भले ही चायनीज समान भारत में कहीं पर आसानी से बिक जाता हो, लेकिन भारत के उत्पाद को चीन में बेचना आसान नहीं है। फिर भी कुछ भारतीय उत्पाद भी चीन में अपना जलवा बिखेरने का माद्दा रखते हैं। इसी फेहरिस्त में प्रसिद्ध देसी फल शरीफा (सीताफल) का नाम मुख्य रूप से लिया जा रहा है। खासकर, नई प्रजाति का ‘अर्का सहन’ शरीफा चीन के बाज़ार में अपनी जगह और धूम मचाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पौष्टिक तत्वों की भरपूर मात्रा के साथ-साथ परंपरागत किस्म की तुलना में अधिक टिकाऊ होने के बाद भी नई प्रजाति का ये शरीफा निर्यात के मामले में अब तक लोकप्रियता हासिल नहीं सका है। लेकिन अब ये चीन के बाज़ार को गुलजार करने की तैयारी में है।

पिछले मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चीन दौरे पर भारत ने अर्का सहन के निर्यात को लेकर चले रहे गतिरोध को दूर करने का आग्रह चीन से किया है। चीन की ओर से अर्का सहन को लेकर की गई पूछताछ से भारतीय वैज्ञानिकों के उम्मीद को भी पंख लग गए हैं। खास तौर पर बेंगलुरु स्थित भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान IIHR के वैज्ञानिकों में जिन्होंने सत्रह सालों की कडी मशक्कत के बाद अर्का सहन की प्रजाति को विकसित करने में सफलता पाई, इसको लेकर जोश दोगुना हो गया। वैज्ञानिकों का दावा है कि नई किस्म का ये शरीफा पौष्टिक मूल्य, आकार और टिकाऊपन के मामले में अतुलनीय है।

अर्का सहन प्रजाति को विकसित करने वाली टीम के सदस्य रहे और भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के प्रमुख सेवानिवृत्त वैज्ञानिक एस एच जलिकॉप का कहना है, “हालांकि ये कस्टर्ड एप्पल (शरीफा) (दक्षिण भारत औऱ देश के अन्य भागों में सीताफल के रुप में जाना जाता है) के समान ही है तथापि ये आप में एक नया फल है। इसे संभ्रांत संकर किस्म के रूप में विकसित होने में 17 साल लग गए”।

एक नया फल : अर्का सहन

  • शरीफे के समान लेकिन वैज्ञानिकों का दावा कि ये एक नया फल है।
  • इसमें शरीफा के पोषक तत्वों की तुलना में 87 प्रतिशत अधिक प्रोटीन, 249 फीसदी अधिक फास्फोरस और 42 प्रतिशत अधिक कैल्सियम पाए जाते हैं।
  • पका हुआ अर्का सहन सामान्य शरीफे की तरह ही ठोस
  • इसमें बहुत कम बीज होते हैं जो फल के गुदा से नहीं चिपकते हैं।
  • अधिक टिकाऊ होने और धीरे-धीरे पकने की इसकी प्रकृति इसे लंबी दूरी के ट्रांसपोर्ट और निर्यात के अनुकूल बनाती है।
  • पारंपरिक शरीफा से 250 प्रतिशत बड़ा होता है।
  • यह गर्म शुष्क क्षेत्रों में खेती के लिए बेहद उपयुक्त
  • अर्का सहन के पेड़ वर्तमान में कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात में लगाए गए हैं।

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 वो कहते हैं, “अर्का सहन पूरी तरह से सीताफल नहीं है। बल्कि दो प्रजातियों को मिलाने से तैयार एक नया फल है जो 75 फीसदी सीताफल और 25 फीसदी चेरीमोया से मिलकर बना है।

इस फल का बाहरी आवरण लंबे समय के लिए टिकाऊ होते हैं और धीमी गति से पकने वाली प्रवृति इसे लंबी दूरी तक ले जाने के लिए उपयुक्त बनाते हैं। इसी कारण इसे निर्यात करना भी आसान होता है।

इसके बारे में एस एच जलिकॉप बताते हैं कि अर्का सहन पूर्ण रूप से सीताफल नहीं है। यह एक नये किस्म का फल है, जो सीताफल के 75 प्रतिशत और चेरीमोया के 25 प्रतिशत के संकरण से बना है। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के वैज्ञानिकों ने इसे इसी रूप में विकसित किया था। जिस प्रकार से दुनिया के अन्य हिस्सों में दो या तीन फलों को आपस में क्रॉस (संकर) कराकर एक नई किस्म के कई फलों को विकसित किया जाता है। इस प्रक्रिया से फलों की नई किस्म बन जाती है और बाज़ार को एक नया फल मिल जाता है। इसे लेकर उन्होंने कई नई विकसित किस्मों के फलों जैसे प्लमकाट जो बेर और खुबानी के संकर से, ऐप्रिम खुबानी और बेर के संकर से, पीकाटम( बेर, आडू और खुबानी से) का उदाहरण दिया। कहा, जबकि इनकी खेती संयुक्त राज्य अमेरिका में वाणिज्यिक रूप से की जाती है।

हालांकि पारंपरिक शरीफा की किस्म (मूल रूप से दक्षिण अमेरिकी देश का फल) भारत के कई हिस्सों में काफी अच्छी तरह से जाना जाता है, लेकिन फल का कमजोर बाहरी आवरण और प्रचुर मात्रा में बीजों की उपस्थिति के कारण इसे व्यापक उपभोक्ता स्वीकृति नहीं मिल पाई। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2000 में इसे पहली बार घरेलू बाजार में नए अवतार में अर्का सहन को उतार कर व्यापक उपभोक्ता स्वीकृति दिला दी है।

इस फल का नाम अर्कावती नदी से जुड़ा है, जो भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR), बेंगलुरू के करीब बहती है। जलिकॉप ने कहा, “संस्थान में पैदा होने वाले फल, सब्जियों और फूलों की किस्मों का उपसर्ग ‘अर्का’ है। ‘सहन’ का मतलब धैर्य के लिए होता है क्योंकि नए फलों को परिपक्व और परिपक्व फल के लिए समय लगता है, जबकि पारंपरिक सीताफल की तुलना में शरीफा) जो तेजी से पकने और बहुत जल्दी खराब होने के लिए कुख्यात है। ”

इन नए गुणों के साथ, अर्का सहन लंबी दूरी की परिवहन या निर्यात के लिए सबसे उपयुक्त हो गया है। यह हाल के दिनों में न केवल व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण फल बन गया है, बल्कि संस्थान से गढ़ा हुआ रोपण सामग्री की मांग भी बढ़ रही है।

इसके उपलब्धि के बारे में भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) के प्रमुख वैज्ञानिक और अर्का सहन के प्रजनन पर वैज्ञानिक जलिकॉप के सहयोगी पी संपत कुमार ने कहा कि  जब से अर्का सहन यानि वर्ष 2000 में बाजार में लॉन्च किया गया, तब से लगभग 2 लाख ग्राफ्ट किसानों को 15 अक्टूबर तक बेचे गए हैं। जो संभवत विभिन्न राज्यों में 500 हेक्टेयर भूमि को कवर किया हो।

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