क्या आप सोच सकते हैं कि महज खेती से और वह भी मशरुम की खेती से किसी किसान या फिर गावों की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। यह बदलाव सिर्फ कुछ गांवों में सीमित ना होकर अगर पूरे प्रदेश के गांवों पर लागू हो जाए तो उसे आप क्या कहेंगे, उसे छोटी-मोटी क्रांति की संज्ञा तो दे ही सकते हैं ना ? ऐसा ही कुछ कमाल उत्तराखंड की महज 26 साल की दिव्या ने कर दिखाया जो आमतौर पर सरकारें भी नहीं कर पाती हैं।

दिव्या रावत मशरुम की खेती को, लोगों के पलायन पर रोक और उत्तराखंड के लोगों को रोजगार दिलाने के लिए एक प्रभावी हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही हैं। इससे राज्य के कई वीरान हो रहे गावों को दुबारा बसाने में भी सहायता मिल रही है।

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के सेरियाधार गांव की जहां अब सिर्फ तीन परिवार बचे हैं। अधिकांश लोग अच्छे रोजगार की तलाश में शहर का रुख कर चुके हैं और अब सिर्फ यही तीन परिवार बचा है। गावं से पलायन कर बाहर जा चुके गांव के इन प्रवासियों के लिए सब कुछ इतना आसान नहीं रहा। इन्हें दिल्ली में ढाबा, चाय की दुकानों में नौकरों जैसे छोटे काम करने पड़े और थोड़े से पैसे के लिए जमकर पसीना पड़ा।

उत्तराखंड में रह रही दिव्या रावत को अपने प्रदेश के इन प्रवासियों की ये हालत देखकर काफी दुख होता था। वो अपनी सामाजिक कार्य विषय में ग्रेजुएशन और मास्टर डिग्री की पढ़ाई के लिए उत्तराखंड से दिल्ली पहुंची थी। पढ़ाई पूरी होने के बाद दिव्या को नामी एनजीओ में नौकरी मिल गई जहां उन्हें मानवाधिकार के मुद्दे पर काम करने का मौका मिला। यहां उन्हें अपने राज्य के लोगों को बेहद दयनीय परिस्थिति में काम करते हुए देखकर और इस वजह से उत्तराखंड के वीरान होते जा रहे गांवों को देखकर बेहद दुख हुआ। वो इन हालात में कुछ करना चाहती थी और बड़ा बदलाव तब आया जब साल 2013 में उत्तराखंड को भीषण बाढ़ का सामना करना पड़ा। दिव्या ने तुरंत अपनी नौकरी छोड़ दी और देहरादून लौट आईं। दिव्या की योजना उत्तराखंड की लोगों के लिए फिर से अच्छे रोजगार के मौके प्रदान करने की थी। उनकी इच्छा थी कि लोग रोजगार हासिल करें और राज्य के भीतर ही सम्मानजनक जिंदगी बिता सकें। और वो यह भी चाहती थीं कि जो लोग शहरों का रुख कर चुके हैं वो वापस घर लौट आएं।

दिव्या का कहना है कि, ‘कभी-कभी बेहतरीन समाधान सामान्य या छोटी चीजों में छिपी होती है’, और ऐसा ही हुआ जब दिव्या को बड़ी समस्या का हल मशरुम उत्पादन में दिख गया।

यहां सवाल उठता है कि मशरुम ही क्यों ?

एक तरफ जहां किसान प्रति किलो आलू बेचकर 8 से 10 रुपये कमाता है, वहीं  जब वह मशरुम बेचता है तो प्रति किलो उसे 80 से 100 रुपये तक की बचत होती है। दिव्या ने बताया,’कीमतों में यह अंतर किसान की जिंदगी को बदल सकता है। तब मैंने मशरुम उत्पादन को घरेलू योजना के तहत तैयार करने का फैसला किया। मैंने इसके लिए शोध किया, इसके उत्पादन के लिए प्रशिक्षण लिया, इसके बारे में जानकारी हासिल की और मशरुम के साथ प्रयोग किया। उसके बाद मैंने मशरुम की वैसी सबसे उत्तम किस्म पर ध्यान दिया जो कम से कम आधारभूत संरचना में उत्तराखंड की जलवायु में उगाई जा सके।’

दिव्या ने लंबवत खेती के लिए बांस के रैक का इस्तेमाल किया, ताकि अधिक जगह और खर्चीले लोहे की संरचना की जरूरत को खत्म किया जा सके। उन्होंने उत्तराखंड के लिए अनुकूल तीन किस्मों की खेती करने का फैसला किया,जो हैं- बटन, ओयस्टर और दूधिया मशरुम। इन सभी किस्मों की खेती घर के अंदर किसी भी मौसम में की जा सकती है और इसके लिए एयर कंडीशनर की भी जरूरत नहीं पड़ती है।

दिव्या कहती हैं, ‘अगर आपके पास छोटा सा कमरा है, भले ही वह फूस का ही क्यों ना हो, आप बिना परेशानी के सालों भर मशरुम की खेती कर सकते हैं।’ दिव्या के परिवार ने उनके विश्वास पर भरोसा दिखाया और उनके सौम्या फूड्स प्राइवेट लिमिटेड के लिए रुपये जमा किए। उन्होंने बड़ी संख्या में मशरुम का उत्पादन शुरू किया कई लोगों को रोजगार दिया। बाजार में मशरुम की मांग बहुत ज्यादा थी यही वजह रही कि दिव्या और उनके मशरुम उत्पादकों को अपने उत्पाद बेचने में किसी तरह की समस्या नहीं आई।

उसके बाद, दिव्या ने पूरे उत्तराखंड में लोगों को प्रशिक्षण देने में कुछ वक्त बिताया। मशरुम उत्पादन के बारे में सीखने के लिए पूरे देश से लोग उनके पास आने लगे। उन्होंने महज 50,000 रुपये के निवेश से ही लोगों को उद्यमी बनने में मदद की। दिव्या अपनी खुशी जाहिर करते हुए बताती हैं, ‘अगर वो इतनी रकम का निवेश नहीं कर सकते तो मैं उन्हें अपने पास से मशरुम का एक बैग देती हूं और उसे उपजाने के तौर-तरीकों के बारे में बताती हैं। मैं उन्हें प्रेरणा देती हूं और रास्ता भी दिखाती हूं ताकि वो कमा सकें और परिवर्तन ला सकें।’

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हालांकि उनकी कंपनी महज तीन साल के भीतर ही मुनाफा कमाने लगी और उत्तराखंड में मशरुम उत्पादक किसानों की संख्या भी कई गुना बढ़ गई, इसके बावजूद दिव्या वीरान गांवों के बारे में भूल नहीं पाई। अपने मित्रों के साथ 26 साल की दिव्या ने ऐसे वीरान गांवों की पहचान शुरू कर दी और वहां मशरुम उत्पादन की ईकाई लगाना शुरू कर दिया। उदाहरण के तौर पर सेरियाधार गांव की बात करें तो देखते हैं कि एक वक्त यहां के लोग रोजगार के लिए परेशान थे, दिव्या यहां बदलाव लाने में सफल रही। लोग इस गांव में मशरुम खरीदने और मशरुम उत्पादन के तरीके सीखने के लिए आने लगे। यहां तक कि कुछ लोग जो पलायन कर गये थे वो अब गांव लौटने लगे हैं। तुरंत उल्टा पलायन भले ही संभव ना हो लेकिन आखिरकार दिव्या को भरोसा है कि मशरुम की खेती ग्रामीणों की जिंदगी और उत्तराखंड के किसानों की जिंदगी में बड़े बदलाव जरूर लाएगा।

आप ज्यादा जानकारी के लिए दिव्या से ईमेल- rawatd064@gmail.com और फेसबुक पर Facebook page of Soumya Foods के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं।

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