना तथा जड़ों में फाइटोफथोरा का प्रकोप देखा जा सकता है। इसके संक्रमण से पत्तों पर काले रंग की चित्ती के निशान पड़ जाते हैं। यह निशान धीरे-धीरे बढ़कर पूरी पत्ती पर फैल जाता है। इस रोग के कारण पत्ती सड़ कर गिर जाती है। इसके संक्रमण से तने पर काले रंग का निशान पड़ जाता है। जिस कारण तने में अंगमारी हो जाती है। इस रोग का प्रभाव जड़ों पर भी पडता है जिस कारण जड़ें सड़ जाती हैं।

प्रबन्धन

इस रोग की रोकथाम के लिए बोर्डियो मिश्रण (1 फीसदी) का छिड़काव तथा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (0.2 फीसदी) से मासिक अंतराल पर पौधों के आधारीय भाग की मृदा को उपचारित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त मैटालोक्सिल – मैन्कोजिव (0.125 फीसदी) या 0.3 फीसदी पोटाशियम फॉस्फोनट का भी उपयोग करके इस रोग की रोकथाम कर सकते हैं। इस रोग के सामाधान के लिए सौरीकृत पोटिंग मिश्रण तथा जैव नियंत्रण कारकों जैसे वी ए एम 100 सीसी/कि.ग्राम की दर से तथा ट्राइकोडरमा 1 ग्राम/कि. ग्राम मृदा (ट्राइकोडरमा संख्या 10 सी एफ यू प्रति किलो ग्राम) की दर से पोटिंग मिश्रण में मिला कर पोलीथीन बैगों में भरना चाहिए। जैव नियंत्रण कारक मुख्यत: पौधों की जड़ों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। अत: पौधों के ऊपरी भाग से रसायनों का छिड़काव करके रोगों से बचाव करना चाहिए। अगर बोर्डियों मिश्रण से मृदा को उपचारित कर रहे हैं तब इसके अतिरिक्त मैटालैकसिल- मैनकोजिब (0.125%) तथा पोटैशियम फॉस्फोनेट (0.3%) (जो कि ट्राईकोडरमा के साथ अनुकूल है) का उपयोग करना चाहिए।

एन्थ्राकनोज़ रोग

यह रोग कोलोटोट्राइकम ग्लोयोस्पोरोयाड्स नामक कवक के द्वारा होता है। यह कवक पत्तों को हानि पहुंचाता है। इसके संक्रमण से पत्ते पर भूरे-पीले से काले – भूरे रंग की अनियमित चित्तियां पड़ जाती हैं।

प्रबंधन

इस रोग को बोर्डियो मिश्रण (1%) का छिड़काव करके रोका जा सकता है।

मूल म्लानी रोग

यह रोग मुख्यत जून-सितंबर के महीने में स्केलेरोटियम रोलफसी नामक कवक के द्वारा होता है। इसके संक्रमण से गहरे भूरे रंग की चित्तिया पत्तियों तथा तने पर पड़ जाती हैं। पत्तियों के अग्र भाग पर सफेद माइसीलियम भी देखा जा सकता है।

प्रबंधन

इस रोग के कारण तना खोखला हो जाता है। पत्तियां सूख कर गिरने लगती हैं। इस रोग की प्रारंभिक अवस्था में इसको फाइटो सैनिटरी द्वारा रोका जा सकता है। रोग युक्त पत्तियों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए। पौधों पर बोर्डियों मिश्रण (1%) या कारबेनडाजिम (0.2%) का छिड़काव करने से इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है।

विषाणु रोग

पौधशाला में काली मिर्च के पौधों पर वैन क्लियरिंग, मोसाइक, पीले दाग और पत्तों का आकार में छोटा होना विषाणु संक्रमण के मुख्य लक्षण हैं। विषाणु संक्रमित रोपण सामग्रियों का उपयोग करने से यह संक्रमण पौधों में आ जाता है। अत: रोग रहित रोपण सामग्री का उपयोग करना चाहिए। इनका संक्रमण कीटों जैसे एफिड तथा मिलीबग द्वारा भी होता है।

प्रबंधन

पौधशाला की नियमित देखभाल और निरीक्षण करना चाहिए। अगर संक्रमित पौधा दिखे तो उसे तुरन्त उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए। कीटों द्वारा विषाणु संक्रमण की रोकथाम के लिए कीटनाशक रासायनों जैसे, डाइमिथेट (0.05%) का छिड़काव करना चाहिए।

पौधशाला में काली मिर्च को हानि पहुंचाने वाले सूत्रकृमि

काली मिर्च के पौधों को पौधशाला में दो प्रमुख सूत्रकृमि जड़ गांठ सूत्रकृमि (मेलेडोगाइन स्पीसीस) तथा बरोयंग सूत्रकृमि रोडो (रेडोफोलस सिमीलस) हानि पहुंचाते हैं। यह सूत्रकृमि मुख्यत जड़ों को हानि पहुंचाते हैं, जिससे पौधों की वृद्धि रूक जाती है। पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं। सूत्रकृमि ग्रसित रोपण सामग्री को खेत में रोपण करने पर उसकी स्थापना की संभावना कम रहती है। पौधशाला में रोपण सामग्रियों के उत्पादन के समय सूत्र कृमि का प्रकोप अधिक होता है।

प्रबंधन

इसकी रोकथाम के लिए पोटिंग मिश्रण को सौरीकरण करके उसमें पोकोनिया क्लाइडोस्पोरिया या ट्राइकोडरमा हरजियानम 1-2 ग्राम/कि.ग्राम ((106cfu / ग्राम) की दर से डालना चाहिए। पोलीथीन बैग में पौधों के तीन ओर 2-3 से.मी गहरे गड्ढे करके उसमें फोरेट (10जी)* से 1 ग्राम/ पौधा अथवा कारवोफयूरान (3 जी)* से 3 ग्राम प्रति पौधे की दर से उपचारित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त 0.1 % कारवोसलफान (25 EC) को 50 मि. ली. प्रति पौधे की दर से उपचारित करके सूत्रकृमियों की रोकथाम की जा सकती है। यह अति आवश्यक है कि सूत्रकृमि नाशक से उपचारित करने के बाद मृदा में आवश्यक आद्रता बनाए रखने के लिए इसकी सिंचाई करना आवश्यक है। अगर पौधशाला में पौधों को लंबे समय तक रखते हैं, तब 45 दिनों के अंतराल पर उपरोक्त निमेटीसाइड (सूत्रकृमिनाशक) का उपयोग करना चाहिए। (* केरल में प्रतिबंधित)

रोपण

जगह का चयन
अगर काली मिर्च की खेती ढलान वाली भूमि में की जा रही है, तब ढलान दक्षिणी की तरफ न हो और कुछ हिस्सा उत्तर तथा कुछ हिस्सा उत्तर पूर्व होना चाहिए ताकि सूर्य की गरमी का प्रभाव सीधे बेलों पर न पड़ें और पौधों को सूखने से बचाया जा सकें।

सहायक वृक्षों का रोपण

मई-जून के महीने में मानसून की पहली वर्षा होते ही 50 से.मी. लंबे गुणा 50 से.मी. चौड़े गुणा 50 से.मी. ऊंचे गड्ढों में गाय का गोबर और मृदा को समान अनुपात में भरकर उसमें इरिथ्रीना स्पीसीस या गरोगा पित्राटा या गिरीवीलीया रोबस्टा (सिल्वर ओक) या एलियन्थस मलावारिका (माटी) को सहायक वृक्ष के रूप में रोपण करते हैं। सहायक वृक्षों के तने को मार्च या अप्रैल में काट कर छायादार जगह में रखते हैं। इन तनों में मई माह में अंकुरण शुरू हो जाता है। तब इन्हें रोपण कर सकते हैं। रोपण के समय इनकी आपस में बीच की दूरी तीन मीटर होनी चाहिए। एक हेक्टेयर में लगभग 1110 सहायक वृक्षों का रोपण कर सकते हैं। तीन वर्ष बाद जब सहायक वृक्ष की ऊंचाई पर्याप्त हो जाए तब काली मिर्च के पौधों का रोपण कर सकते हैं। रोपण के समय अगर ई. इंडिका और जी. पित्राटा को सहायक वृक्ष के रूप में उपयोग कर रहे हैं तब सूत्रकृमियों तथा तना एवं जड़ भेदक की रोकथाम के लिए फोरेट (10जी) * को 30 ग्राम की दर से वर्ष में दो बार (मई – जून तथा सितंबर – अक्टूबर में) उपयोग करना चाहिए। *(केरल में प्रतिबंधित)

काली मिर्च के पौधों का रोपण

मानसून शुरू होते ही सहायक वृक्ष के सहारे उत्तर दिशा में पचास से.मी. गहरे गड्ढे खोद लेते हैं। इन गड्ढों की आपस में दूरी तीस से.मी. होनी चाहिए। इन गड्ढों में मृदा तथा खाद को 5 कि. ग्राम प्रति गड्ढे की दर से भरना चाहिए। रोपण के समय नीम केक (1 कि.ग्राम) ट्राइकोडरमा हरजियानम (50 ग्राम) तथा 150 ग्राम रॉक फॉस्फेट प्रति गड्ढा की दर से डालना चाहिए। वर्षा होते ही 2-3 काली मिर्च के पौधों को गड्ढे में अलग-अलग स्थान पर रोपण करते हैं। अच्छी स्थापना के लिए कम से कम पौधों की एक नोड जमीन में मिट्टी के अंदर दबी रना आवश्यक है।

कर्षण क्रियाएं

पौधों की लंबाई में वृद्धि होने पर इनको सहायक वृक्ष से बांध कर रखना चाहिए। अत्यधिक गर्मी से पौधों को बचाने के लिए कृत्रिम छाया प्रदान करनी चाहिए। सहायक वृक्ष की अनावश्यक शाखाओं को काट देना चाहिए ताकि पौधे को पर्याप्त प्रकाश मिल सके। उत्तर पूर्व मानसून के बाद हरी पत्तियों या जैविक संसाधन से छपनी करनी चाहिए। पौधों की जड़ों को हानि से बचाने के लिए पौधे या उसके आस पास ज्यादा छेड़-छाड़ नहीं करना चाहिए।
रोपण के द्वितीय वर्ष में भी प्रथम वर्ष की भांति सारी क्रियाएं पुन: अपनानी चाहिए। परन्तु चौथी साल में बड़ी सावधानी पूर्वक सहायक वृक्ष की शाखाओं को काटना चाहिए क्योंकि पौधे की वृद्धि के लिए सहायक वृक्ष का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है। प्राय: जून और सितंबर माह में सहायक वृक्षों की शाखाओं को काटना चाहिए क्योंकि अधिक छाया में पौधों में पुष्पण और फल के समय कीटों का प्रकोप अधिक होता है।

रोपण के चौथे वर्ष के उपरान्त दो गड्ढे बनाना चाहिए। जिनमें एक गड्ढा मई – जून माह में तथा दूसरा दक्षिण – पश्चिम मानसून के बाद अक्तूबर-नवंबर में बनाना चाहिए। वर्षा काल में पश्चिम तटीय क्षेत्रों में मृदा का भूक्षरण रोकने के लिए आच्छादित फसलों जैसे कैलापोगोनियम मयोकयूनाइड्स तथा मिमोसा इनविसा की अत:फसल खेती करनी चाहिए। ग्रीष्म काल में जैविक छपनी करना लाभदायक है।

खाद और उर्वरक

काली मिर्च के पौधे की अच्छी वृद्धि के लिए खाद और उर्वरक को पर्याप्त मात्रा में डालना चाहिए। गोबर या कंपोस्ट के रूप में जैविक खाद को दस कि.ग्राम / पौधा तथा नीम केक को 1 कि.ग्राम प्रति पौधा की दर से मई माह में डालना चाहिए। अधिक अम्लीय मृदा में एक वर्ष के अंतराल पर 500 ग्राम प्रति पौधा की दर से चूना या डोलामाइट का उपयोग अप्रैल-मई महीने में कर सकते हैं। तीन वर्ष अथवा उसके उपरान्त उर्वरक की संस्तुत मात्रा निम्न प्रकार है।
एन.पी.के 50:50:50 ग्राम/पौधा/वर्ष (सामान्य)
एन.पी.के 50:50:200 ग्राम / पौधा / वर्ष (केरल के पन्नुर और कन्नूर जिलो के लिए)
एन.पी.के 140:55:27 ग्राम / पौधा / वर्ष (केरल के कोझिक्कोड जिले के लिए)

उपरोक्त मात्रा का एक तिहाई भाग प्रथम वर्ष तथा दो तिहाई भाग द्वितीय वर्ष में डालना चाहिए। तीन वर्ष तथा उसके उपरान्त उपरोक्त मात्रा का उपयोग दो बार, प्रथम मई – जून माह में तथा दूसरी बार अगस्त – सितंबर में करना चाहिए। मृदा में उर्वरकता की आवश्यकता विभिन्न जलवायु अवस्थाओं के आधार पर अलग – अलग होती है।

उर्वरकों को पौधे के तीस से.मी की दूरी पर डालकर उसको मिट्टी द्वारा ढक देते हैं। काली मिर्च के पौधो की जड़ों को उर्वरकों से दूर रखना चाहिए। जब जैव उर्वरको जैसे अस्पिरिल्लस (50 ग्राम / पौधा) का उपयोग करते हैं, तब नाइट्रोजन को संस्तुत मात्रा से आधी डालना चाहिए। मृदा में जिंक या मैग्नीशियम की कमी होने पर क्रमश: जिंक सल्फेट (0.25 %) को वर्ष में दो बार – जून तथा सितंबर – अक्टूबर माह में पत्तों पर छिड़काव तथा मैग्नीशियम सल्फेट को 200 ग्राम / पौधा की दर से मृदा उपचारित करना चाहिए। अधिक उपज के लिए काली मिर्च विशेष सूक्ष्म पोषक मिश्रण को 5 ग्राम / लीटर की दर से पुष्पण प्रारंभ होने पर तत्पश्चात महीने के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।

बुश काली मिर्च

बुश के रूप में उगनने वाली पार्श्व शाखाओं को बुश काली मिर्च कहते हैं। बुश काली मिर्च को गमलों या खेतों में उगाया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा फायदा य़ह है कि इसकी उपज वर्ष में हर समय राप्त की जा सकती है। रोपण के तीन वर्ष बाद उपज प्राप्त होना प्रारंभ हो जाती हैं। एक पौधे से लगभग एक कि. ग्राम काली मिर्च प्रति वर्ष प्राप्त होती है।

रोपण के चौथे वर्ष के उपरान्त दो गड्ढे बनाना चाहिए जिनमें एक गड्ढा मई-जून माह में तथा दूसरा दक्षिण – पश्चिम मानसून के बाद अक्तूबर – नवंबर में बनाना चाहिए। वर्षा काल में पश्चिम तटीय क्षेत्रों में मृदा का भूक्षरण रोकने के लिए आच्छादित फसलों जैसे, कैलापोगोनियम मयोकयूनाइड्स तथा मिमोसा इनविसा की अत: फसल खेती करनी चाहिए। ग्रीष्म काल में जैविक छपनी करना लाभदायक है।

ग्रीष्म काल सिंचाई

ग्रीष्म काल (मार्च के द्वितीय पखवाड़े से मई के तृतीय पखवाड़े के बीच) में 15 दिन के अंतराल पर काली मिर्च के पौधों की सिंचाई करने पर असिंचित पौधों की तुलना में 90-100 % तक अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। 15 वर्ष से अधिक आयु वाले पौधो के आधारीय भाग में 50 लीटर पानी / पौधा की सिंचाई संस्तुत की गई है। जबकि 11-15 वर्ष तक की आयु वाले पौधो के लिए 30 लीटर पानी प्रति पौधा सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाई वाले पौधो में जुलाई माह में स्पाइक 79 % तक निकल आती है। जबकि इसी समय वर्षा आधारित पौधो में केवल 60 % तक स्पाइक निकलती है और यह निकलने में सितंबर माह तक का समय लेती हैं। इसके साथ – साथ स्पाईक की लंबाई भी सिंचाई वाले पौधो में असिचिंत पौधे की तुलना में अधिक होती हैं।

COMMENTS

Share This: