मशरुम की खेती की चर्चा हो और अमृतसर के मनदीप सिंह का जिक्र ना हो बात अधूरी रह जाएगी। जब नई सदी का उदय हो रहा था उस वक्त मनदीप सिंह महज बीस साल के थे, लेकिन अपने इरादे के पक्के। इस इलाके में जिस वक्त दूसरे मशरुम उत्पादक खराब अनुभव और ज्यादा लागत खर्च की वजह से मशरुम की खेती छोड़ रहे थे उस वक्त उन्होंने इस जोखिम भरे रास्ते को ना सिर्फ चुना बल्कि उसका विस्तार भी किया।

मजदूरी, बिजली और मशरुम उत्पादन के लिए बनने वाले छज्जे में लगने वाले कच्चे माल पर लगने वाला खर्च बढ़ रहा था। पास के डेरीवाल गांव में एक वक्त कई मशरुम उत्पादक हुआ करते थे लेकिन अब सभी इस पेशे को छोड़ चुके हैं। और यहां सिर्फ यही हतोत्साहित करने वाले लक्षण नहीं थे।

साल 2001 से पहले, मनदीप अपने धारदेव गांव में स्थित अपने घर के अहाते में स्थित शेड में मशरुम की खेती करते थे, जो धार्मिक शहर बाबा बाकला के पास था। उस वक्त फसल में ”वेट बबल” नाम की बीमारी लग गई थी। वो भागे-भागे लुधियाना के पंजाब एग्रीकल्चरण यूनिवर्सिटी (पीएयू) पहुंचे जहां के विशेषज्ञों ने मनदीप को अपनी फसल किसी नए इलाके में स्थानांतरित करने की सलाह दी।

जगह बदलने का फैसला आसान नहीं था। विशेषज्ञों की इस सलाह से उनकी मां, हरजिंदर कौर नाखुश थी, क्योंकि साल 1989 में डेरीवाल के कुछ लोगों से प्रभावित होकर उन्होंने मशरुम की खेती शुरू की थी। उस वक्त यह गांव”पंजाब के मशरुम गांव” के नाम से मशहूर हो चुका था, जहां 80 परिवार मशरुम की खेती का धंधा कर रहा था। हालांकि, उनके पति जो पंजाब पुलिस में हैं और वो खुद अपने बेटे की इस मामले में सहजता से मदद की।

बदलाव के साथ विस्तार-

बत्तर कलां गांव से सटे बाबा बाकला में मेहता चौक पर बाटला हाईवे पर महत्वपूर्ण जगह पर परिवार ने चार एकड़ जमीन खरीदी जहां दोनों ने स्थानांतरण और अपने धंधे का विस्तार किया। हालांकि, उस वक्त डेरीवाल में मशरुम उत्पादकों की संख्या घटकर महज छह रह गई थी। मनदीप ने बताया कि जो उत्पादक पिछड़ रहे थे उसकी वजह महज तकनीकि पिछड़ापन था।

इस हाईवे के साथ एक रिटेल काउंटर खोला गया और ‘रंधावा मशरुम फार्म’ के नाम से एक बड़ा बोर्ड लगाया गया। मशरूम चार महीने नवंबर से फरवरी तक उपलब्ध रहता है। मशरुम की बटन किस्म के लिए 20 से 40 किलोग्राम के थोक मात्रा में ऑर्डर आते हैं, जो ठंड में शादी के मौसम के दौरान लगातार चलता रहता है जो उस वक्त हो रहे फसल से भी मेल खाता है।Mandeep-mashroom

शुरुआत में मनदीप अपने दो छोटे भाइयों की मदद से चार शेड बनाए जिसकी छत पुआल और सरकंडा से बनाया गया था। उसके बाद छज्जे या ट्रे जो बांस से तैयार किए जाते हैं पर कम्पोस्ट बेड्स डाला जाता है। आज इस तरह के12 छज्जे हैं जिस पर मशरुम का उत्पादन किया जाता है।

खर्च का महत्वपूर्ण तत्व-

जिस कम्पोस्ट में मशरुम पैदा होता है उसका आधार ”तूरी” है और डेयरी उद्योग में इसकी ज्यादा मांग के चलते साल दर साल लगातार महंगा होता जा रहा है। इसकी दर प्रति क्विंटल 300 से 400 रुपये है।

उसके बाद बारी आती है मजदूरी के खर्च की जिसकी जरूरत कम्पोस्ट खाद बनाने और मशरुम की तोड़ाई पर पड़ती है। मशरुम की तोड़ाई अक्सर रात के दौरान होती है इसलिए बिक्री काउंटर पर काफी सुबह ताजा मशरुम उपलब्ध हो जाता है, खासकर उनके लिए जो शादी समारोह के लिए थोक मात्रा में मशरुम का ऑर्डर देते हैं। इसलिए काम के हिसाब से कामगारों की संख्या 20 से लेकर 80 तक होती है। इसी तरह सीजन की शुरुआत में नए शेड के निर्माण, मरम्मत कार्य में भी खर्च आता है। मशरुम बीज जो हिमाचल के सोलन से लिया जाता है और परिवहन पर पड़नेवाला खर्च को भी अनदेखा नहीं कर सकते हैं।

वो बताते हैं, ‘अब कुल लागत खर्च करीब 20 लाख रुपये पड़ता है (यह खर्च दो एकड़ मिलाकर आता है, इसमे से एक एकड़ का इस्तेमाल शेड के लिए और दूसरे एकड़ का प्रयोग कम्पोस्ट की तैयारी के लिए होता है।) एक क्विंटल कम्पोस्ट के इस्तेमाल से औसतन 20 किलो बटन मशरुम का उत्पादन होता है और हमारे फार्म पर मशरुम का कुल उत्पादन करीब 50 क्विंटल होता है। ऐसे में अगर हमे प्रति किलो 90 रुपये की कीमत मिलती है तो हम करीब 48लाख रुपये कमा लेते हैं।’ उसमे से कुल मुनाफा 28 लाख रुपये होता है, लेकिन अनिश्चित वातावरण की वजह से अधिकांश लागत खर्च में दोहराव होता रहता है, वो प्रति सीजन करीब 8 से 10 लाख रुपये ही बचा पाते हैं। इसका मतलब ये है कि एक एकड़ से करीब साढ़े चार लाख की कमाई हो जाती है।

गेहूं की तुलना में यह बहुत ज्यादा है, और इसका उत्पादन भी पांच महीने वाले सीजन शीत ऋतु में होता है और प्रति एकड़ 29 हजार की दर से बेचा जाता है और अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य 1450 रुपये प्रति क्विंटल हो और उत्पादन 20 क्विंटल होता हो। इसमे करीब 13 हजार रुपये लागत खर्च आता है और मुश्किल से 16 हजार रुपये प्रति एकड़ बचता है। वो अधिकांश बिक्री अपने काउंटर से ही कर लेते हैं, जबकि मशरुम का अचार भी लोकप्रिय है जो मशरुम तोड़ाई के वक्त थोड़ा खराब हो गए मशरुम से तैयार किया जाता है। 200 ग्राम प्रति पैकेट की कीमत 25 रुपये होती है जिसे खुदरा दुकानदार 40 रुपये प्रति पैकेट बेचता है।

नई तकनीक-

साल 2014 में मनदीप ने पीएयू के विशेषज्ञों की सलाह पर कम्पोस्ट बनाने के लिए ‘लॉन्ग मेथड टेक्नीक’ का प्रयोग शुरू किया। बैंक से 30 लाख का लोन लेकर उसने इस तकनीक की शुरुआत की जिसमे गुणवत्ता वाली कम्पोस्ट तैयार करने के लिए दो हाईटेक चैंबर्स होते हैं। इतना ही नहीं उन्हें नेशनल हॉर्टीकल्चर मिशन के तहत 20 लाख की सब्सिडी मिली। वो बताते हैं, ”इस तकनीक में चैंबर्स के भीतर हैवी ड्यूटी ब्लोअर्स लगे होते हैं जिससे कम्पोस्ट की सफाई होती है। वहीं, जबकि हाथ से करने पर कुछ गैस इसमे फंसा रह जाता है।” हालांकि अभी तक ये प्रयोग के चरण में है। वो बताते हैं, ‘अगर हम अच्छा करते हैं तो उत्पादन दोगुना हो सकता है।’ और बताया कि वो ‘क्लीन’ कम्पोस्ट से मशरुम का उत्पादन कर चुके हैं।

पीएयू के विशेषज्ञों ने भी उन्हें सलाह दी कि साल भर मशरुम उत्पादन के लिए उन्हें स्थाई शेड की जरूरत पड़ेगी। उन्होंने बताया, ‘हिमाचल के नालागढ़ में मैंने इसे देखा है। अब मैंने इसके लिए 2 करोड़ के लोन के लिए आवेदन कर दिया है।’

कोई गुस्सा या झुंझलाहट ?

उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को ‘किसी तरह हमारे बारे में जानकारी मिली’ और वो आठ मशरुम उत्पादकों में से एक थे जिनका चयन बादल के आवास पर बैठक के लिए 6 फरवरी को तय की गई।

‘सीएम ने हमारी प्रशंसा की और उन्होंने जानना चाहा कि हम किस तरह की समस्याओं का सामना कर रहे हैं। मैंने उन्हें बताया कि हमसे व्यावसायिक दर पर बिजली बिल लिया जाता है। शेड के भीतर जरूरी गर्मी के लिए 24 घंटे के लिए बिजली को जलाए रखने की जरूरत पड़ती है। उसके बाद ट्यूबवेल को भी लगातार चलाते रहने की जरूरत पड़ती है ताकि पानी का छिड़काव किया जा सके। हम यह नहीं चाहते हैं कि बिजली हमे मुफ्त में दी जाए लेकिन हम चाहते हैं कि हमसे भी वही दर वसूली जाए जो किसानों से वसूली जाती है।’ वो इस बात से भी नाखुश दिखे कि उनसे चेंज ऑफ लैंड यूज (सीएलयू) का सर्टिफिकेट मांगा गया, क्योंकि अधिकारियों ने बताया कि उनका रिटेल कारोबार खेती की गतिविधि में नहीं आता है।

वो बताते हैं, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कुछ अधिकारी यह भी कहते हैं कि कम्पोस्ट वातावरण के लिए ठीक नहीं है। इसलिए ‘लोन लेने में परेशानी होती है।’

मशरुम का अर्थशास्त्र-

– अगर दो एकड़ में मशरुम का उत्पादन किया जा रहा है जिसमे एक एकड़ में 12 शेड लगाए गए हों और दूसरे एकड़ का इस्तेमाल तैयारी के लिए किया जाता है वैसी स्थिति में लागत खर्च 10 लाख रुपये आती है।

– एक क्विंटल कम्पोस्ट से 20 किलो मशरुम का उत्पादन होता है।

– 50 क्विंटल मशरुम से 48 लाख रुपये की कमाई होती है।

– सारे लागत खर्च को काटने के बाद प्रति एकड़ करीब साढ़े चार लाख रुपये का मुनाफा होता है।

– 1450 रुपये न्यूनतम समर्थन मूल्य पर प्रति एकड़ गेहूं उत्पादन में 29000 रुपये का मुनाफा होता है और इसमे 20 क्विंटल गेहूं का उत्पादन होता है।

– प्रति एकड़ 13000 रुपये की लागत खर्च आती है, और काट-छांट कर कुल 16000 रुपये प्रति एकड़ कमाई होती है।

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