बीन्स यानी फलियां लेगुमिनेसी परिवार से संबंध रखती है और अपने हरे फलियों के लिए देश भर में उपजाई जाने वाली सब्जी की एक बहुत महत्वपूर्ण फसल है। फलियों के पौधे में उपर चढ़ने की प्रवृत्ति भी पाई जाती है। भारत में इन फलियों का इस्तेमाल रोजमर्रा की सब्जियों में, मवेशियों के चारे के तौर पर और मिट्टी में सुधार के लिए भी किया जाता है। हरी फलियों की खेती उनके पूरी तरह पकने से पहले बीन्स के फली में रहते हुए की जाती है। यह दूसरी फली वाली सब्जियों के मुकाबले ज्यादा पोष्टिक होते हैं, यही वजह है कि स्थानीय बाजार में इनकी बहुत अच्छी मांग होती है। इस आलेख में भारत में होनेवाली फली (बीन्स) और फ्रेंच बीन्स के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है।

फली (बीन्स) के भारत में स्थानीय नाम-

कमल ककड़ी (हिंदी), कक्कारी (मलयालम), ककड़ी (मराठी), दोसाक्या (तेलुगु), वेल्लारीक्काई (तमिल)।

भारत में फलियों की व्यावसायिक किस्में- 

फलियों की मुख्यतौर पर दो किस्में हैं- 1.पहाड़ी, 2. मैदानीPahadi bean

पहाड़ी फली (बीन्स) की मशहूर किस्में- ऊटी 1, ऊटी (एफबी)2, वाईसीडी 1, अरका कोमल (सेल.9), प्रीमियर, अर्का सम्पूर्णा,अर्का बोल्ड और अर्का कार्तिक।

मैदानी फली (बीन्स) की मशहूर किस्में- अर्का सुविधा, अर्का कोमल, प्रीमियम, (सेल.9), अर्का समृद्धि, अर्का अनूप और अर्का सुमन

फली (बीन्स) की दूसरी किस्में- दीपाली, कंकन बुशन, दसारा, फुले गौरी।

जलवायु की स्थिति- 

आमतौर पर भारतीय फली (बीन्स) की खेती ठंडे जलवायु वाले मौसम में की जाती है और इसके लिए तापमान 17.7 से 27 डिग्री के बीच होना चाहिए। 30 डिग्री से अधिक तापमान होने पर फली की कलियों का फूल गिरने लग जाएंगी और अगर तापमान 35 डिग्री से ज्यादा है तो फली का बीज पैदा ही नहीं होगा। इसके अलावा, फलियां रात में पड़ने वाले पाले को लेकर भी बेहद संवेदनशील होती हैं।

फ्रेंच बीन्स 20 से 25 डिग्री के आदर्श तापमान पर फलता-फूलता है, लेकिन इसका उत्पादन 14 से 32 डिग्री तापमान के बीच भी हो सकता है। उच्च तापमान की वजह से फूल और फली कमजोर पैदा होंगे। हालांकि फ्रेंच बीन्स गर्म वातावरण वाले इलाके में तेजी से परिपक्व होते हैं।

उपयुक्त मिट्टी- 

फली (बीन्स) का उत्पादन व्यापक रेंज वाली मिट्टी में हो सकता है। भारतीय फली (बीन्स) का उत्पादन चिकनी बलुई मिट्टी, गाद भरी दोमट और चिकनी दोमट मिट्टी में की जाती है। मिट्टी में पानी का बहाव सुनिश्चित करना बेहद जरूरी होता है। फली (बीन्स) की खेती के लिए ठंडा मौसम के साथ मिट्टी में पीएच की मात्रा 5.5 से 6.0 के बीच होनी चाहिए। अच्छे उत्पादन के लिए मिट्टी में कार्बनिक तत्वों का होना बहुत अच्छा होता है। मिट्टी में फार्म की खाद या दूसरा कोई कम्पोस्ट मिलाने से मिट्टी और उपजाऊ हो जाती है।

मिट्टी की तैयारी- 

फली (बीन्स) के मुख्य खेत को चार से छह बार अच्छी तरह से जुताई कर तैयार करना चाहिए। अच्छी पैदावार के लिए खेत को तैयार करने के दौरान कार्बनिक पदार्थ मिलाना चाहिए।

सबसे अच्छा मौसम, बीज की दर और बीज का इलाज-

प्रति हेक्टेयर बीज का इस्तेमाल 8 से 10 किलोग्राम होता है। फली (बीन्स) की बुआई का सबसे अच्छा मौसम जुलाई से अगस्त के बीच होता है, नवंबर से दिसंबर के बीच फूल आना शुरू हो जाता है और जनवरी से फरवरी के बीच तक फसल कटाई के लिए तैयार हो जाता है।

बुवाई की पद्धति या तरीका- 

फली (बीन्स) के बीज की बुआई खुदाई कर ढाल या कतारों में करते हैं। ढाल और चौरस मैदान और खांचे का इस्तेमाल किया जाता है। बुआई के दौरान अंतराल एक एम गुना एक एम या 90 सेमी गुना 90 सेमी होनी चाहिए।

खाद और ऊर्वरक- 

बुआई के 20 दिन के बाद प्रति हेक्टेयर 25 टन फार्म की खाद का इस्तेमाल करें और प्रत्येक के एनपीके का आधार 90 किलोग्राम और45 किलोग्राम होना चाहिए।

सिंचाई और पानी आपूर्ति-

फली (बीन्स) की खेती के लिए टपक सिंचाई बहुत ही प्रभावकारी पद्धति होती है। पहली सिंचाई बीज की बुआई के ठीक बाद, दूसरी सिंचाई तीसरे या चौथे दिन और तीसरी सिंचाई सप्ताह में एक बार जरूरी होता है। सामान्यतौर पर भारतीय फली (बीन्स) बरसाती फसल के तौर पर ऊपजाई जाती है और अगर बरसात का मौसम है तो सिंचाई नहीं की जाएगी और साथ में यह सुनिश्चित किया जाएगा कि मिट्टी से पानी निकासी की अच्छी व्यवस्था है।

खर-पतवार नियंत्रण- 

फली (बीन्स) की खेती में घास-पतवार पर नियंत्रण करने के लिए तीन से नौ बार निराई की जरूरत पड़ती है। रोग और कीटों को रोकने के लिए समय-समय पर कीटनाशक और फफूंदनाशक का प्रयोग करें।

हानिकारक कीट और बीमारियां-

310फली (बीन्स) में होनेवाले प्रमुख कीट-

  1. लीफहोपर, 2. एफिड्स, 3. ग्लासहाउस व्हाइटफ्लाई

– पोड बोरर पर नियंत्रण के लिए कार्बारिल 50 डब्लूपी की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर में मिलाकर छिड़काव करें।

– लीफ होपर पर नियंत्रण के लिए मिथाइल डेमेटॉन 25 ईसी या डिमेथोएड 30 ईसी की दो एमएल मात्रा प्रति लीटर में मिलाकर छिड़काव करें।

फली (बीन्स) में होने वाले प्रमुख रोग- 

– पाउडर जैसा फफूंद-  पाउडर फफूंद पर नियंत्रण के लिए भिगोने लायक सल्फर दो ग्राम प्रति लीटर या सल्फर का चूरा 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें।

– मोजाइक- इस पर नियंत्रण के लिए प्रभावित पौधे को निकाल दें और कीड़े को फैलानेवाले पर नियंत्रण करने के लिए हाथ से कीटनाशक पदार्थ का छिड़काव करें।

– जंग- इस रोग पर नियंत्रण के लिए प्रति हेक्टेयर 25 किलोग्राम सल्फर के चूरे का छिड़काव करें।

– एन्थ्रेकनोज- इस बीमारी पर नियंत्रण पाने के लिए प्रभावित पौधे और फली को निकाल दें और प्रति लीटर पानी में दो ग्राम मेनकॉजेब मिलाकर इस्तेमाल करें।

कटाई और पैदावार- 

बुआई के करीब दो से तीन महीने के बाद भारतीय फली (बीन्स) कटाई के लिए तैयार हो जाती है। पूरी तरह से विकसित फली (बीन्स) की कटाई जरूरत के मुताबिक की जाती है। आमतौर पर प्रति हेक्टेयर 100 से 120 क्विंटल हरी फली की पैदावार की उम्मीद की जाती है।

बाजार- 

स्थानीय बाजार में इसकी अच्छी मांग होती है। खेत से बाजार तक ले जाने के लिए ट्रकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

सौ बात की एक बात-

हरी फली (बीन्स) की खेती एक लाभदायक धंधा है।

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