जापान के शिकोकु द्वीप पर रहने वाले मासानोबू फुकुओका (1913-2008) एक किसान और दार्शनिक थे। वनस्पतियों के रोग निदान की शिक्षा ग्रहण करने वाले फुकुओका ने कई साल योकोहोमा में कस्टम इंस्पेक्टर की नौकरी की। पच्चीस साल की आयु में उन्होंने नौकरी छोड़ जी और अपने पैतृक गांव वापस चले गए। अब वो खेती करना चाहते थे।

अपने जीवन के अगले पैंसठ सालों तक उन्होंने प्राकृतिक खेती को समृद्ध बनाने में लगा दिए। वो अपने खेत की जुताई नहीं करते, कोई रासायनिक उर्वरक या खाद का इस्तेमाल नहीं करते, और एशिया के तकरीबन सभी भागों में धान की खेती करने वाले किसानों की तरह वो अपने धान के खेत में पानी भी नहीं भरते और तब भी उनके खेतों का उत्पादन जापान के इसी तरह के अन्य खेतों के उत्पादन से ज्यादा या तकरीबन बराबर होता था।

1975 में उन्होंने द वन स्ट्रा रिवोल्युशन नामक पुस्तक लिखी। जिसमें उन्होंने अपनी जीवन यात्रा, दर्शन, और अपनी खेती की तकनीक का विस्तार से वर्णन किया। इस पुस्तक का दुनिया की 25 भाषाओं में अनुवाद अब तक किया जा चुका है। सन 2008 में 95 साल की आयु में उनका निधन होने से पहले तक वो खेती करते रहे। यही नहीं फुकुओका ने इसके अलावा भी तीन पुस्तकें और लिखीं – सोइंग सीड्स इन द डेसर्ट, द नेचुरल वे ऑफ फार्मिंग और द रोड बैक टू द नेचर।

अपने इस आलेख में हम आपको फुकुओका की धान पैदा करने के एक तकनीक बताएंगें जिसका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक में किया है और ता उम्र वो इसी तकनीक से धान पैदा करते रहे। आमतौर पर धान के खेत में तकरीबन पूरी दुनिया में पानी छोड़ा जाता है लेकिन वो सूखे खेत में धान की खेती का बंपर उत्पादन हासिल करते थे। ज़ाहिर फुकुओका के इस अनुभव से भारतीय किसान भी बहुत कुछ सीख सकते हैं।

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अगस्त महीने के शुरू होते-होते मेरे पड़ोसी किसान के खेत में चावल (धान) के पौधे कमर तक ऊंचे हो जाते थे। पर मेरे खेत में उनकी इस ऊंचाई इससे आधी ही होती थी। जो मुलाकाती जुलाई के महीने में यहां आते हैं वे शंका की दृष्टि से पूछते हैं, ‘फुकूओका साब, क्या यह चावल ठीक से पनप पाएगा?’ ‘जरूर,’ मैं जवाब देता हूं, ‘चिंता की कोई बात नहीं है।’ मैं लंबे-तगड़े, तेजी से बढ़ने और बड़ी-बड़ी पत्तियों वाले पौधे उगाने की कोशिश नहीं करता। उसके बदले में यथासंभव पौधों को ठोस बनाए रखना चाहता हूं। पौधे के शिखर को छोटा रखो, पौधों को खुराक बहुत मत दो, और पौधों के स्वाभाविक रूप से असली धान के पौधे जैसा ही बढ़ने दो।

आमतौर से तीन-चार फीट के पौधे में ढेर सी पत्तियां होने से यह प्रभाव पैदा होता है कि उसमें दाने भी खूब बैठेंगे, जब कि असलियत यह होती है कि केवल पत्तीदार डंठल ही हष्ट-पुष्ट हो रहे होते हैं। इससे चोकर खूब निकलता है और पौधे की शक्ति वानस्पतिक बढ़त में ही इतनी खर्च हो जाती है कि अनाज के दानों के लिए बाकी कुछ नहीं बचता। मसलन, यदि आकार में बड़े पौधे से 1,000 किलो पुआल पैदा होता है तो चावल की पैदावार 500-600 किलो ही होगी। चावल के छोटे पौधों से मेरे खेतों में उग रहे 1,000 किलो पुआल के साथ 1,000 किलो ही चावल निकलेगा। यदि फसल अच्छी रही तो मेरे पौधों से चावल की पैदावार 1,200 किलो तक होगी जो कि पुआल से वजन में 20 प्रतिशत ज्यादा होगी।

सूखे खेत में उगाए जाने वाले चावल के पौधे बहुत ज्यादा ऊंचाई नहीं पाते। इससे सूरज की रोशनी पूरे पौधे पर पड़ते हुए पौधों की जड़ तक तथा निचली पत्तियों तक पहुंचती है। एक वर्ग इंच पत्तियां छह दाने पैदा करने के लिए काफी होती हैं। पौधे के शिखर पर तीन-चार पत्तियां ही सौ-दाने करने के लिए काफी होती हैं। मैं बीज जरा सघन बोता हूं, जिससे प्रति वर्ग गज में 20-25 पौधे उगते हैं और जिनसे 250 से 300 दाने निकल आते हैं। यदि आप कम क्षेत्र में ज्यादा पौधे रखें तथा उन्हें खूब ऊंचा न उगने दें तो बगैर कोई कठिनाई के अच्छी फसल ले सकते हैं। यही बात गेहूं, जौ, राई, कुटकी, ओट, बाजरा तथा अन्य अनाजों पर भी लागू होती है।

बेशक, आम तरीका तो यही है कि फसल की बढ़त के समय पूरे मौसम धान के खेतों में कई इंच पानी भरा रखा जाए। किसानों को पानी में चावल उगाते इतनी सदियां बीत गई हैं कि अब लोग यह मानने को ही तैयार नहीं होते कि इसका कोई और भी तरीका हो सकता है। चावल के पौधे सबसे अच्छे तभी बढ़ते हैं, जब मिट्टी में पानी की मात्रा, उनकी जल-ग्रहण क्षमता की 60 से 80 प्रतिशत ही हो। खेत को पानी से भरे न रखने से पौधों की जड़ें मजबूत होती है। तभी बीमारियों और कीड़ों के विरूद्ध उनकी प्रतिरोध क्षमता भी ज्यादा होती है। पानी भरे खेतों में चावल उगाने का मुख्य कारण खरपतवारों को एक ऐसा वातावरण निर्मित कर नियंत्रित करना होता है, जिसमें कुछ सीमित किस्म के खरपतवार ही जिंदा रह सकते हैं। जो जिंदा रह जाते हैं उन्हें हाथ से या निंदाई-औजार से उखाड़ कर फेंकना पड़ता है। परम्परागत विधि के तहत यह कमरतोड़ तथा वक्त लेने वाली क्रिया एक ही मौसम में कई बार दोहरानी पड़ती है।

मानसून के दौरान, जून के महीने में मैं, लगभग एक सप्ताह के लिए खेतों में पानी रोकता हूं। सूखे खेत ही बहुत ही कम खरपतवारें बिना ऑक्सीजन के इतने कम समय भी जिंदा नहीं रह पाती, और मेथी भी पीली पड़कर मुरझा जाती है। हमारा इरादा मेथी को मारने का नहीं होता। हमारा उद्देश्य तो उसे थोड़ा कमजोर करने का होता है ताकि चावल के अंकुर ठीक से स्थापित हो जाएं। जैसे ही पानी निकाल दिया जाता है (यथा संभव जल्द-से-जल्द) मेथी में फिर से जान आ जाती है और वह चावल के पौधों के नीचे पूरे खेत की सतह को ढंक देती है। इसके बाद मैं जल प्रबंधन के नाम पर शायद ही और कुछ करता हूं। मौसम के शुरू में मैं सिंचाई बिल्कुल नहीं करता। उन सालों के दौरान भी, जब वर्षा कम होती है, पुआल और हरे-खाद के नीचे मिट्टी में नमी बनी रहती है। अगस्त के महीने में मैं थोड़ा-थोड़ा करके पानी छोड़ता हूं। लेकिन उसे कभी भी खेत में ठहरने नहीं देता।

यदि आज मेरे खेत में उगा धान का पौधा किसी किसान को दिखलाएंगे तो वह तत्काल जान जाएगा कि वह वैसी ही है जैसे कि धान के पौधे को होना चाहिए और उसका आकार-प्रकार भी बिल्कुल आदर्श है। वह यह भी समझ जाएगा कि बीज सीधे-सीधे स्वाभाविक ढंग से उगाए गए हैं, रोपे नहीं गए हैं। ये पौधे ढेर से पानी में नहीं उगे तथा इनमें रासायनिक उर्वरकों का भी उपयोग नहीं किया गया। ये सब बातें पौधे को उसकी जड़ों के आकार और मुख्य तनें में गांठों के अंतर को देख कोई भी किसान सहज ही बतला सकता है, यदि आप पौधे के आदर्श आकार-प्रकार को समझ लेते हैं तो सारी बात इतनी ही रह जाती है कि आपके अपने खेत की विशिष्ठ परिस्थितियों में इस आकार के पौधे को कैसे उगाया जाए।

मैं प्रोफेसर मोत्सुशिमा के इस विचार से सहमत नहीं हो सकता था कि पौधा सबसे अच्छा वही होगा जिसकी फुनगी से चौथे क्रम की पत्ती सबसे ज्यादा लंबी होगी। कई बार फुनगी से दूसरी या तीसरी पत्ती से सबसे लंबे होने पर भी सब से अच्छे नतीजे मिलते हैं। यदि पौधे के छोटे रहते ही उसकी बढ़त को रोक लिया जाए तो सबसे ऊपर या दूसरे क्रम की पत्ती अक्सर सब से बड़ी हो जाती है। ऐसा होने पर भी काफी ज्यादा पैदावार ली जा सकती है। प्रोफेसर मोत्सुशिमा का सिद्धांत उन प्रयोगों से उपजा है जिनके अंतर्गत पौधशालाओं में उर्वरकों की मदद से चावल के नाजुक पौधे उगाकर फिर उन्हें खेतों मं  रोपा जाता है, लेकिन मेरा चावल तो धान के पौधे के प्राकृतिक जीवन-चक्र का पालन करते हुए, जैसे वह जंगल में उग रहा हो, उगाया गया है। मैं बड़े धीरज के साथ पौधे के अपनी ही जगह पर बढ़ने और पकने होने का इंतजार करता हूं।

हाल ही के बरसों में मैं दक्षिण के लसवार चावल की किस्म उगाने की कोशिश कर रहा हूं। इसके प्रत्येक बीज को पतझड़ में बोने पर औसतन ऐसे बारह डंठल निकलते हैं जिनमें प्रति फुनगी 250 तक दाने बैठते हैं। इस किस्म के जरिए, मुझे विश्वास है कि मैं इतनी बढि़या फसल ले सकूंगा जो कि सैद्धांतिक रूप से किसी भी खेत में सौर-ऊर्जा के द्वारा उगाई गई अधिकतम फसल के लगभग बराबर होगी। इस किस्म के द्वारा मैं अभी ही प्रति चौथाई एकड़ साढ़े सत्ताइस बुशेल (लगभग 800 किलो) फसल ले रहा हूं। किसी तकनीशियन की शंकालु नजर से देखो तो चावल उगाने की मेरी विधि अल्पविधि या अस्थाई रूप से प्रभावी लग सकती है। वह कह सकता है, ‘यदि इस प्रयोग को ज्यादा समय तक जारी रखा गया तो किसी-न-किसी प्रकार की कोई समस्या निश्चय ही खड़ी होगी।’ लेकिन इस ढंग से मैं बीस बरस से चावल उगा रहा हूं। पैदावार हर साल बढ़ रही है, और मिट्टी भी हर बीतते बरस के साथ और भी ज्यादा समृद्ध होती जा रही है।

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