अलवर:  कुछ सालों पहले तक अलवर के निकट स्थित खोहर गांव राजस्थान के किसी चिर परिचित गांव की तरह तो बिल्कुल नहीं था जहां पारंपरिक पोशाक में सजे-संवरे लोग, अपने कार्यकलापों में मगन पर्यटकों का स्वागत करते दिखें। गांव में शायद ही कोई दिखता था, कई घरों में ताले लटके मिलते थे और खुशनुमा मौसम में भी गांव में चहल कदमी शायद ही दिखती थी।

गांव के लोगों का सामुहिक पलायन गांव में पसरे इस सन्नाटे की शायद सबसे बड़ी वजह थी। गांव के आधिकांश लोग बेहतर आजीविका और जीवन यापन की तलाश में शहर की ओर पलायन कर गए थे और जो बच गए थे उसमें से शायद ही किसी के अंदर इतनी प्रेरणा बची थी कि आजीविका के किसी नई व्यवस्था के प्रति उत्साह दिखा पाएं।

ऐसा नहीं था कि गांव से शहरों की ओर पलायन खोहर वासियों के लिए कोई नई परिघटना थी, दशकों से ये गांव इसका गवाह बन रहा था। गांव की ही एक मध्य आयु की महिला रामदुलारी ने वर्षों पहले अपने पति को काम की तलाश में गुजरात जाते देखा था और आज कई सालों के बाद उनका बेटा भी अब उन्हें छोड़ कर जा रहा है।

इस पूरी परिस्थिति के लिए इलाके में पानी का भीषण संकट जिम्मेदार था। इलाके में बेहद कम वर्षा होती थी और उपलब्धimages (1) पानी का 78 फ़ीसदी हिस्सा क्षारीय था। ग्रामीणों को न केवल खेती के लिए सिंचाई के संकट का सामना करना पड़ता था बल्कि दैनंदिन कार्यकलापों में इस्तेमाल होने वाले पानी की व्यवस्था भी उनके लिए बेहद गंभीर चुनौती थी।

साल दर साल गांव में पानी का स्तर खतरनाक स्तर तक नीचे जा रहा था। जिन ग्रामीणों के पास ट्युबवेल थे वो तो साल भर में दो बार अपने खेतों का पटवन कर ले रहे थे लेकिन जिनके पास ट्युबवेल का प्रबंध नहीं था उन्हें या तो बरसा के पानी पर निर्भर रहना पड़ता या ट्युबवेल मालिकों से पानी खरीद  कर अपनी व्यवस्था करते थे।

दशकों से इस विपरीत हालात को झेल रहे इस गांव पर सहगल फाउंडेशन की नजर पड़ी और फाउंडेशन ने 2014 में यहां आ कर हालात से लड़ने का बिड़ा उठाया। डॉ सुरेंद्र मोहन सहगल द्वारा सन 1999 में शुरू किए गए सहगल फाउंडेशन का मकसद ग्रामीण भारत का सशक्तिकरण रहा है। फाउंडेशन के महज दो सालों की मेहनत ने ही गांव की शक्ल ओ सूरत बदल दी। फाउंडेशन ने एक चेक डेम बना कर दशकों से पानी की किल्लत झेल रहे इस गांव की तस्वीर ही बदल दी।

IMG_0021मार्च 2014 में डैम का निर्माण कार्य शुरू हआ। फाउंडेशन ने अरावली की पहाड़ियों के निकट पानी का एक स्त्रोत खोज निकाला जो बरसात के दिनों में छोटे से नाले में तब्दील हो जाता था। फाउंडेशन ने इलाके के जलस्तर में बढ़ोत्तरी के लिए इस बरसाती नाले पर ही डैम बनाने का फैसला किया।

ये चैक डैम आकार में छोटे और कई बार अस्थायी संरचना होते हैं जिसकी मदद पानी के बहाव को नियंत्रित किया जाता है। इन बांधों को अक्सर पत्थरों/ईंटों की चिनाई को मिट्टी के बीच दबा कर खड़ा किया जाता है। सहगल फाउंडेशन के प्रोग्राम लीडर सलाहुद्दीन सैफी कहते हैं, “बरसाती नालों में पानी का बहाव बेहद तेज होता है इसलिए ये पानी छन कर जमीन के नीचे नहीं पहुंच पाती है। इस तरह के डैम पानी के तेज बहाव को धीमा करता है जिससे एक जगह पर पानी अधिक वक्त तक ठहर पाता है जिससे पानी को जमीन के अंदर रिस कर पहुंचने का वक्त मिल पाता है। इस प्रक्रिया से पूरे इलाके के जलस्तर में बढ़ोत्तरी होती है”।

खोहर जैसे सूखा ग्रस्त इलाकों में चेक डैम जैसी व्यवस्था से भूमिगत जल को रिचार्ज करने मदद मिलती है। बारिश के पानी को जलसंग्रहण क्षेत्र में इकठ्ठा किया जा सकता है और बारिश के मौसम बीत जाने के बाद उस इकठ्ठा किए हुए पानी का इस्तेमाल सिंचाई, पशुओं के चारों को पानी देने यहां तक कि पीने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

चूंकि चैक डैम के निर्माण में थोड़ी बहुत मशीनों, पूंजी और बड़े स्तर पर मानव श्रम की जरूरत होती है इसलिए खोहर जैसे इलाकों में जहां डैम के निर्माण के लिए आवश्यक श्रम की पूर्ति वहां रहने वाले लोगों से हो जाती है, ऐसे इलाकों के लिए बिल्कुल सटीक है।

खोहर में कैसे बना चेक डैम ?chak dam

फाउंडेशन के लिए पहली चुनौती थी कि ग्रामीणों को संगठित करे और उन्हें चेक डैम से होने वाले फायदों के बारे में जागरुक किया जाए। सलाहुद्दीन कहते हैं, “हालांकि ग्रामीणों ने हमें खुद ही संपर्क किया था लेकिन फिर भी गांव में कई घर ऐसे थे जो अपनी भागीदारी को लेकर सशंकित थे। इसके साथ ही चूंकि डैम निर्माण कार्य में हमें निरंतर पानी की जरूरत थी लेकिन कई ग्रामीण ऐसे थे जो हमसे अपने हिस्से का पानी शेयर नहीं करना चाहते थे”।

फाउंडेशन ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए ग्रामीणों के बीच से ही एक समुह को जल प्रबंधन कमिटी के लिए प्रशिक्षित किया जो डैम के निर्माण और रख रखाव की जिम्मेदारी निभा सके। 126 दिनों की कड़ी मशक्कत के बाद फाउंडेशन 185 मीटर लंबा और पांच मीटर उंचा एक बांध बना पाने में कामयाब हुआ। इसके साथ ही फाउंडेशन ने 255 एकड़ तक फैले एक जलसंग्रहण केंद्र बनाने में भी सफलता पाई जिसकी सालाना जल संग्रहण क्षमता 32 करोड़ लीटर थी।

डैम के निर्माण की लागत 56 लाख रुपये आया जिसका इंतजाम फाउंडेशन ने किया। ग्रामीणों ने भी अपने पास से चंदे के रुप में एक लाख रुपये की रकम का इंतजाम किया जिसे भविष्य में डैम के रखरखाव और मरम्मत के लिए रखा गया। सलाहुद्दीन बताते हैं, “हमने मूल चेक डैम के आस पास छोटे छोटे वाटरशेड्स (जोहड़) भी बनवाए ताकि पानी के तेज बहाव को नियंत्रित किया जा सके जिसका सीधा असर डैम पर न हो”।

फाउंडेशन को अपने इस कार्य का असर दो से तीन सालों में मिलने की आशा थी लेकिन पहले ही मानसून में इस कार्य का सकारात्मक असर देखकर फाउंडेशन भी आश्चर्यचकित रह गया।

प्रभाव

फाउंडेशन के इस पहल से न केवल खोहर के 150 घरों को फायदा मिला बल्कि आस पास के इलाकों के तकरीबन दस हजार से अधिक लोग इससे लाभान्वित हुए। पानी की उपलब्धता में तीस फीसदी का इजाफा हुआ और बड़े स्तर पर पलायन को रोकने में मदद मिली। अनुमान है कि चेक डैम के बन जाने के बाद से इलाके से होने वाले पलायन में तीस से चालीस फीसदी की कमी आई है।

पिछले साल हुए कम बारिश के बावजुद चेक डैम की वजह से इलाके के मिट्टी की नमी में साठ फीसदी तक बढ़ोत्तरी देखने को मिली है और इलाके के भूमिगत जल स्तर में बढ़ोत्तरी हुई है। जल की उपलब्धता में आई बढ़ोत्तरी से गांव के कृषि गतिविधियों में खासी प्रगति देखने को मिल रही है।

ग्रामीणों ने अब जैविक कृषि में अपनी रुचि दिखाई है और अब वो जैविद खाद बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं। गांव के जल संकट को बहुत हद तक दूर की वजह से ही ये सब संभव हो पाया है। गांव में आए इस परिवर्तन के बारे में सलाहुद्दीन बताते हैं, “पहले मजबूरी में इलाके के ग्रामीण पलायन कर गुजरात और महाराष्ट्र जाते थे जहां वो कपास के खेतों में मजदूरी करते थे। अब उनमें से आधिकांश यहीं रहते हैं क्योंकि यहां गांव में ही उनके खेतों में काम है या गांव में बड़े भूस्वामियों के यहां उनको मजदूरी मिल जाती है”।

सहगल फाउंडेशन की सफलता के इस सफर में खोहर सिर्फ एक उदाहरण है। पूरे राजस्थान में सहगल फाउंडेशन ने अब तक 26 बड़े चेक डैम और विभिन्न जगहों पर कई छोटे छोटे चेक डैम बनाए हैं जिससे राज्य के तकरीबन ढाई लाख लोगों को लाभ हुआ है।

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