ये एक दम सही बात है कि जहां चाह है, वहां राह है। बस पूरी शिद्दत के साथ काम करना होता है। खेती-बाड़ी के साथ ये बात और मायने रखती है। सोच, परिश्रम और तकनीक यदि एक साथ काम करे तो हर एक किसान का भाग्य बदल सकता है और किस्मत बुलंद हो सकती है।

सीजन में एक ओर जहां अत्यधिक ठंड की वजह से अन्य किसान आलू के कम पैदावार का रोना रो रहे हैं वहीं मोगा स्थित जय सिंह वाला गांव के एक किसान और सरपंच जगमोहन सिंह की बल्ले-बल्ले है। उनका दावा है कि आलू की खेती के लिए अभिनव तकनीक के इस्तेमाल के जरिए इनके खेत में जहां आलू की पैदावार अच्छी हुई है, वहीं उन्होंने 83 एकड़ के अपने खेत में इसी अभिनव विधि से आलू की खेती करके दुगूनी आय भी अर्जित की है। इसके बारे में जगमोहन बताते हैं, “सामान्य रूप से 1 एकड़ खेत में रिज  प्लान्टेशन विधि (नली पौधारोपण विधि) से आलू की पैदावार जहां 100-125 क्विंटल होती है, वहीं बेड प्लान्टेशन विधि से मैंने प्रति एकड़ करीब 170 क्विंटल आलू की पैदावार हासिल की है”।

रिज प्लान्टेशन विधि अब बेड प्लान्टेशन की विधि में बदला

जगमोहन ने बताया कि पहले उन्होंने 36 इंच की बेड प्लान्टेशन तकनीक को अपनाया था, जिसमें वे दो पंक्तियों के बीच आलू बोया करते थे और दोनों ओर से फसलों की सिंचाई परंपरागत पद्धति से की जाती थी। 36 इंच बेड प्लांटेशन की इस विधि से प्रति एकड़ 32-35 आधा क्विंटल वाले बीज से आलू की पैदावार 135 क्विंटल होती थी। नई तकनीक से पिछले दो सालों से आलू उपजा रहे जगमोहन बताते हैं,” अब हमनें एक नए परीक्षण के तहत रिज यानी क्यारी की चौड़ाई 36 इंच से बढ़ाकर 72 इंच कर दिया और पानी की छिड़काव वाली सिंचाई विधि को इस्तेमाल में लाया”।

जगमोहन बताते हैं कि वो पिछले दो सालों से आलू की खेती कर रहा हैं। इस विधि में चौड़ाई बढ़ाने से बीज बोए गए क्यारियों के बीच ट्रैक्टर को चलाने का स्थान मिल गया। जिससे अब खेतों में एक बेड वाली बड़ी क्यारियों में पांच पंक्तियां बना कर आलू की रोपाई की जाने लगी। परिणामस्वरूप प्रति एकड़ आलू की पैदावार बढ़कर 170 क्विंटल हो गई। 40-45 आधा क्विंटल बीज वाले बैग से प्रति एकड़ 1 लाख रूपये का फायदा हुआ। जबकि रिज प्लान्टेशन विधि से आप ज्यादा से ज्यादा प्रति एकड़ 40,000 रूपये का मुनाफा कमा सकते हैं, जबकि इस विधि से खेती करने में पानी से सिंचाई के लिए ज्यादा ऊर्जा यानी बिजली की जरुरत होती है और साथ में अतिरिक्त खाद और कीटनाशक की आवश्यकता पड़ती है।


बेड प्लान्टेशन तकनीक से फायदे

इस विधि के बारे में कृषि विकास पदाधिकारी जसविंदर सिंह बरार (एडीओ) कहते हैं कि ये तकनीक न केवल फसल की पैदावार में वृद्धि करने में मदद करती है, बल्कि स्वस्थ फसल के उत्पादन के लिए भी बहुत मददगार साबित होती है।

उन्होंने कहा, ” यह विधि फसल में पानी उपयोग की दक्षता को बढ़ाता है, जिससे फशल को मिट्टी से पोषक तत्वों को अवशोषित करने में मदद मिलती है और फसल की वातन सुविधा बेहतर हो जाती है जो अंततः अच्छे परिणाम देता है”। जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि रिज (नली) सिंचाई पद्धति न केवल पानी बर्बाद करती है, बल्कि पानी की बाढ़ फसल के पोषक तत्वों को अवशोषित करने में बाधा बनती है।

जगमोहन कहते हैं, “बेड प्लान्टेंशन विधि के तहत मैं एक एकड़ फसल के लिए 15 किलो यूरिया खाद का इस्तेमाल करता हूं, जबकि दूसरे किसान एक एकड़ की फसल के लिए करीब एक क्विंटल यूरिया का इस्तेमाल करते हैं, जिससे फसलों में नाइट्रोजन की मात्रा काफी बढ़ जाती है, जो उपभोक्ता के स्वास्थ्य  लिए हानिकारक है”।


धान की पुआल खेतों के लिए वरदान

अब,यहां के किसानों ने पुआल जलाने की प्रथा भी बंद कर दी है। अब धान की फसल की कटाई के बाद पुआल खेतों में छोड़ दी जाती है और ये खेतों के लिए बढिया उर्वरक बन खेतों की उर्वरकता को बढ़ा देता है जिससे फसल का उत्पादन बेहतर हो पाता है। जगमोहन ने बताया कि उन्होंने इटली से एक पुआल काटने वाली अत्याधुनिक मशीन मंगवाई है, जो पुआल की महीन कटाई करने में मदद करती है और इसके भूसे को मिट्टी में डिकम्पोज कर दिया जाता है, जो मिट्टी में सूक्ष्म-पौधों और सूक्ष्मजीवों को स्वस्थ बनाने में मदद करता है, जिससे पैदावार अच्छी होती है।


अन्य फसलों के लिए भी बेड प्लान्टेंशन विधि

बेड प्लान्टेंशन विधि की लोकप्रियता के बारे में एडीओ जसविंदर ने कहते हैं कि किसान गेहूं, सभी तरह की सब्जियां, सूरजमुखी, मक्का और गन्ना सहित अन्य फसलों को भी इसी विधि से बो सकते हैं। वो कहते हैं, ” इस विधि से फसल की बुवाई के जरिए सिंचाई के लिए पानी का उपयोग को 40% तक कम किया जा सकता है, जो पानी बचाने में काफी सहायक होगा”।

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